आयरलैंड से आए, जोधपुर की जल विरासत के बन गए प्रहरी; ‘पागल बाबा’ की 11 साल की अनोखी मुहिम
आयरलैंड मूल के पर्यावरण प्रेमी कैरॉन लेन पियरे रॉन्सले पिछले 11 वर्षों से जोधपुर की ऐतिहासिक बावड़ियों, कुओं और जलाशयों की सफाई व संरक्षण में जुटे हैं। बिना किसी निजी स्वार्थ के चलाए जा रहे उनके अभियान ने न केवल शहर की जल धरोहरों को नया जीवन दिया, बल्कि जल संरक्षण के प्रति लोगों में भी नई जागरूकता पैदा की। स्थानीय लोग उन्हें स्नेहपूर्वक ‘पागल बाबा’ कहते हैं, जबकि हाल ही में उद्योगपति आनंद महिंद्रा ने भी उनके कार्य की सराहना की।
पर्यटक बनकर आए, संरक्षण का संकल्प लेकर यहीं रुक गए
कैरॉन लेन पियरे रॉन्सले पहली बार आयरलैंड से पर्यटक के रूप में जोधपुर पहुंचे थे। शहर की प्राचीन बावड़ियों, झालरों और पारंपरिक जल संरचनाओं की अनूठी वास्तुकला ने उन्हें प्रभावित किया, लेकिन इन ऐतिहासिक धरोहरों की बदहाल स्थिति देखकर उन्होंने इन्हें बचाने का संकल्प लिया। इसके बाद उन्होंने जोधपुर को ही अपनी कर्मभूमि बना लिया और बिना किसी सरकारी सहायता या निजी लाभ की अपेक्षा के जल स्रोतों की सफाई और संरक्षण का अभियान शुरू कर दिया। आज उनका यह प्रयास पर्यावरण संरक्षण का प्रेरणादायी उदाहरण बन चुका है।
कई ऐतिहासिक जलाशयों को दिया नया जीवन
रॉन्सले ने जोधपुर की कई ऐतिहासिक जल संरचनाओं के संरक्षण में सक्रिय भूमिका निभाई है। तूरजी का झालरा, गुलाब सागर, मायला बाग झालरा, जाड़ेचीजी झालरा, नवलखा झालरा, नवी बावड़ी, राम बावड़ी, हाथी बावड़ी, तापी बावड़ी, नाजरजी की बावड़ी और सूरजकुंड जैसे कई जल स्रोतों की सफाई में उन्होंने वर्षों तक लगातार काम किया। उनके प्रयासों से कई जलाशय दोबारा स्वच्छ हुए और स्थानीय लोगों में इन ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण के प्रति जागरूकता भी बढ़ी। इस अभियान में मेहरानगढ़ म्यूजियम ट्रस्ट और अन्य संस्थाओं का भी सहयोग मिला।
‘पागल बाबा’ कहकर उड़ाया मजाक, लेकिन नहीं छोड़ा अभियान
जब कैरॉन ने इस मुहिम की शुरुआत की, तब कई लोग उनके काम का मजाक उड़ाते थे और उन्हें ‘पागल बाबा’ कहकर बुलाते थे। सफाई अभियान के दौरान कई बार वे फिसलकर घायल भी हुए और गंभीर चोटों के कारण अस्पताल तक पहुंचना पड़ा। इसके बावजूद उन्होंने अपना अभियान नहीं छोड़ा। उनका कहना है कि यदि जल धरोहरों को बचाने के लिए लोग उन्हें पागल कहते हैं, तो उन्हें यह नाम स्वीकार है, क्योंकि समाज और पर्यावरण के लिए निस्वार्थ काम करने का जुनून ही उनकी सबसे बड़ी पहचान है।
‘अंतिम सांस तक जलाशयों की सफाई करना चाहता हूं’
कैरॉन बताते हैं कि उनके दादा हेनरी डोरम भारत में रेलवे इंजीनियर रहे थे, जिससे उनका भारत से एक भावनात्मक जुड़ाव भी रहा है। उनका मानना है कि राजस्थान की पारंपरिक जल संरचनाएं केवल ऐतिहासिक धरोहर नहीं, बल्कि आज के जल संकट का प्रभावी समाधान भी हैं। वे कहते हैं कि उनकी सबसे बड़ी इच्छा अंतिम सांस तक जोधपुर की बावड़ियों और जलाशयों की सफाई करते रहने की है। इसके लिए उन्हें कुछ आधुनिक उपकरण, पानी निकालने के पंप और स्वास्थ्य संबंधी सहायता की आवश्यकता है।
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देशभर में मिल रही सराहना
हाल ही में उद्योगपति आनंद महिंद्रा ने सोशल मीडिया पर कैरॉन रॉन्सले के कार्य की सराहना करते हुए उनका वीडियो साझा किया, जिसके बाद उनकी मुहिम राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आ गई। पर्यावरण संरक्षण और जल विरासत को बचाने के उनके प्रयासों की देशभर में प्रशंसा हो रही है। स्थानीय लोग भी अब उन्हें सम्मान की नजर से देखते हैं और उनकी पहल को आने वाली पीढ़ियों के लिए महत्वपूर्ण मानते हैं।
मिल चुके हैं कई प्रतिष्ठित सम्मान
जोधपुर की जल धरोहरों के संरक्षण में उल्लेखनीय योगदान के लिए कैरॉन लेन पियरे रॉन्सले को कई सम्मान मिल चुके हैं। वर्ष 2016 में उन्हें ‘वीर दुर्गादास राठौड़ स्वर्ण पदक’ और ‘मारवाड़ रत्न सम्मान’ से सम्मानित किया गया था। उनके कार्य ने यह साबित किया है कि पर्यावरण संरक्षण के लिए केवल संसाधनों की नहीं, बल्कि दृढ़ संकल्प और निरंतर प्रयास की भी आवश्यकता होती है।
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