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बूंदी की ऐतिहासिक रामलीला में स्थानीय कलाकारों का वनवास, 4 साल से नहीं मिला मंचन का मौका

राजस्थान के बूंदी शहर की करीब 62 साल पुरानी रामलीला परंपरा इन दिनों चर्चा में है। कभी आजाद पार्क में रामलीला देखने के लिए दर्शक घंटों पहले पहुंच जाते थे। राजपरिवार से जुड़ी यादें और भरत-मिलाप की परंपरा इस आयोजन की खास पहचान रही हैं। लेकिन अब स्थानीय श्री वीरभद्र रामलीला मंडल का आरोप है कि पिछले चार वर्षों से टेंडर प्रक्रिया में उसे मंचन का अवसर नहीं मिल रहा। इस बार भी आजाद पार्क में नागौर की मंडली रामलीला का मंचन कर रही है। स्थानीय कलाकारों को आशंका है कि लगातार उपेक्षा से ऐतिहासिक परंपरा और नई पीढ़ी के कलाकारों का जुड़ाव कमजोर हो सकता है।

1964-65 से चली आ रही है बूंदी की रामलीला

बूंदी को छोटी काशी के नाम से जाना जाता है। यहां की ऐतिहासिक रामलीला धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। श्री वीरभद्र रामलीला मंडल के अनुसार, इसकी शुरुआत वर्ष 1964-65 में नाहर का चौहट्टा स्थित बुलबुल के चबूतरे से हुई थी।वर्ष 1969 से आजाद पार्क रामलीला मंचन का प्रमुख केंद्र बन गया। बताया जाता है कि पंडित बृजसुंदर शर्मा ने आयोजन की जिम्मेदारी नगर पालिका को सौंप दी थी। इसके बाद नगर निकाय की ओर से हर साल टेंडर प्रक्रिया के माध्यम से रामलीला का आयोजन कराया जाने लगा।मंडल के अध्यक्ष महेश श्रृंगी का कहना है कि स्थानीय कलाकार सालभर अभ्यास करते हैं। उनके लिए रामलीला केवल पेशा नहीं, बल्कि शौक, आस्था और जुनून का विषय है।

चार साल से स्थानीय मंडल को नहीं मिला मौका

श्री वीरभद्र रामलीला मंडल के अध्यक्ष महेश श्रृंगी के अनुसार, मंडल पिछले चार वर्षों से लगातार टेंडर प्रक्रिया में हिस्सा ले रहा है। इसके बावजूद उसे अपने ही शहर में रामलीला मंचन का अवसर नहीं मिल पाया।इस बार भी शारदीय नवरात्र के दौरान आजाद पार्क में नागौर की मंडली मंचन कर रही है। स्थानीय कलाकारों का कहना है कि उन्हें अवसर नहीं मिलने से उनकी वर्षों की तैयारी और अनुभव का उपयोग नहीं हो पा रहा।मंडल का दावा है कि बूंदी के कलाकारों को देखने के लिए आज भी बड़ी संख्या में दर्शक आते हैं। ऐसे में स्थानीय कलाकारों को अवसर देने पर विचार किया जाना चाहिए।हालांकि, टेंडर आवंटन की प्रक्रिया, पात्रता और चयन के आधार की जानकारी संबंधित नगर परिषद के रिकॉर्ड से ही स्पष्ट हो सकती है।

नई पीढ़ी के कलाकारों को लेकर चिंता

स्थानीय मंडल का कहना है कि यदि लगातार बाहरी मंडलियों को ही मंचन का अवसर मिलता रहा, तो बूंदी के युवा कलाकारों का जुड़ाव कमजोर पड़ सकता है।रामलीला जैसे आयोजनों में अभिनय, संवाद, संगीत, वेशभूषा और मंच संचालन का अनुभव अगली पीढ़ी तक पहुंचता है। स्थानीय कलाकारों को नियमित अवसर मिलने से इस परंपरा को आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है।मंडल के मुताबिक, कलाकार सालभर रिहर्सल करते हैं। लेकिन मंचन का अवसर नहीं मिलने से उनके अभ्यास और अनुभव को दर्शकों के सामने प्रस्तुत करने का मौका सीमित हो जाता है।ऐसे में सवाल केवल टेंडर का नहीं, बल्कि बूंदी की सांस्कृतिक विरासत और स्थानीय प्रतिभाओं को प्रोत्साहन देने का भी है।

