सीमा तक पहुंचेगी ट्रेन, जैसलमेर-भाभर रेल लाइन से 150 गांवों को मिलेगा नया सहारा
पश्चिमी सीमा क्षेत्रों में सुरक्षा और विकास को नई गति देने के लिए जैसलमेर-भाभर रेल परियोजना पर काम तेज हो गया है। प्रस्तावित रेल लाइन से राजस्थान और गुजरात के सीमावर्ती इलाकों के करीब 150 गांव पहली बार रेल नेटवर्क से जुड़ेंगे। इस परियोजना को सामरिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
बॉर्डर के करीब से गुजरेगी नई रेल लाइन
जैसलमेर-भाभर रेल परियोजना के तहत बीकानेर से जैसलमेर होते हुए बाड़मेर के जसाई, चौहटन, धोरीमन्ना और सांचौर के रास्ते नई रेल लाइन बिछाने की योजना बनाई गई है। परियोजना का सर्वे कार्य पूरा हो चुका है और इस बार रेल नेटवर्क को अंतरराष्ट्रीय सीमा के नजदीक तक ले जाने पर विशेष जोर दिया गया है। भारतमाला परियोजना के बाद अब सीमा क्षेत्रों में रेल कनेक्टिविटी बढ़ने से स्थानीय लोगों को आवागमन की बेहतर सुविधा मिलने के साथ-साथ सामरिक तैयारियों को भी मजबूती मिलेगी।
पहली बार ट्रेन से जुड़ेंगे 150 गांव
इस महत्वाकांक्षी परियोजना का सबसे बड़ा फायदा सीमावर्ती गांवों को मिलेगा। प्रस्तावित रेल लाइन के जरिए करीब 150 गांवों को पहली बार रेलवे सुविधा उपलब्ध होगी। इनमें से लगभग 80 प्रतिशत स्टेशन नए बनाए जाने की योजना है। इससे लंबे समय से परिवहन सुविधाओं से वंचित क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियां बढ़ेंगी और स्थानीय लोगों को शिक्षा, स्वास्थ्य तथा रोजगार के नए अवसर मिल सकेंगे।
बड़े पैमाने पर तैयार होगा आधारभूत ढांचा
रेल परियोजना के तहत कई बड़े निर्माण कार्य भी प्रस्तावित किए गए हैं। योजना में 50 बड़े पुल, जिनमें 34 नहर क्रॉसिंग शामिल हैं, के अलावा 256 छोटे पुल, 31 रोड ओवरब्रिज और 56 अंडरब्रिज बनाए जाएंगे। इसके लिए राजस्थान में 986.8 हेक्टेयर और गुजरात में 246.2 हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण किया जाएगा। यह पूरा ढांचा भविष्य की परिवहन जरूरतों को ध्यान में रखते हुए तैयार किया जाएगा।
कांडला पोर्ट से जुड़ने पर बढ़ेगा व्यापारिक महत्व
भविष्य में इस रेल लाइन को पालनपुर और गांधीधाम के जरिए कांडला पोर्ट से जोड़ने की भी योजना है। इससे सीमावर्ती जिलों बाड़मेर, जैसलमेर, जालोर और गुजरात के बनासकांठा क्षेत्र को सीधा लाभ मिलेगा। सामरिक दृष्टि के साथ-साथ व्यापार और माल परिवहन के लिए भी यह परियोजना महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे क्षेत्र के आर्थिक विकास को नई दिशा मिलेगी।
26 वर्षों में तीन बार हुआ सर्वे, लागत पहुंची 5 हजार करोड़
इस परियोजना का महत्व इसी बात से समझा जा सकता है कि पिछले 26 वर्षों में इसका तीन बार सर्वे किया जा चुका है। वर्ष 2001 में इसकी अनुमानित लागत 616 करोड़ रुपये थी, जो समय के साथ बढ़कर अब करीब 5 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच गई है। लंबे इंतजार के बाद अब इस परियोजना को मूर्त रूप देने की दिशा में तेजी से प्रयास किए जा रहे हैं।