चमोली टनल हादसा: विकास की रफ्तार के बीच मजदूरों की सुरक्षा पर बड़ा सवाल
Chamoli Tunnel Accident: उत्तराखंड के चमोली में निर्माणाधीन विष्णुगाड़-पीपलकोटी जलविद्युत परियोजना की टनल में पानी और मलबा आने की घटना ने हिमालयी क्षेत्रों में बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह हादसा सिर्फ एक निर्माणाधीन सुरंग में अचानक आई आपदा का मामला नहीं है, बल्कि इससे मजदूरों की सुरक्षा, आपदा प्रबंधन, वेंटिलेशन, अर्ली वार्निंग सिस्टम और जोखिम निगरानी जैसे कई महत्वपूर्ण मुद्दे सामने आए हैं।
हिमालयी सुरंगों में जोखिम कितना बड़ा?
हिमालयी क्षेत्र में सुरंग निर्माण सामान्य इलाकों की तुलना में कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण है। पहाड़ों की भूगर्भीय संरचना, भूमिगत पानी, चट्टानों का दबाव और अचानक बदलती परिस्थितियां निर्माण कार्य को जोखिमपूर्ण बनाती हैं।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब टनल के भीतर अचानक पानी और मलबा पहुंचा तो मजदूरों को कितनी जल्दी चेतावनी मिली? क्या उनके पास सुरक्षित स्थान तक पहुंचने का पर्याप्त समय और रास्ता था? और क्या बचाव दल के पास तुरंत अंदर पहुंचने के लिए पर्याप्त संसाधन मौजूद थे?
1.8 किलोमीटर अंदर फंसे मजदूर, बचाव अभियान बना चुनौती
बताया गया कि हादसे वाले हिस्से में मजदूर टनल के भीतर करीब 1.8 किलोमीटर अंदर थे। आपात स्थिति में इतनी दूरी तक पहुंचना अपने आप में बड़ी चुनौती है।
बचाव दल को मलबा हटाने और पानी को नियंत्रित करने के साथ-साथ खुद की सुरक्षा का भी ध्यान रखना पड़ता है। यही वजह है कि लंबी सुरंगों में वैकल्पिक निकासी मार्ग, आपातकालीन संचार और मजदूरों की वास्तविक समय में लोकेशन की जानकारी बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।
ऑक्सीजन की कमी ने बढ़ाई मुश्किल
हादसे के बाद टनल के भीतर ऑक्सीजन का स्तर कम होना भी बचाव अभियान के लिए गंभीर चुनौती बना। ऐसे हालात में बचावकर्मियों के लिए अंदर जाना भी जोखिमपूर्ण हो जाता है।
इस घटना ने टनल में वेंटिलेशन सिस्टम, ऑक्सीजन मॉनिटरिंग और इमरजेंसी अलर्ट सिस्टम की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े किए हैं। निर्माणाधीन सुरंगों में स्थायी सुरक्षा ढांचा पूरी तरह तैयार नहीं होता, इसलिए अस्थायी वेंटिलेशन और आपातकालीन व्यवस्था और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
सिर्फ रेस्क्यू एजेंसियां काफी नहीं, अंदर का सिस्टम भी मजबूत होना जरूरी
एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, पुलिस, फायर सर्विस और अन्य एजेंसियों का समय पर पहुंचना महत्वपूर्ण है, लेकिन किसी भी बड़े टनल प्रोजेक्ट की पहली सुरक्षा लाइन परियोजना के भीतर मौजूद व्यवस्था होती है।
अचानक खतरा आने पर मजदूरों को चेतावनी देना, उनकी लोकेशन पता करना, सुरक्षित हिस्से तक पहुंचाना और बाहर कंट्रोल रूम को लगातार जानकारी देना ऐसी व्यवस्थाएं हैं जिन्हें बाहरी रेस्क्यू टीम के पहुंचने का इंतजार नहीं करना चाहिए।
मॉक ड्रिल हुई थी, फिर सवाल क्यों?
