खीरे की खेती पर 99 लाख सब्सिडी को लेकर घिरे केंद्रीय मंत्री भागीरथ चौधरी, विपक्ष ने उठाए सवाल
केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री और अजमेर से सांसद भागीरथ चौधरी को खीरे की खेती से जुड़े एक प्रोजेक्ट के लिए 99 लाख रुपए से अधिक की सरकारी सब्सिडी मिलने का मामला राजनीतिक विवाद का कारण बन गया है। विपक्ष ने इसे हितों के टकराव से जोड़ते हुए सवाल उठाए हैं, जबकि मंत्री ने सभी आरोपों को खारिज करते हुए इसे नियमों के तहत मिला लाभ बताया है।
राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड की योजना के तहत मिली सब्सिडी
यह मामला राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड (NHB) की कमर्शियल हॉर्टिकल्चर योजना से जुड़ा है। जानकारी के अनुसार, डीडवाना-कुचामन जिले के पीह गांव में मंत्री भागीरथ चौधरी के निजी फार्महाउस पर खीरे की पॉलीहाउस खेती का प्रोजेक्ट स्थापित किया गया है। इसी प्रोजेक्ट के लिए सरकार की ओर से लगभग 99 लाख रुपए की सब्सिडी मंजूर की गई। यह योजना किसानों और कृषि उद्यमियों को आधुनिक खेती के लिए प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से चलाई जाती है।
हितों के टकराव के आरोपों पर बढ़ा विवाद
विपक्ष का आरोप है कि चूंकि एनएचबी केंद्रीय कृषि मंत्रालय के अधीन आता है और मंत्री स्वयं इस विभाग से जुड़े पद पर हैं, इसलिए यह मामला नैतिक रूप से हितों के टकराव का बनता है। सवाल यह भी उठ रहे हैं कि जिस योजना को उनका मंत्रालय नियंत्रित करता है, उसी से उनके निजी प्रोजेक्ट को इतनी बड़ी राशि कैसे मंजूर हुई। इस मुद्दे ने राजनीतिक बहस को तेज कर दिया है और इसे प्रशासनिक पारदर्शिता से जोड़कर देखा जा रहा है।
कुल 1.99 करोड़ की परियोजना और बैंक लोन संरचना
रिपोर्ट्स के अनुसार, यह पूरा कृषि प्रोजेक्ट लगभग 1.99 करोड़ रुपए का है। इसमें से करीब 49.8 लाख रुपए स्वयं निवेश किए गए हैं, जबकि शेष 1.49 करोड़ रुपए का बैंक लोन एचडीएफसी बैंक से लिया गया है। यह प्रोजेक्ट आधुनिक पॉलीहाउस तकनीक पर आधारित है, जिसमें खीरे की उच्च गुणवत्ता वाली खेती की जा रही है। बताया गया है कि आवेदन के कुछ ही दिनों में प्रारंभिक मंजूरी मिल गई थी और बाद में अंतिम स्वीकृति भी जारी कर दी गई।
मंत्री का पक्ष: “मैं पहले किसान हूँ”
केंद्रीय मंत्री भागीरथ चौधरी ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि वे लंबे समय से किसान परिवार से जुड़े हैं और खेती उनका पारंपरिक व्यवसाय है। उनका कहना है कि यह सब्सिडी MIDH योजना के तहत दी गई है, जो सभी किसानों के लिए समान रूप से लागू होती है। उन्होंने यह भी कहा कि उनके खेत पर परियोजना से जुड़ी पूरी जानकारी सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित की गई है और इसमें किसी भी प्रकार का नियम उल्लंघन नहीं हुआ है।
राजनीतिक बहस और आगे की स्थिति
यह मामला अब राजनीतिक चर्चा का विषय बन गया है। विपक्ष इसे नैतिक सवालों से जोड़ रहा है, जबकि समर्थक इसे नियमों के तहत मिली वैध कृषि सहायता बता रहे हैं। फिलहाल किसी तरह की कानूनी अनियमितता साबित नहीं हुई है, लेकिन यह मुद्दा पारदर्शिता और पद के दुरुपयोग को लेकर बहस को और तेज कर रहा है। सरकार की ओर से अभी तक इस पर कोई औपचारिक जांच आदेश जारी नहीं किया गया है।