101 नरमुंड की सनक और 86 कत्ल: कैसे खत्म हुआ गैंगस्टर श्रीप्रकाश शुक्ला का आतंक?
उत्तर प्रदेश के अपराध जगत में 90 के दशक का एक ऐसा नाम था, जिसने पुलिस, प्रशासन और राजनीतिक गलियारों तक में खौफ पैदा कर दिया था। यह नाम था श्रीप्रकाश शुक्ला। एक साधारण शिक्षक परिवार से निकलकर वह ऐसा खूंखार अपराधी बना, जिसके खिलाफ विशेष टास्क फोर्स (STF) तक का गठन करना पड़ा। हत्या, रंगदारी, राजनीतिक दुश्मनी और मुख्यमंत्री की कथित सुपारी जैसे मामलों ने उसे देश के सबसे चर्चित गैंगस्टरों में शामिल कर दिया। उसकी जिंदगी का अंत पुलिस मुठभेड़ में हुआ, लेकिन उसकी कहानी आज भी अपराध इतिहास के सबसे चर्चित अध्यायों में गिनी जाती है।
बहन से छेड़छाड़ की घटना बनी अपराध की शुरुआत
गोरखपुर जिले के मामखोर गांव में जन्मे श्रीप्रकाश शुक्ला का शुरुआती जीवन सामान्य था। परिवार चाहता था कि वह पढ़-लिखकर बेहतर भविष्य बनाए, लेकिन एक घटना ने उसकी जिंदगी की दिशा बदल दी। बताया जाता है कि उसकी बहन के साथ छेड़छाड़ की घटना से वह इतना आक्रोशित हुआ कि उसने आरोपी युवक की दिनदहाड़े हत्या कर दी। यही वह अपराध था जिसने उसे कानून के दायरे से बाहर धकेल दिया। इसके बाद वह लगातार अपराध की दुनिया में आगे बढ़ता गया और जल्द ही पूर्वांचल के अपराध जगत में उसकी पहचान बनने लगी।
राजनीतिक दुश्मनी और हाई-प्रोफाइल हत्याओं से बढ़ा आतंक
अपराध की दुनिया में पैर जमाने के बाद श्रीप्रकाश शुक्ला ने कई हाई-प्रोफाइल लोगों को निशाना बनाया। पूर्वांचल के प्रभावशाली नेता वीरेंद्र प्रताप शाही पर हमले और बाद में उनकी हत्या ने उसे राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में ला दिया। इसके कुछ ही महीनों बाद लखनऊ में ठेकेदार भानू प्रकाश मिश्रा की सनसनीखेज हत्या ने पूरे प्रदेश को दहला दिया। इस घटना में अत्याधुनिक हथियारों का इस्तेमाल हुआ और ताबड़तोड़ फायरिंग ने पुलिस को भी चौंका दिया। इन वारदातों के बाद श्रीप्रकाश शुक्ला का नाम उत्तर प्रदेश के सबसे खतरनाक अपराधियों में शामिल हो गया।
मुख्यमंत्री की सुपारी की खबर और STF का गठन
श्रीप्रकाश शुक्ला के अपराध लगातार बढ़ते जा रहे थे। इसी दौरान यह खबर सामने आई कि उसने तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की हत्या की सुपारी ले रखी है। इस सूचना ने सरकार और पुलिस तंत्र को अलर्ट कर दिया। माना गया कि सामान्य पुलिस बल के लिए उसे पकड़ना आसान नहीं होगा। इसी चुनौती से निपटने के लिए वर्ष 1998 में उत्तर प्रदेश स्पेशल टास्क फोर्स (STF) का गठन किया गया। इस विशेष इकाई का प्रमुख लक्ष्य श्रीप्रकाश शुक्ला और उसके गिरोह के नेटवर्क को खत्म करना था।
दिल्ली और नेपाल तक फैला था छिपने का नेटवर्क
पुलिस दबाव बढ़ने पर श्रीप्रकाश शुक्ला ने अपने ठिकाने लगातार बदलने शुरू कर दिए। उसने दिल्ली में किराए के फ्लैट से लेकर नेपाल सीमा तक सुरक्षित ठिकाने तैयार कर रखे थे। वह मोबाइल फोन और सिम कार्ड बदल-बदलकर इस्तेमाल करता था ताकि पुलिस उसकी लोकेशन ट्रेस न कर सके। उसके गिरोह के सदस्य भी अत्यधिक सतर्क रहते थे। इसके बावजूद पुलिस लगातार उसके करीब पहुंच रही थी। STF ने तकनीकी निगरानी, मुखबिर नेटवर्क और गुप्त ऑपरेशन के जरिए उसके मूवमेंट पर नजर बनाए रखी।
101 नरमुंड की सनक और तांत्रिक की सलाह
श्रीप्रकाश शुक्ला की जिंदगी से जुड़ा एक चौंकाने वाला पहलू उसकी अंधविश्वासी सोच भी थी। बताया जाता है कि वह एक तांत्रिक के संपर्क में था और उससे सलाह लिया करता था। कथित तौर पर उसे यह विश्वास दिलाया गया था कि यदि वह 101 हत्याओं का आंकड़ा पूरा कर लेगा तो कोई उसे हरा नहीं सकेगा। यही कारण था कि उसके बारे में यह चर्चा फैल गई कि वह ‘101 नरमुंड’ की सनक में जी रहा है। पुलिस अधिकारियों के अनुसार, मुठभेड़ में मारे जाने से पहले उसके खाते में 86 से अधिक हत्याएं दर्ज मानी जाती थीं।
STF एनकाउंटर में खत्म हुआ आतंक का अध्याय
लगातार पीछा करने और कई महीनों की निगरानी के बाद STF को आखिरकार सफलता मिली। गाजियाबाद क्षेत्र में हुई एक मुठभेड़ में श्रीप्रकाश शुक्ला अपने साथियों के साथ पुलिस के घेरे में आ गया। दोनों ओर से हुई फायरिंग में वह मारा गया और उसके साथ अपराध जगत का एक खौफनाक अध्याय भी समाप्त हो गया। उसके एनकाउंटर के बाद उत्तर प्रदेश में संगठित अपराध के खिलाफ पुलिस की कार्रवाई को नई दिशा मिली। आज भी श्रीप्रकाश शुक्ला का नाम उत्तर प्रदेश के अपराध इतिहास में सबसे चर्चित गैंगस्टरों में लिया जाता है।