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आरक्षण में बदलाव की याचिका पर CJI सूर्यकांत की टिप्पणी, बोले- कोर्ट क्यों आए, प्रदर्शन करते

सुप्रीम कोर्ट में लोकसभा और विधानसभा सीटों पर आरक्षण व्यवस्था में रोटेशन लागू करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई हुई। इस दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने हल्के-फुल्के अंदाज में याचिकाकर्ता से कहा कि वे कोर्ट क्यों आए हैं, उन्हें प्रदर्शन करना चाहिए था। याचिका में उत्तर प्रदेश की कादीपुर विधानसभा सीट पर लंबे समय से अनुसूचित जाति के लिए आरक्षण जारी रहने पर सवाल उठाया गया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि चुनावी आरक्षण व्यवस्था में बदलाव करना विधायिका का काम है। न्यायपालिका संसद की भूमिका नहीं निभा सकती।

CJI न्यायाधीश सूर्यकांत
फोटो: STV NEWS RAJASTHAN

05 NOV.2026:

कादीपुर सीट के आरक्षण में बदलाव की मांग

यह याचिका उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले की कादीपुर विधानसभा सीट से जुड़े एक मतदाता ने दाखिल की थी। याचिकाकर्ता का कहना था कि वर्ष 1952 से यह सीट अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित है। पिछले सात दशक से अधिक समय से इसमें बदलाव नहीं हुआ है।याचिका में दावा किया गया कि लंबे समय तक सीट आरक्षित रहने से क्षेत्र के राजनीतिक प्रतिनिधित्व के अवसर सीमित हुए हैं। याचिकाकर्ता के अनुसार, इसका लाभ केवल चार-पांच परिवारों तक सीमित रहा है। इसलिए लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों में आरक्षण के लिए रोटेशन प्रणाली लागू करने की मांग की गई।

सुनवाई के दौरान CJI ने हल्के-फुल्के अंदाज में की टिप्पणी

इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति वी. मोहना और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने की। सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्यकांत ने याचिकाकर्ता से मजाकिया लहजे में कहा, "आप गलत नंबर डायल कर रहे हैं। यह तो विरोध प्रदर्शनों का दौर है। शायद आपको भी ऐसा ही करना चाहिए।"इस पर याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि उनका प्रदर्शन करने का कोई इरादा नहीं है। उन्होंने मजाकिया अंदाज में यह भी बताया कि याचिकाकर्ता का गला खराब है। अदालत में हुई इस बातचीत के दौरान आरक्षण व्यवस्था में बदलाव के संवैधानिक पहलुओं पर भी चर्चा हुई।

अनुच्छेद 14, 15 और 19 का दिया हवाला

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि लोकसभा और विधानसभा सीटों पर आरक्षण की रोटेशन व्यवस्था नहीं होने से संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 19 के अधिकार प्रभावित होते हैं। उनका कहना था कि लगातार एक ही सीट आरक्षित रहने से मतदाताओं के सामने उम्मीदवार चुनने के विकल्प सीमित हो जाते हैं।याचिका में स्थानीय निकायों का उदाहरण भी दिया गया। इसमें कहा गया कि नगरपालिकाओं और पंचायतों में आरक्षण के लिए रोटेशन प्रणाली लागू होती है। इसी तरह की व्यवस्था विधानसभा और लोकसभा सीटों पर भी होनी चाहिए।

जस्टिस बागची बोले- जाति के आधार पर वोट करना जरूरी नहीं

याचिकाकर्ता की दलीलों पर न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने टिप्पणी की कि यह तर्क इस धारणा पर आधारित है कि बहुसंख्यक समुदाय जाति के आधार पर ही मतदान करेगा। लेकिन ऐसा जरूरी नहीं है।उन्होंने कहा कि उम्मीदवार की जाति से मतदाताओं के मतदान के अधिकार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतदाता अपने विवेक से उम्मीदवार का चुनाव करते हैं। अदालत लोकतांत्रिक विकल्पों को लेकर इस तरह का फैसला नहीं सुना सकती।

सुप्रीम कोर्ट बोला- हम संसद का तीसरा सदन नहीं

स्थानीय निकायों में रोटेशन प्रणाली का हवाला देकर लोकसभा और विधानसभा में भी ऐसी व्यवस्था लागू करने की मांग पर अदालत ने संवैधानिक सीमाएं स्पष्ट कीं।न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि पंचायतों और नगरपालिकाओं के चुनावों का संवैधानिक ढांचा अलग है। अदालत मौजूदा संवैधानिक प्रावधानों को दोबारा नहीं लिख सकती। उन्होंने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट संसद का तीसरा सदन नहीं है। इस तरह की नीतिगत व्यवस्था में बदलाव करना विधायिका के अधिकार क्षेत्र में आता है।

संसद में आवाज उठाने की सलाह

सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि याचिकाकर्ता अपनी मांग को लेकर आवाज उठा सकते हैं। वे यह मुद्दा उठा सकते हैं कि संसद के लिए इस विषय पर दोबारा विचार करने का समय आ गया है।हालांकि, अदालत ने संकेत दिया कि आरक्षण की रोटेशन व्यवस्था में बदलाव का फैसला संसद को ही करना होगा। यानी इस तरह के नीतिगत और विधायी बदलाव की जिम्मेदारी न्यायपालिका के बजाय विधायिका की है।

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