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China India Satellite Race: ऑपरेशन सिंदूर के बाद चीन की मदद से पाकिस्तान ने बढ़ाई निगरानी क्षमता, भारत कितना पीछे?

ऑपरेशन सिंदूर के बाद दक्षिण एशिया में अंतरिक्ष आधारित निगरानी को लेकर प्रतिस्पर्धा तेज हो गई है। चीन की मदद से पाकिस्तान ने अपने अर्थ-ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट नेटवर्क को मजबूत किया है, जबकि भारत 52 सैटेलाइट वाले स्पेस-बेस्ड सर्विलांस ग्रिड पर काम कर रहा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि चीन के मुकाबले भारत की स्थिति आखिर कहां है।

चीन की मदद से पाकिस्तान ने बढ़ाई निगरानी क्षमता

रिपोर्ट्स के अनुसार जनवरी 2025 से जून 2026 के बीच पाकिस्तान ने छह अर्थ-ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट लॉन्च किए हैं। इन सैटेलाइट्स को सन-सिंक्रोनस ऑर्बिट में स्थापित किया गया है, जो निगरानी और हाई-रिजॉल्यूशन इमेजिंग के लिए उपयुक्त मानी जाती है। भारतीय सेना पहले भी ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान को चीन की तकनीकी सहायता मिलने की बात कह चुकी है।

भारत तैयार कर रहा है 52 सैटेलाइट वाला सर्विलांस ग्रिड

भारत ‘स्पेस-बेस्ड सर्विलांस फेज-III’ (SBS Phase III) कार्यक्रम के तहत 2025 से 2029 के बीच 52 सैटेलाइट तैनात करने की योजना पर काम कर रहा है। इनमें से 31 सैटेलाइट निजी कंपनियां विकसित करेंगी। इस नेटवर्क का उद्देश्य सीमाओं और समुद्री क्षेत्रों की लगातार निगरानी, सुरक्षित संचार और रियल टाइम इंटेलिजेंस उपलब्ध कराना है।

चीन का विशाल स्पेस नेटवर्क भारत से काफी आगे

चीन के पास 1350 से ज्यादा सक्रिय सैटेलाइट हैं, जबकि भारत के पास लगभग 60 सक्रिय उपग्रह मौजूद हैं। सैन्य निगरानी के लिए चीन के पास 500 से अधिक समर्पित सर्विलांस सैटेलाइट हैं। इसके अलावा चीन हर साल दर्जनों रॉकेट लॉन्च करता है और उसके पास हजारों सैटेलाइट बनाने की औद्योगिक क्षमता विकसित हो चुकी है।

अंतरिक्ष युद्ध की तैयारी में भी आगे है चीन

चीन ने एंटी-सैटेलाइट हथियार, ग्राउंड-बेस्ड लेजर, साइबर जैमिंग सिस्टम और को-ऑर्बिटल तकनीकों पर भी काफी प्रगति की है। दूसरी ओर भारत ने 2019 में मिशन शक्ति के तहत एंटी-सैटेलाइट मिसाइल का सफल परीक्षण किया था, लेकिन कई अन्य तकनीकें अभी विकास के चरण में हैं।

भारतीय निजी कंपनियों पर बढ़ी जिम्मेदारी

नई स्पेस नीति के तहत भारत निजी क्षेत्र की भूमिका बढ़ा रहा है। स्कायरूट, अग्निकुल और पिक्सेल जैसी कंपनियों को भविष्य में बड़े रक्षा और अंतरिक्ष प्रोजेक्ट्स में अहम जिम्मेदारी मिल सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि तेजी से बदलते रणनीतिक माहौल में भारत को लॉन्च क्षमता और सैटेलाइट उत्पादन दोनों की रफ्तार बढ़ानी होगी।

हर 15-20 मिनट में निगरानी की जरूरत

विशेषज्ञों के अनुसार भविष्य के युद्धों में रियल टाइम इंटेलिजेंस सबसे महत्वपूर्ण होगी। भारत को ऐसे लो-अर्थ ऑर्बिट (LEO) सैटेलाइट नेटवर्क की जरूरत है, जो सीमाई इलाकों की लगातार और कम अंतराल में तस्वीरें भेज सकें। फिलहाल भारत इस दिशा में तेजी से काम कर रहा है, लेकिन प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है।

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