इस परियोजना में जुलाई 2025 में बाढ़ जैसी आपात स्थिति को लेकर मल्टी-एजेंसी मॉक ड्रिल भी आयोजित की गई थी। इसमें एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, सीआईएसएफ, स्थानीय पुलिस और परियोजना से जुड़ी टीमें शामिल हुई थीं।
मॉक ड्रिल का उद्देश्य ही वास्तविक आपदा से पहले कमियों को पहचानना होता है। इसलिए अब जांच का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह होना चाहिए कि वास्तविक हादसे के समय अर्ली वार्निंग और आपदा प्रतिक्रिया प्रणाली कितनी प्रभावी साबित हुई।
सिर्फ कागज पर सुरक्षा व्यवस्था मौजूद होना पर्याप्त नहीं है। वास्तविक खतरे के समय उसका काम करना ज्यादा महत्वपूर्ण है।
एक ही परियोजना में पहले भी हो चुका है हादसा
विष्णुगाड़-पीपलकोटी परियोजना में इससे पहले भी गंभीर घटना सामने आ चुकी है। दिसंबर 2025 में परियोजना की सुरंग में दो लोको ट्रेनों की टक्कर की घटना हुई थी, जिसमें मजदूरों और कर्मचारियों के घायल होने की जानकारी सामने आई थी।
दो घटनाओं के कारण एक जैसे हों, यह कहना जांच पूरी होने से पहले उचित नहीं होगा। लेकिन एक ही परियोजना में लगातार गंभीर घटनाएं सामने आने के बाद पूरी सुरक्षा व्यवस्था की स्वतंत्र और व्यापक समीक्षा जरूर जरूरी हो जाती है।
जांच सिर्फ मलबे तक सीमित नहीं रहनी चाहिए
हादसे की जांच में यह पता लगाना जरूरी होगा कि पानी और मलबा टनल में किस तरह पहुंचा। लेकिन जांच इससे आगे भी जानी चाहिए।
इन सवालों पर भी ध्यान देना होगा:
- हादसे से पहले मौसम और भूगर्भीय परिस्थितियां कैसी थीं?
- भूमिगत पानी के दबाव की निगरानी कैसे की जा रही थी?
- टनल में काम जारी रखने का निर्णय किन सुरक्षा मानकों पर लिया गया?
- मजदूरों की लोकेशन का रियल टाइम रिकॉर्ड उपलब्ध था या नहीं?
- आपातकालीन संचार व्यवस्था कितनी प्रभावी थी?
- वैकल्पिक निकासी मार्ग उपलब्ध था या नहीं?
- ऑक्सीजन और वेंटिलेशन की लगातार निगरानी हो रही थी या नहीं?
- आपातकालीन बिजली, रोशनी और चेतावनी प्रणाली काम कर रही थी या नहीं?
इन सवालों के जवाब ही यह बताएंगे कि हादसा पूरी तरह अचानक था या जोखिम के कुछ संकेत पहले से मौजूद थे।
विकास जरूरी, लेकिन सुरक्षा की कीमत पर नहीं
विष्णुगाड़-पीपलकोटी 444 मेगावाट की जलविद्युत परियोजना है। उत्तराखंड और देश की ऊर्जा जरूरतों के लिहाज से ऐसी परियोजनाएं महत्वपूर्ण हैं। इसलिए समाधान विकास कार्यों को रोकना नहीं, बल्कि उन्हें ज्यादा सुरक्षित और वैज्ञानिक तरीके से आगे बढ़ाना है।
हिमालय में सुरंग निर्माण के दौरान भूगर्भीय परिस्थितियां तेजी से बदल सकती हैं। इसलिए यहां नियमित स्वतंत्र सुरक्षा ऑडिट, रियल टाइम मॉनिटरिंग, बेहतर वेंटिलेशन, ऑक्सीजन सेंसर, अर्ली वार्निंग सिस्टम, वैकल्पिक निकासी मार्ग और नियमित आपदा अभ्यास को औपचारिकता के बजाय अनिवार्य सुरक्षा व्यवस्था बनाना होगा।