अलवर में दिवाली हाट बाजार पर घमासान: प्रशासन की पहल पर सवाल, सड़क पर उतरे छोटे दुकानदार..
अलवर। दीपावली देश के सबसे बड़े और महत्वपूर्ण त्योहारों में शुमार है। धार्मिक और सामाजिक महत्व के साथ-साथ यह पर्व व्यापारिक दृष्टि से भी बेहद खास माना जाता है। दीपोत्सव के साथ ही बाजारों में खरीदारी का सिलसिला तेज हो जाता है और कारोबारियों से लेकर छोटे फुटकर दुकानदारों तक को इस त्योहार से बड़ी उम्मीदें होती हैं। खासकर गरीब और निम्न आय वर्ग के परिवारों के लिए दीपावली महज एक त्योहार नहीं, बल्कि सालभर की आर्थिक जरूरतों को पूरा करने का एक महत्वपूर्ण अवसर होती है।

मुख्य बातें
- अलवर में दिवाली हाट को लेकर बवाल: दुकानदारों ने प्रशासन के खिलाफ खोला मोर्चा..
- अलवर नगर निगम की दिवाली प्लानिंग फेल? दुकानदारों ने नए हाट में जाने से किया इनकार..
- शहर सुंदरीकरण vs रोजी-रोटी: अलवर में दिवाली हाट को लेकर बढ़ा तनाव..
02-11-2026 अलवर:
शहर की सुंदरता और यातायात व्यवस्था सुधारने के लिए कंपनी बाग रोड पर तैयार किया गया आकर्षक हाट बाजार; लेकिन ऐन दीपावली से पहले दुकानों की शिफ्टिंग को लेकर बढ़ा विवाद, चार पीढ़ियों से बाजार में दुकान लगा रहे परिवारों को सता रही रोजी-रोटी की चिंता।*
अलवर। दीपावली देश के सबसे बड़े और महत्वपूर्ण त्योहारों में शुमार है। धार्मिक और सामाजिक महत्व के साथ-साथ यह पर्व व्यापारिक दृष्टि से भी बेहद खास माना जाता है। दीपोत्सव के साथ ही बाजारों में खरीदारी का सिलसिला तेज हो जाता है और कारोबारियों से लेकर छोटे फुटकर दुकानदारों तक को इस त्योहार से बड़ी उम्मीदें होती हैं। खासकर गरीब और निम्न आय वर्ग के परिवारों के लिए दीपावली महज एक त्योहार नहीं, बल्कि सालभर की आर्थिक जरूरतों को पूरा करने का एक महत्वपूर्ण अवसर होती है।
दीपावली से आठ-दस दिन पहले ही शहरों के मुख्य बाजारों में सड़क किनारे और फुटपाथों पर अस्थायी दुकानें सजने लगती हैं। कहीं मिट्टी के दीये और खिलौने बिकते हैं तो कहीं देवी-देवताओं की मूर्तियां, पोस्टर, पूजन सामग्री और सजावट के सामान की दुकानें नजर आती हैं। इन छोटी-छोटी दुकानों के सहारे कई परिवार अपनी रोजी-रोटी चलाते हैं। उन्हें उम्मीद रहती है कि दीपावली पर होने वाली कमाई से कुछ पैसे बचेंगे, जिनसे बच्चों की पढ़ाई, घर की जरूरतें और अन्य जरूरी खर्च पूरे किए जा सकेंगे।
लेकिन इस बार अलवर में दीपावली से महज चार-पांच दिन पहले नगर निगम की एक नई पहल ने इन छोटे दुकानदारों के सामने असमंजस की स्थिति खड़ी कर दी है। निगम ने शहर के मुख्य बाजारों में लगने वाली अस्थायी दुकानों को व्यवस्थित करने के लिए कंपनी बाग रोड पर आकर्षक दिवाली हाट बाजार विकसित किया है। अब इन दुकानदारों को मुख्य बाजारों से हटाकर वहां दुकानें लगाने के लिए पाबंद किया जा रहा है। हालांकि, दुकानदार इस व्यवस्था को लेकर आशंकित हैं। उन्हें डर है कि नए स्थान पर ग्राहक पहुंचेंगे या नहीं और वहां उनकी बिक्री हो पाएगी या नहीं।
इसी को लेकर सोमवार को नगर निगम के अधिकारी पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंचे और दुकानदारों को समझाइश देकर हाट बाजार में शिफ्ट होने के लिए कहा। लेकिन दोनों पक्षों के बीच सहमति नहीं बन सकी। दुकानदारों ने वहां जाने से इनकार किया। इसके बाद जब उन्हें हटाने और दूसरी जगह भेजने की कोशिश की गई तो मामला गरमा गया। देखते ही देखते दुकानदारों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया और प्रशासन की इस व्यवस्था पर सवाल खड़े किए।
*क्या है प्रशासन की मंशा?*
दरअसल, अलवर में पहली बार दीपावली के अवसर पर अस्थायी दुकानदारों के लिए इस तरह का विशेष हाट बाजार विकसित किया गया है। कंपनी बाग रोड पर तैयार किए गए इस बाजार को आकर्षक स्वरूप देने के लिए रंग-बिरंगी कैनोपी, रोशनी और अन्य सजावटी व्यवस्थाएं की गई हैं। खास बात यह है कि दुकानदारों को यहां दुकानें लगाने के लिए निशुल्क स्थान उपलब्ध कराया जा रहा है।
