पंडवानी की अमर आवाज हुई खामोश, पद्म विभूषण तीजन बाई का निधन
छत्तीसगढ़ की लोककला पंडवानी को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने वाली पद्म विभूषण सम्मानित प्रख्यात लोकगायिका तीजन बाई का निधन हो गया। उन्होंने रायपुर एम्स में अंतिम सांस ली। लंबे समय से अस्वस्थ चल रही तीजन बाई के निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु, मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय सहित देश के अनेक नेताओं और सांस्कृतिक हस्तियों ने शोक व्यक्त करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। उनके निधन से भारतीय लोककला जगत ने अपनी एक महान हस्ती को खो दिया।
पंडवानी को दुनिया के मंच तक पहुंचाने वाली महान कलाकार
तीजन बाई ने छत्तीसगढ़ की पारंपरिक लोककला पंडवानी को देश ही नहीं बल्कि दुनिया के कई देशों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भिलाई के निकट गनियारी गांव में जन्मी तीजन बाई ने अपनी दमदार आवाज, प्रभावशाली मंच प्रस्तुति और महाभारत की जीवंत कथाओं के माध्यम से इस लोककला को नई पहचान दिलाई। उनकी प्रस्तुतियों ने भारतीय लोक परंपरा को वैश्विक मंच पर स्थापित किया और उन्हें देश की सबसे सम्मानित लोक कलाकारों में शामिल किया।
इंदिरा गांधी के सामने प्रस्तुति से मिला राष्ट्रीय मंच
तीजन बाई के जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ तब आया, जब प्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर ने उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के समक्ष प्रस्तुति देने का अवसर दिलाया। इस प्रस्तुति के बाद उनकी प्रतिभा को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली और उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। इसके बाद उन्होंने देश-विदेश के अनेक प्रतिष्ठित मंचों पर पंडवानी की प्रस्तुति देकर छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। उनकी कला ने भारतीय लोक परंपराओं को वैश्विक सम्मान दिलाने में अहम योगदान दिया।
पुरुष वर्चस्व को चुनौती देकर रचा नया इतिहास
तीजन बाई ने उस दौर में पंडवानी गायन को नई दिशा दी, जब इस विधा में महिलाओं की भूमिका सीमित मानी जाती थी। उन्होंने पारंपरिक वेदमती शैली के बजाय कापालिक शैली को अपनाया और हाथ में तंबूरा लेकर खड़े होकर प्रस्तुति देने की अनूठी शैली विकसित की। सामाजिक विरोध और बहिष्कार जैसी कठिन परिस्थितियों का सामना करने के बावजूद उन्होंने अपने संघर्ष, आत्मविश्वास और कला के बल पर नई पहचान बनाई। उनकी यह यात्रा आज भी लोक कलाकारों के लिए प्रेरणा का स्रोत मानी जाती है।
सम्मानों से सजा गौरवशाली कला सफर
भारतीय लोककला के संरक्षण और संवर्धन में उल्लेखनीय योगदान के लिए तीजन बाई को अनेक राष्ट्रीय सम्मानों से सम्मानित किया गया। उन्हें पद्म श्री, वर्ष 2003 में पद्म भूषण और वर्ष 2019 में पद्म विभूषण से अलंकृत किया गया। इन सम्मानों ने न केवल उनकी व्यक्तिगत उपलब्धियों को सम्मान दिया, बल्कि पंडवानी जैसी लोककला को भी राष्ट्रीय पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके योगदान को भारतीय सांस्कृतिक इतिहास में हमेशा विशेष स्थान प्राप्त रहेगा।
प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति समेत कई नेताओं ने दी श्रद्धांजलि
तीजन बाई के निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें भारतीय कला और संस्कृति की अमूल्य धरोहर बताते हुए गहरा शोक व्यक्त किया। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने कहा कि उन्होंने अपनी साधना और सशक्त प्रस्तुति से पंडवानी परंपरा को नई पहचान दिलाई। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, छत्तीसगढ़ विधानसभा अध्यक्ष रमन सिंह, पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और मंत्री केदार कश्यप सहित अनेक नेताओं ने भी उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए भारतीय लोककला के लिए उनके योगदान को अविस्मरणीय बताया।
बीमारी और संघर्षों के बीच भी नहीं छोड़ी कला साधना
जीवन के अंतिम वर्षों में तीजन बाई लगातार स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रही थीं। वर्ष 2024 में उन्हें लकवे का दौरा पड़ा था, जिसके बाद उनका स्वास्थ्य लगातार कमजोर होता गया। बाद में फेफड़ों में संक्रमण, निमोनिया और निम्न रक्तचाप की शिकायत के चलते उन्हें रायपुर एम्स में भर्ती कराया गया, जहां उपचार के दौरान उनका निधन हो गया। निजी जीवन में भी उन्होंने अनेक कठिनाइयों और सामाजिक विरोध का सामना किया, लेकिन कला के प्रति उनका समर्पण कभी कम नहीं हुआ। यही संघर्ष और साधना उन्हें भारतीय लोककला की अमर हस्ती बनाते हैं।