AIIMS जोधपुर में बेटे ने पिता को दिया नया जीवन, लीवर का हिस्सा दान कर बचाई जान
जोधपुर के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) में डॉक्टरों की टीम ने 51 वर्षीय मरीज का लीवर ट्रांसप्लांट सफलतापूर्वक किया। हरियाणा के नारनौल निवासी मरीज करीब 18 महीने से गंभीर लीवर बीमारी से जूझ रहे थे। उनकी हालत बिगड़ने पर लीवर ट्रांसप्लांट जरूरी हो गया था। ऐसे में बेटे ने अपने लीवर का एक हिस्सा दान कर पिता की जान बचाने में मदद की। इस सफल सर्जरी के साथ एम्स जोधपुर में लीवर ट्रांसप्लांट की कुल संख्या 30 हो गई है।
18 महीने से लीवर की बीमारी से जूझ रहे थे मरीज
हरियाणा के नारनौल निवासी 51 वर्षीय मरीज पिछले करीब 18 महीने से क्रॉनिक लीवर डिजीज से पीड़ित थे। समय के साथ उनकी स्थिति गंभीर होती गई। उन्हें पीलिया और गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल ब्लीडिंग यानी पाचन तंत्र में रक्तस्राव जैसी जटिलताओं का भी सामना करना पड़ा।बीमारी बढ़ने के कारण सामान्य उपचार से पर्याप्त राहत मिलना मुश्किल हो गया था। डॉक्टरों ने मरीज की स्थिति को देखते हुए लीवर ट्रांसप्लांट को जरूरी उपचार विकल्प माना।ऐसे कठिन समय में मरीज के बेटे ने आगे आकर अपने लीवर का एक हिस्सा दान करने का निर्णय लिया। इससे पिता के उपचार का रास्ता खुला।
AIIMS जोधपुर में सफल हुआ 30वां लीवर ट्रांसप्लांट
एम्स जोधपुर में इस सर्जरी के साथ लीवर ट्रांसप्लांट की संख्या बढ़कर 30 हो गई है। संस्थान में लीवर प्रत्यारोपण की सुविधा विकसित होने से गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों को उपचार का विकल्प मिल रहा है।एम्स के सर्जिकल गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. वैभव वाष्र्णेय ने बताया कि मरीज की बीमारी और उसकी गंभीरता को देखते हुए ट्रांसप्लांट आवश्यक था।उनके नेतृत्व में विशेषज्ञों की बहुविषयक टीम ने सर्जरी पूरी की। इस प्रक्रिया में सर्जरी के साथ एनेस्थीसिया, गहन चिकित्सा और ऑपरेशन के बाद की देखभाल भी महत्वपूर्ण रही।
हेपेटाइटिस-बी और शराब के सेवन से प्रभावित हुआ था लीवर
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, मरीज की लीवर बीमारी का संबंध हेपेटाइटिस-बी संक्रमण और शराब के सेवन से था। इन कारणों से उनका लीवर गंभीर रूप से प्रभावित हुआ था।जब लीवर की कार्यक्षमता बहुत कम हो जाती है और अन्य उपचार प्रभावी नहीं रहते, तब कुछ मरीजों के लिए प्रत्यारोपण आवश्यक हो सकता है। इस मामले में भी डॉक्टरों ने मरीज की स्थिति के आधार पर ट्रांसप्लांट का निर्णय लिया।हालांकि, सर्जरी के बाद मरीज की आगे की स्वास्थ्य स्थिति और रिकवरी के बारे में विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं है।
सर्जरी में विशेषज्ञों की टीम ने निभाई भूमिका
इस जटिल प्रक्रिया में डॉ. वैभव वाष्र्णेय के साथ डॉ. सुभाष सोनी, डॉ. सेल्वाकुमार, डॉ. पीयूष वाष्र्णेय और डॉ. लोकेश अग्रवाल शामिल रहे।एनेस्थीसिया विशेषज्ञों, नर्सिंग अधिकारियों और आईसीयू टीम ने भी उपचार प्रक्रिया में सहयोग दिया। लीवर ट्रांसप्लांट में दाता और मरीज, दोनों की सुरक्षा के लिए कई विभागों के बीच समन्वय जरूरी होता है।बेटे का लीवर का एक हिस्सा दान करने का फैसला इस मामले का अहम पहलू रहा। जीवित दाता से लीवर प्रत्यारोपण में दाता की चिकित्सकीय जांच और उपयुक्तता का आकलन भी जरूरी होता है।
AIIMS जोधपुर में 16 जीवित और 14 मृत दाताओं से ट्रांसप्लांट
एम्स जोधपुर में अब तक 16 जीवित दाताओं और 14 मृत दाताओं के लीवर प्रत्यारोपण किए जा चुके हैं। इस तरह संस्थान में दोनों प्रकार के दाता प्रत्यारोपण की सुविधा के तहत काम हुआ है।जीवित दाता के मामले में दाता अपने लीवर का एक हिस्सा देता है, जबकि मृत दाता के मामले में प्रत्यारोपण के लिए अंग दान की प्रक्रिया अपनाई जाती है। दोनों ही परिस्थितियों में चिकित्सकीय जांच और निर्धारित नियमों का पालन महत्वपूर्ण होता है।
आयुष्मान भारत योजना से पात्र मरीजों को मिल सकती है मदद
एम्स के कार्यकारी निदेशक प्रो. संजीव सिन्हा ने इस उपलब्धि पर चिकित्सा टीम को बधाई दी। चिकित्सा अधीक्षक डॉ. नवीन दत्त ने बताया कि आयुष्मान भारत योजना के तहत पात्र मरीजों को लीवर ट्रांसप्लांट की सुविधा मिलने से महंगे उपचार का आर्थिक बोझ कम करने में मदद मिल सकती है।एम्स जोधपुर में प्रत्यारोपण क्षमता का विस्तार राजस्थान के साथ पड़ोसी राज्यों के मरीजों के लिए भी महत्वपूर्ण है। गंभीर लीवर बीमारी से पीड़ित मरीजों को विशेषज्ञ उपचार उपलब्ध कराने में ऐसी सुविधाओं की अहम भूमिका रहती है।