प्रशासन की इस पहल के पीछे मुख्य उद्देश्य शहर के प्रमुख बाजारों को अतिक्रमण और अव्यवस्थित यातायात से राहत दिलाना है। होप सर्कस, घंटाघर, पंसारी बाजार और नगर निगम के आसपास दीपावली के दौरान सैकड़ों अस्थायी दुकानें लगती हैं। इनकी वजह से बाजारों में भीड़ बढ़ जाती है, आमजन को आवागमन में परेशानी होती है और कई बार जाम के हालात बन जाते हैं। दीपावली के साथ ही शादी-ब्याह का सीजन भी शुरू होने से बाजारों में खरीदारों की संख्या और बढ़ जाती है।
ऐसे में निगम की मंशा है कि सभी अस्थायी दुकानों को एक ही स्थान पर व्यवस्थित कर दिया जाए, ताकि मुख्य बाजारों में यातायात सुचारू रहे और शहरवासियों को एक ही जगह दीपावली की खरीदारी का विकल्प मिल सके। साथ ही हाट बाजार को सुंदर और व्यवस्थित स्वरूप देकर शहर की तस्वीर भी बदली जा सके।
*अच्छी पहल, लेकिन समय और संवाद की कमी बनी विवाद की वजह*
निश्चित रूप से प्रशासन की सोच और पहल अपने आप में सकारात्मक है। शहर को अतिक्रमण मुक्त बनाने, यातायात व्यवस्था सुधारने और छोटे दुकानदारों को एक व्यवस्थित स्थान उपलब्ध कराने का प्रयास सराहनीय कहा जा सकता है। लेकिन किसी भी अच्छी योजना की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसे किस समय और किस तरीके से लागू किया जाता है।
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि प्रशासन को दीपावली हाट बाजार विकसित करना था तो इसकी योजना पहले क्यों नहीं बनाई गई? दुकानदारों को विश्वास में लेकर शुरुआत से ही नई जगह पर दुकानें लगाने की व्यवस्था क्यों नहीं की गई? दीपावली से ठीक पहले, जब दुकानदार अपनी दुकानें जमा चुके हैं और त्योहार की बिक्री को लेकर उम्मीदें लगाए बैठे हैं, तब उन्हें अचानक स्थान बदलने के लिए कहना उनके लिए मुश्किलें खड़ी कर रहा है।
दुकानदारों की चिंता भी पूरी तरह निराधार नहीं है। उन्हें आशंका है कि मुख्य बाजार से हटकर नए स्थान पर जाने के बाद ग्राहक शायद वहां तक नहीं पहुंचें। ऐसे में उनकी बिक्री प्रभावित हो सकती है। दूसरी चिंता यह भी है कि यदि वे अपनी पुरानी जगह छोड़कर चले गए तो कहीं उस स्थान पर कोई दूसरा दुकानदार कब्जा न कर ले। इनमें कई ऐसे परिवार भी हैं जो चार पीढ़ियों से इन्हीं बाजारों में दीपावली के दौरान दुकानें लगाकर अपना जीवनयापन करते आ रहे हैं। ऐसे परिवारों के लिए पुरानी जगह छोड़ना केवल स्थान परिवर्तन नहीं, बल्कि अपनी वर्षों पुरानी आजीविका को जोखिम में डालने जैसा है।
*अब प्रशासन के सामने विश्वास बहाली की चुनौती*
ऐसे में जरूरत इस बात की है कि नगर निगम और जिला प्रशासन दुकानदारों की आशंकाओं को गंभीरता से सुने और जल्द से जल्द उनका समाधान निकाले। उन्हें नए हाट बाजार में ग्राहकों की उपलब्धता, सुरक्षा, मूलभूत सुविधाओं और दुकान आवंटन को लेकर स्पष्ट आश्वासन दिया जाना चाहिए। साथ ही यह भरोसा भी दिलाना जरूरी है कि पुरानी जगहों पर किसी अन्य व्यक्ति को कब्जा नहीं करने दिया जाएगा।
दीपावली का त्योहार खुशियां बांटने और हर वर्ग के जीवन में रोशनी लाने का संदेश देता है। ऐसे में यह सुनिश्चित करना प्रशासन की जिम्मेदारी है कि शहर को सुंदर और व्यवस्थित बनाने की कोशिश में उन गरीब परिवारों की खुशियां और रोजी-रोटी प्रभावित न हों, जिनके लिए दीपावली की ये चंद दिनों की कमाई पूरे साल की आर्थिक जरूरतों में सहारा बनती है।
आखिरकार, किसी भी शहर की खूबसूरती केवल सजी हुई सड़कों, आकर्षक रोशनी और व्यवस्थित बाजारों से नहीं, बल्कि वहां रहने वाले हर वर्ग के लोगों की खुशहाली से तय होती है। इसलिए इस पूरे मामले में शहर की सुंदरता और प्रशासनिक व्यवस्था के साथ-साथ गरीब दुकानदारों के हितों को भी समान प्राथमिकता मिलनी चाहिए। वरना इस खींचतान में नुकसान केवल उन छोटे दुकानदारों का होगा, जिनकी उम्मीदें इसी दीपावली की कमाई से जुड़ी हैं।
प्रशासन का पक्ष
आखिरकार, किसी भी शहर की खूबसूरती केवल सजी हुई सड़कों, आकर्षक रोशनी और व्यवस्थित बाजारों से नहीं, बल्कि वहां रहने वाले हर वर्ग के लोगों की खुशहाली से तय होती है। इसलिए इस पूरे मामले में शहर की सुंदरता और प्रशासनिक व्यवस्था के साथ-साथ गरीब दुकानदारों के हितों को भी समान प्राथमिकता मिलनी चाहिए। वरना इस खींचतान में नुकसान केवल उन छोटे दुकानदारों का होगा, जिनकी उम्मीदें इसी दीपावली की कमाई से जुड़ी हैं।
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