50 साल से पुरुष निभा रहे महिला पात्रों की भूमिका

बूंदी की रामलीला की एक खास पहचान महिला पात्रों का अभिनय भी रही है। मंडल से जुड़ी जानकारी के अनुसार, पिछले करीब 50 वर्षों से महिला पात्रों की भूमिकाएं पुरुष कलाकार ही निभाते आ रहे हैं।समय-समय पर महिला कलाकारों को शामिल करने के सुझाव सामने आए, लेकिन मंडल ने अपनी पारंपरिक शैली जारी रखी। यह परंपरा इस आयोजन की विशिष्ट पहचान बन गई है।रामलीला का मंचन आजाद पार्क में होता है। वहीं, भरत-मिलाप की रस्म आज भी बुलबुल के चबूतरे पर निभाई जाती है। यह वही स्थान है, जहां से रामलीला की शुरुआत हुई थी।स्थानीय लोगों के लिए ये स्थल केवल आयोजन की जगह नहीं, बल्कि बूंदी के सांस्कृतिक इतिहास से जुड़े प्रतीक भी हैं।

राजपरिवार और हाथी-घोड़ों से जुड़ी हैं ऐतिहासिक यादें

बूंदी की रामलीला से कई पुराने किस्से जुड़े हुए हैं। स्थानीय परंपरा के अनुसार, रियासत के समय भगवान श्रीराम रावण वध के लिए हाथी पर सवार होकर जाते थे। अन्य पात्र घोड़ों और बग्घियों में पहुंचते थे।बताया जाता है कि उस दौर में राजमाता रामलीला को रावले की खिड़की से देखती थीं। राजकुमारी महेंद्र कुमारी भी भगवान राम के राज्याभिषेक की साक्षी बनी थीं।उस समय कलाकार चौपाइयों, दोहों और संवादों के साथ अभिनय करते थे। रावण दहन लंकागेट पर किया जाता था। पात्रों की वेशभूषा भी उस दौर की राजसी परंपरा से जुड़ी होती थी।रामलीला शुरू कराने के लिए राजमाता श्यामराज कंवर की ओर से 25 रुपए दिए जाने का उल्लेख भी स्थानीय इतिहास में किया जाता है।

पहले कलाकारों की भूमिकाएं भी थीं खास

रामलीला के शुरुआती दौर से जुड़े कलाकारों के किस्से आज भी याद किए जाते हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, शुरुआती मंचन में जमनालाल धाभाई ने राम और सीता की भूमिका निभाई थी। वहीं, जंगम की बगीची के महंत बाबा चमन गिरी महाराज ने रावण और राजा दशरथ जैसे पात्रों का अभिनय किया था।मंडल से जुड़ी जानकारी के अनुसार, राम की भूमिका निभाने वाले कलाकार अब तक 18 बार रावण वध का मंचन कर चुके हैं। यह विवरण इस आयोजन से जुड़े कलाकारों के लंबे अनुभव और परंपरा को दर्शाता है।इन किस्सों के साथ बूंदी की रामलीला धार्मिक आयोजन के अलावा शहर की सांस्कृतिक स्मृति का भी हिस्सा बन गई है।

स्थानीय कलाकारों को प्रोत्साहन देने की मांग

बूंदी की ऐतिहासिक रामलीला को लेकर स्थानीय मंडल की मांग है कि टेंडर प्रक्रिया में पारदर्शिता के साथ स्थानीय कलाकारों के अनुभव और परंपरा को भी महत्व दिया जाए।नगर परिषद के सामने यह चुनौती है कि आयोजन की गुणवत्ता बनाए रखते हुए स्थानीय सांस्कृतिक विरासत को भी संरक्षण मिले। टेंडर के नियमों और चयन प्रक्रिया की जानकारी सार्वजनिक होने से विवाद से जुड़े सवालों पर स्पष्टता आ सकती है।यदि स्थानीय कलाकारों को मंचन का अवसर मिलता है, तो अनुभवी कलाकारों के साथ नई पीढ़ी को भी परंपरा सीखने और आगे बढ़ाने का मौका मिल सकता है।बूंदी की रामलीला का इतिहास केवल मंच पर होने वाले अभिनय तक सीमित नहीं है। यह शहर की आस्था, लोक-स्मृति और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा है। इसलिए स्थानीय कलाकारों की मांग और आयोजन की चयन प्रक्रिया पर प्रशासन का रुख महत्वपूर्ण रहेगा।

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Stv News Rajasthan

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