करीब दो दशक बाद कोलकाता पहुंचीं तस्लीमा नसरीन, वापसी ने फिर छेड़ी पुराने विवादों और अभिव्यक्ति की आजादी पर बहस
बांग्लादेश से निर्वासित चर्चित लेखिका तस्लीमा नसरीन करीब 19 साल बाद कोलकाता पहुंची हैं। वर्ष 2007 में विरोध प्रदर्शनों और बिगड़ती कानून-व्यवस्था के बीच उन्हें शहर छोड़ना पड़ा था। उनकी इस वापसी ने एक बार फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, साहित्यिक विवादों और पश्चिम बंगाल की राजनीति को लेकर नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है।
कोलकाता लौटकर भावुक हुईं तस्लीमा नसरीन
दिल्ली में दीर्घकालिक रेजिडेंस परमिट पर रह रहीं तस्लीमा नसरीन ने कोलकाता पहुंचने के बाद कहा कि उन्हें विश्वास नहीं हो रहा कि वह वर्षों बाद फिर इस शहर में हैं। उन्होंने बताया कि 2007 में कोलकाता छोड़ते समय उन्हें उम्मीद थी कि जल्द लौट सकेंगी, लेकिन समय बीतने के साथ यह संभावना कम होती गई। हाल ही में मिले आमंत्रण के बाद उनकी यह यात्रा संभव हो सकी। तस्लीमा लंबे समय से कोलकाता को अपनी भाषा, संस्कृति और साहित्यिक जुड़ाव के कारण अपना दूसरा घर मानती रही हैं।
बांग्लादेश छोड़ने की वजह बनी ‘लज्जा’
तस्लीमा नसरीन को वर्ष 1994 में बांग्लादेश छोड़ना पड़ा था। उनके चर्चित उपन्यास ‘लज्जा’ के प्रकाशन के बाद उन्हें कट्टरपंथी संगठनों की ओर से विरोध और धमकियों का सामना करना पड़ा। यह उपन्यास बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद बांग्लादेश में एक हिंदू परिवार की परिस्थितियों पर आधारित था। बढ़ते विरोध के बीच उन्होंने देश छोड़ दिया और बाद में यूरोप में शरण ली, जहां उन्हें स्वीडन की नागरिकता भी मिली। कुछ वर्षों बाद वह भारत आईं और कोलकाता में रहने लगीं।
‘द्विखंडितो’ बनी नए विवाद की वजह
कोलकाता में रहते हुए तस्लीमा नसरीन ने बंगाली साहित्य और पत्रकारिता में सक्रिय भूमिका निभाई। हालांकि उनकी आत्मकथा ‘द्विखंडितो’ के प्रकाशन के बाद विवाद गहरा गया। पुस्तक के कुछ अंशों को लेकर आपत्तियां दर्ज कराई गईं और मामले ने कानूनी रूप भी लिया। पश्चिम बंगाल सरकार ने सार्वजनिक व्यवस्था का हवाला देते हुए पुस्तक पर प्रतिबंध लगाया, जिसे बाद में कलकत्ता हाईकोर्ट ने निरस्त कर दिया। इसके बावजूद पुस्तक को लेकर विरोध प्रदर्शन जारी रहे और विवाद समाप्त नहीं हुआ।
2007 के विरोध प्रदर्शन के बाद छोड़ना पड़ा कोलकाता
वर्ष 2006 और 2007 के दौरान तस्लीमा नसरीन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन लगातार तेज होते गए। कई संगठनों ने उनके खिलाफ प्रदर्शन किए और कानून-व्यवस्था की स्थिति प्रभावित हुई। नवंबर 2007 में कोलकाता में बड़े पैमाने पर हिंसक प्रदर्शन और तनाव के बाद प्रशासन ने सुरक्षा कारणों से उन्हें शहर छोड़ने की सलाह दी। इसके बाद उन्हें पहले पश्चिम बंगाल से बाहर और फिर नई दिल्ली स्थानांतरित कर दिया गया, जहां वह लंबे समय से रह रही हैं।
वापसी के साथ फिर शुरू हुई नई चर्चा
करीब दो दशक बाद कोलकाता पहुंचने के बाद तस्लीमा नसरीन की वापसी को लेकर अलग-अलग राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। एक पक्ष इसे उनकी भावनात्मक घर वापसी मान रहा है, जबकि कुछ लोग इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और पूर्व विवादों के संदर्भ में देख रहे हैं। फिलहाल उनकी यात्रा ने साहित्य, राजनीति और लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़े पुराने प्रश्नों को एक बार फिर सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बना दिया है।
इसे भी पढ़ें – शहजाद पूनावाला का राजनीतिक सफर चर्चा में, पद छोड़ने की खबरों के बीच फिर सुर्खियों में नाम