जोधपुर में पीढ़ियों से मिट्टी के दीये बना रहा रामलाल का परिवार, दिवाली पर बढ़ी मांग
जोधपुर। दीपावली नजदीक आते ही बाजारों में मिट्टी के पारंपरिक दीयों की मांग बढ़ने लगी है। जोधपुर में रामलाल का परिवार कई पीढ़ियों से मिट्टी के दीये और अन्य वस्तुएं बनाने का काम कर रहा है। त्योहार के करीब आते ही परिवार के सभी सदस्य दीये तैयार करने में जुट जाते हैं। रामलाल का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से मिट्टी के दीयों और पारंपरिक उत्पादों को प्रोत्साहन दिए जाने के बाद इनकी मांग में बढ़ोतरी देखने को मिली है। उन्होंने बताया कि ऑर्डर इतने मिल रहे हैं कि दिन-रात मेहनत करने के बावजूद मांग पूरी करना मुश्किल हो रहा है।
दीपावली से पहले कुम्हार परिवारों की बढ़ी व्यस्तता
दीपावली पर घरों, दुकानों और आंगनों को मिट्टी के दीयों से सजाने की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। आधुनिक सजावटी लाइटों के बीच भी पारंपरिक दीपकों का महत्व बना हुआ है। यही वजह है कि त्योहार से पहले कुम्हार परिवारों के काम में तेजी आ जाती है।जोधपुर में रामलाल का परिवार भी इन दिनों दीये बनाने में व्यस्त है। परिवार के सदस्य मिलकर मिट्टी तैयार करने, दीयों को आकार देने और उन्हें सुखाने जैसे काम करते हैं। दीपावली के दौरान मांग बढ़ने से काम का दबाव भी बढ़ जाता है।रामलाल के अनुसार, इस समय परिवार का पूरा ध्यान ज्यादा से ज्यादा दीये तैयार करने पर है, ताकि ग्राहकों की जरूरत पूरी की जा सके।
मिट्टी से दीया बनाने तक की पूरी प्रक्रिया
मिट्टी का दीया बनाना देखने में आसान लग सकता है, लेकिन इसके पीछे काफी मेहनत और अनुभव होता है। सबसे पहले उपयुक्त मिट्टी जुटाई जाती है। इसके बाद उसमें से कंकड़-पत्थर और दूसरी अशुद्धियां हटाई जाती हैं।साफ मिट्टी को पानी की मदद से अच्छी तरह गूंथा जाता है, ताकि वह आकार देने के लिए तैयार हो सके। इसके बाद कुम्हार अपने हुनर और अनुभव से मिट्टी को दीये का रूप देते हैं।तैयार दीयों को पहले सुखाया जाता है। इसके बाद पारंपरिक तरीके से पकाकर उन्हें इस्तेमाल के लिए तैयार किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में समय, धैर्य और मेहनत की जरूरत होती है।दीपावली के दौरान काम बढ़ने के कारण परिवार के सभी सदस्य इस प्रक्रिया में सहयोग करते हैं। दीयों के अलावा मिट्टी से बनने वाली अन्य वस्तुएं भी तैयार की जाती हैं।
प्रधानमंत्री मोदी के प्रोत्साहन से मांग बढ़ने का दावा
रामलाल का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से मिट्टी के दीपकों और पारंपरिक उत्पादों को प्रोत्साहित किए जाने के बाद इनकी मांग में बढ़ोतरी हुई है। उनके मुताबिक, अब आसपास के शहरों से भी दीयों के ऑर्डर मिलने लगे हैं।रामलाल बताते हैं कि कई बार मांग इतनी बढ़ जाती है कि लगातार काम करने के बाद भी पर्याप्त दीये तैयार करना चुनौती बन जाता है। त्योहार के समय ग्राहकों की जरूरत पूरी करने के लिए परिवार को अधिक समय तक काम करना पड़ता है।उनका कहना है कि जब लोग उनके बनाए दीये खरीदकर घरों में जलाते हैं, तो उन्हें खुशी होती है। उनके लिए यह काम केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि दीपावली की परंपरा में योगदान देने का माध्यम भी है।
दादा-परदादा से नई पीढ़ी तक पहुंचा हुनर
रामलाल का परिवार कई पीढ़ियों से मिट्टी के दीये और अन्य सामान बनाने का काम करता आ रहा है। उनके दादा-परदादा और पिता भी इसी पारंपरिक व्यवसाय से जुड़े रहे। अब परिवार की नई पीढ़ी भी इस हुनर को आगे बढ़ा रही है।दीपावली के दिनों में परिवार के सभी सदस्य मिलकर काम करते हैं। कोई मिट्टी तैयार करता है, तो कोई दीयों को आकार देने और सुखाने में मदद करता है। इस तरह पारंपरिक कारीगरी परिवार की आजीविका और सांस्कृतिक विरासत दोनों से जुड़ी हुई है।रामलाल के परिवार के लिए यह काम केवल पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा नहीं, बल्कि रोजी-रोटी का महत्वपूर्ण आधार भी है। त्योहार के दौरान बढ़ने वाली मांग से परिवार को अतिरिक्त काम मिलने की उम्मीद रहती है।
मिट्टी के दीयों से जुड़ी है परंपरा और आजीविका
दीपावली पर मिट्टी के दीये जलाना रोशनी, खुशहाली और शुभता का प्रतीक माना जाता है। इन छोटे-छोटे दीपकों को तैयार करने वाले कुम्हारों की मेहनत भी इस परंपरा का अहम हिस्सा है।बाजारों में मिट्टी के दीयों की मांग बढ़ने से पारंपरिक कारीगरों को काम मिलने के अवसर बढ़ सकते हैं। हालांकि, उनकी वास्तविक आमदनी दीयों की बिक्री, उत्पादन लागत और बाजार में मिलने वाले भाव पर निर्भर करती है।जोधपुर में रामलाल का परिवार इसी परंपरा को आगे बढ़ा रहा है। दीपावली के लिए तैयार किए जा रहे हर दीये के पीछे परिवार का हुनर, मेहनत और उम्मीद जुड़ी है। जब ये दीये घरों और आंगनों को रोशन करेंगे, तो उनके साथ पीढ़ियों से चली आ रही कुम्हारों की कला भी त्योहार की चमक का हिस्सा बनेगी।