चाबहार पोर्ट पर हमले से भारत की रणनीतिक चिंता बढ़ी, पाकिस्तान को क्यों दिख रहा फायदा?
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका द्वारा ईरान के सामरिक महत्व वाले चाबहार पोर्ट पर किए गए हमले ने भारत की रणनीतिक और आर्थिक चिंताओं को बढ़ा दिया है। चाबहार पोर्ट भारत की उस दीर्घकालिक योजना का अहम हिस्सा रहा है, जिसके जरिए पाकिस्तान को बायपास कर अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक व्यापारिक पहुंच बनाई जानी थी। विशेषज्ञों का मानना है कि क्षेत्र में बढ़ती अस्थिरता से इस परियोजना की रफ्तार प्रभावित हो सकती है, जबकि इससे पाकिस्तान और चीन को रणनीतिक बढ़त मिलने की संभावना भी बढ़ी है।
चाबहार पोर्ट पर हमले से बढ़ी अनिश्चितता
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव के बीच चाबहार पोर्ट भी संघर्ष की चपेट में आ गया। यह बंदरगाह ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत में स्थित है और भारत के लिए रणनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। हालिया घटनाक्रम के बाद इस परियोजना के भविष्य को लेकर नई चिंताएं सामने आई हैं। हालांकि फिलहाल भारत की ओर से पोर्ट का प्रत्यक्ष संचालन नहीं किया जा रहा है, लेकिन सुरक्षा हालात बिगड़ने से भविष्य की योजनाओं पर असर पड़ सकता है।
भारत के लिए क्यों अहम है चाबहार पोर्ट
चाबहार पोर्ट भारत को पाकिस्तान की जमीन का इस्तेमाल किए बिना अफगानिस्तान, मध्य एशिया और आगे यूरोप तक व्यापारिक संपर्क उपलब्ध कराने का विकल्प देता है। यही कारण है कि पिछले दो दशकों से भारत इस परियोजना को अपनी कनेक्टिविटी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा मानता रहा है। यह बंदरगाह अंतरराष्ट्रीय नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) के लिए भी एक अहम कड़ी माना जाता है, जिससे भारत के व्यापारिक मार्गों का विस्तार संभव हो सकता है।
अमेरिकी प्रतिबंधों से पहले ही प्रभावित थी परियोजना
ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते भारत को पहले भी चाबहार परियोजना में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। भारत ने अपने निवेश की सुरक्षा और भविष्य की संभावनाओं को बनाए रखने के लिए संचालन संबंधी कुछ व्यवस्थाओं में बदलाव किया था। वर्ष 2024 में दोनों देशों के बीच टर्मिनल संचालन को लेकर दीर्घकालिक समझौता हुआ था, लेकिन क्षेत्रीय तनाव और प्रतिबंधों ने परियोजना की गति को प्रभावित किया।
रणनीतिक नुकसान की आशंका
विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा हालात का सबसे बड़ा असर भारत की दीर्घकालिक रणनीतिक योजनाओं पर पड़ सकता है। यदि क्षेत्र में अस्थिरता लंबे समय तक बनी रहती है तो चाबहार के जरिए व्यापारिक गलियारा विकसित करने की भारत की योजना प्रभावित हो सकती है। इससे पश्चिम और मध्य एशिया तक भारत की पहुंच सीमित होने का खतरा भी बढ़ सकता है।
पाकिस्तान और चीन को मिल सकती है बढ़त
चाबहार पोर्ट को अक्सर पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट के विकल्प के रूप में देखा जाता है। ग्वादर पोर्ट चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) का प्रमुख हिस्सा है। यदि चाबहार परियोजना धीमी पड़ती है, तो क्षेत्रीय व्यापार और समुद्री संपर्क में ग्वादर की रणनीतिक अहमियत बढ़ सकती है। यही वजह है कि मौजूदा घटनाक्रम को पाकिस्तान और चीन के लिए संभावित रणनीतिक लाभ के रूप में भी देखा जा रहा है।
भारत की आगे की रणनीति पर नजर
क्षेत्रीय हालात को देखते हुए भारत आने वाले समय में अपनी कूटनीतिक और व्यापारिक रणनीति का पुनर्मूल्यांकन कर सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत चाबहार परियोजना को पूरी तरह छोड़ने के बजाय परिस्थितियों के सामान्य होने का इंतजार करेगा और वैकल्पिक व्यापारिक मार्गों पर भी समानांतर काम जारी रखेगा।