अलवर जिला अस्पताल में SDP मशीन बंद, 11 हजार में प्लेटलेट्स खरीदने को मजबूर मरीज
अलवर। जिले के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल के ब्लड बैंक में सिंगल डोनर प्लेटलेट्स यानी SDP मशीन पिछले एक सप्ताह से बंद है। इसका सीधा असर गंभीर मरीजों और उनके परिजनों पर पड़ रहा है। डेंगू, कैंसर, स्क्रब टाइफस और हाई रिस्क प्रेग्नेंसी जैसे मामलों में प्लेटलेट्स की जरूरत पड़ने पर मरीजों को निजी संस्थानों का रुख करना पड़ रहा है। वहां एक SDP के लिए करीब 11 हजार रुपए तक खर्च करने पड़ रहे हैं। अस्पताल में सुविधा मौजूद होने के बावजूद मशीन बंद होने से मरीजों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ बढ़ गया है।
SDP मशीन बंद होने से मरीजों की बढ़ी परेशानी
जिला अस्पताल के ब्लड बैंक में सिंगल डोनर प्लेटलेट्स तैयार करने की सुविधा उपलब्ध है। लेकिन पिछले करीब एक सप्ताह से मशीन का संचालन प्रभावित है। बिजली जाने के बाद पर्याप्त बैकअप नहीं मिलने के कारण SDP तैयार करने की प्रक्रिया रुक जाती है।इसका असर उन मरीजों पर ज्यादा पड़ रहा है, जिन्हें डॉक्टरों ने तत्काल प्लेटलेट्स चढ़ाने की सलाह दी है। अस्पताल में सुविधा उपलब्ध नहीं होने के कारण परिजनों को निजी संस्थानों से प्लेटलेट्स की व्यवस्था करनी पड़ रही है।
निजी संस्थानों में 11 हजार रुपए तक खर्च
SDP की सुविधा सरकारी अस्पताल में उपलब्ध होने के बावजूद मशीन बंद होने से मरीजों को निजी संस्थानों पर निर्भर होना पड़ रहा है। यहां एक SDP के लिए करीब 11 हजार रुपए तक खर्च होने की जानकारी सामने आई है।आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए यह राशि काफी अधिक हो सकती है। खासकर ऐसे मरीजों के मामले में जहां बार-बार प्लेटलेट्स की जरूरत पड़ती है, वहां इलाज का खर्च और बढ़ जाता है।
डेंगू और कैंसर मरीजों में हो सकती है जरूरत
विशेषज्ञों के अनुसार एक SDP यूनिट से मरीज के प्लेटलेट्स की संख्या करीब 40 से 50 हजार तक बढ़ सकती है। डेंगू जैसी बीमारियों में प्लेटलेट्स तेजी से कम होने पर डॉक्टर जरूरत के अनुसार SDP की सलाह दे सकते हैं।इसके अलावा कैंसर के मरीजों और कुछ हाई रिस्क प्रेग्नेंसी मामलों में भी प्लेटलेट्स की आवश्यकता हो सकती है। ऐसे मरीजों के लिए समय पर प्लेटलेट्स उपलब्ध होना उपचार का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
अस्पताल का जनरेटर ऑटो स्टार्ट सिस्टम खराब
मशीन बंद होने की बड़ी वजह बिजली बैकअप की व्यवस्था से जुड़ी बताई जा रही है। अस्पताल में जनरेटर मौजूद है, लेकिन उसका ऑटो स्टार्ट सिस्टम करीब एक साल से खराब बताया जा रहा है।ऐसे में बिजली जाने पर जनरेटर अपने आप शुरू नहीं होता। इसके अलावा ब्लड बैंक का UPS भी खराब बताया जा रहा है। बिजली आपूर्ति बाधित होने पर SDP मशीन की प्रक्रिया प्रभावित होती है।
7 से 8 हजार की किट खराब होने का खतरा
SDP तैयार करने की प्रक्रिया में इस्तेमाल होने वाली एक किट की कीमत करीब 7 से 8 हजार रुपए बताई जा रही है। बिजली बीच में चली जाए और प्रक्रिया रुक जाए तो किट खराब होने का खतरा रहता है।ऐसे में मशीन के संचालन के लिए निर्बाध बिजली और प्रभावी बैकअप व्यवस्था जरूरी है। बैकअप सिस्टम में खराबी के कारण अस्पताल प्रशासन के सामने मशीन को सुरक्षित तरीके से चलाने की चुनौती बनी हुई है।
इलेक्ट्रोलाइट मशीन भी छह महीने से खराब
जिला अस्पताल की सेंट्रल लैब में सीरम इलेक्ट्रोलाइट जांच की मशीन भी करीब छह महीने से खराब है। मौजूदा मशीन को संबंधित कंपनी ने कंडम घोषित कर दिया है।मरीजों की निशुल्क जांच प्रभावित नहीं हो, इसके लिए अस्पताल प्रशासन ने निजी संस्थान से जांच कराने का अनुबंध किया है। हालांकि इससे सरकारी अस्पताल की अपनी जांच व्यवस्था पर निर्भरता कम होने के बजाय बाहरी व्यवस्था पर बढ़ गई है।
दो नई मशीनें आईं, लेकिन इंस्टॉलेशन अटका
इलेक्ट्रोलाइट जांच के लिए अस्पताल में दो नई मशीनें आ चुकी हैं। इसके बावजूद अभी तक उनका इंस्टॉलेशन नहीं हो सका है।बताया जा रहा है कि खरीद आदेश में मशीन का मेक और मॉडल दर्ज नहीं होने के कारण तकनीकी मंजूरी की प्रक्रिया अटक गई। संबंधित चिकित्सक की तकनीकी स्वीकृति भी लंबित बताई जा रही है। इसके कारण नई मशीनों को उपयोग के लिए शुरू नहीं किया जा सका है।
कागजी प्रक्रिया के बीच मरीजों को नुकसान
अस्पताल के पुराने आदेशों के अनुसार उपकरणों की खरीद और स्थापना के लिए अलग-अलग स्तर पर तकनीकी स्वीकृति का प्रावधान है। एक लाख रुपए तक के उपकरण के लिए बायोमेडिकल इंजीनियर की मंजूरी और इससे अधिक कीमत के उपकरण के लिए संबंधित विभागाध्यक्ष की स्वीकृति की व्यवस्था बताई गई है।वहीं 50 हजार रुपए तक के उपकरण तीन कोटेशन के आधार पर खरीदे जा सकते हैं। इन प्रक्रियाओं के बीच नई इलेक्ट्रोलाइट मशीनें अस्पताल पहुंच चुकी हैं, लेकिन मरीजों को अभी उनका लाभ नहीं मिल पा रहा है।
सरकारी अस्पताल की व्यवस्थाओं पर उठे सवाल
एक तरफ ब्लड बैंक की SDP मशीन बंद है, तो दूसरी तरफ सेंट्रल लैब की इलेक्ट्रोलाइट जांच व्यवस्था भी प्रभावित है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि अस्पताल में उपलब्ध संसाधनों को समय पर चालू रखने और खराब उपकरणों की मरम्मत की व्यवस्था कितनी प्रभावी है।मरीजों के लिए सबसे बड़ी परेशानी यह है कि सरकारी अस्पताल में उपलब्ध या प्रस्तावित सुविधाओं का लाभ समय पर नहीं मिल पा रहा। SDP मशीन और नई इलेक्ट्रोलाइट मशीनों को लेकर अब मरीजों और परिजनों की नजर अस्पताल प्रशासन की अगली कार्रवाई पर है।