वाडीलाल में फिर गहराया पारिवारिक विवाद! 30 साल पुराने समझौते पर बॉम्बे हाई कोर्ट पहुंचा गांधी परिवार का मामला
देश की प्रतिष्ठित आइसक्रीम कंपनी वाडीलाल (Vadilal) एक बार फिर पारिवारिक विवाद के चलते सुर्खियों में है। करीब तीन दशक पहले हुए कारोबारी बंटवारे को लेकर गांधी परिवार के मुंबई और अहमदाबाद गुट आमने-सामने आ गए हैं। विवाद अब बॉम्बे हाई कोर्ट तक पहुंच चुका है, जहां दोनों पक्ष 1993 के फैमिली सेटलमेंट और ब्रांड के व्यावसायिक अधिकारों को लेकर अपने-अपने दावे पेश कर रहे हैं। फिलहाल अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है।
1993 के समझौते पर फिर शुरू हुई कानूनी जंग
वाडीलाल समूह के भीतर विवाद की जड़ 1993 का वह पारिवारिक समझौता है, जिसके तहत कारोबार और विभिन्न क्षेत्रों में ब्रांड इस्तेमाल करने के अधिकार गांधी परिवार के दो गुटों के बीच बांटे गए थे। अब मुंबई गुट का आरोप है कि अहमदाबाद गुट उस समझौते का उल्लंघन करते हुए उन राज्यों में भी आइसक्रीम और जूस के कारोबार में हस्तक्षेप कर रहा है, जहां संचालन का विशेष अधिकार मुंबई पक्ष को मिला था। इसी आधार पर मामला बॉम्बे हाई कोर्ट पहुंचा है।
मुंबई गुट ने अदालत से क्या मांग की?
शैलेश गांधी के नेतृत्व वाली वाडीलाल डेयरी इंटरनेशनल ने अदालत से अंतरिम राहत की मांग करते हुए कहा है कि अहमदाबाद गुट और उससे जुड़ी कंपनियों को वाडीलाल ब्रांड के तहत आइसक्रीम और जूस के निर्माण, बिक्री, वितरण और मार्केटिंग में दखल देने से रोका जाए। कंपनी का दावा है कि 1993 के समझौते के अनुसार महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल और आंध्र प्रदेश-तेलंगाना जैसे राज्यों में कारोबार करने का अधिकार उसे मिला था। इसके बदले उसने ट्रेडमार्क रखने वाली कंपनी में अपनी हिस्सेदारी भी छोड़ दी थी।
अहमदाबाद गुट ने लगाए गुणवत्ता से जुड़े गंभीर आरोप
दूसरी ओर अहमदाबाद गुट ने अदालत में दावा किया कि मुंबई गुट द्वारा बनाए जा रहे कुछ उत्पादों में लगातार गुणवत्ता संबंधी गंभीर खामियां पाई गई हैं। उनके अनुसार माइक्रोबायोलॉजिकल कंटैमिनेशन और गुणवत्ता नियंत्रण नियमों के उल्लंघन जैसे मामले सामने आए हैं। उनका कहना है कि 1992 में हुए रजिस्टर्ड यूजर एग्रीमेंट के तहत गुणवत्ता बनाए रखना अनिवार्य था और यदि इन शर्तों का पालन नहीं होता तो हस्तक्षेप करना जरूरी हो जाता है।
ट्रेडमार्क विवाद से लेकर विदेशी मुकदमों तक पहुंचा मामला
मुंबई गुट का आरोप है कि अहमदाबाद पक्ष ने उसके कारोबार को नुकसान पहुंचाने के उद्देश्य से कई कदम उठाए। इनमें अमेरिका में ट्रेडमार्क से जुड़े कानूनी विवाद, उत्पादों की गुणवत्ता पर सवाल, कुछ प्रोडक्ट्स को बाजार से वापस मंगाने की कोशिशें और फैक्ट्रियों के निरीक्षण की पहल शामिल हैं। मुंबई पक्ष का कहना है कि इन कार्रवाइयों से उसकी कारोबारी साख प्रभावित हुई है और यह 1993 के समझौते की भावना के खिलाफ है।
आर्बिट्रेशन प्रक्रिया शुरू, हाई कोर्ट ने फैसला रखा सुरक्षित
दोनों पक्षों के बीच विवाद सुलझाने के लिए पहले आपसी बातचीत भी हुई थी, लेकिन कोई समाधान नहीं निकल सका। इसके बाद मुंबई गुट ने 1993 के समझौते में मौजूद विवाद समाधान प्रावधान के तहत आर्बिट्रेशन प्रक्रिया शुरू कर दी। फिलहाल बॉम्बे हाई कोर्ट में अंतरिम राहत की मांग पर सुनवाई पूरी हो चुकी है और अदालत ने अपना आदेश सुरक्षित रख लिया है। अंतिम निर्णय आने तक यह मामला वाडीलाल समूह के भविष्य और ब्रांड संचालन के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।