अलवर निकाय चुनाव: BJP-कांग्रेस को झटका, निर्दलीयों के हाथ सत्ता की चाबी; 12 में सिर्फ 2 जगह बहुमत
अलवर जिले के निकाय चुनाव परिणामों ने भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए बड़ा राजनीतिक संदेश दिया है। जिले के 12 निकायों में सिर्फ नौगांवा और खेड़ली में भाजपा स्पष्ट बहुमत हासिल कर सकी। बाकी निकायों में किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला। ऐसे में निर्दलीय पार्षद बोर्ड गठन में निर्णायक भूमिका में आ गए हैं। सबसे बड़ा उलटफेर राजगढ़ में हुआ, जहां 40 में से 31 सीटें निर्दलीयों के खाते में गईं। भाजपा को 6 और कांग्रेस को सिर्फ 3 सीटें मिलीं। नतीजों से यह भी संकेत मिला कि कई जगह मतदाताओं ने पार्टी से ज्यादा स्थानीय प्रत्याशी और मुद्दों को प्राथमिकता दी।
राजगढ़ में निर्दलीयों का दबदबा, BJP-कांग्रेस दोनों पिछड़े
राजगढ़ का चुनाव परिणाम जिले के सबसे बड़े राजनीतिक उलटफेर के रूप में सामने आया। यहां कुल 40 वार्ड हैं। इनमें 31 वार्डों में निर्दलीय प्रत्याशियों ने जीत दर्ज की।
भाजपा को सिर्फ 6 और कांग्रेस को 3 सीटें मिलीं। इस नतीजे के बाद राजगढ़ में बोर्ड गठन पूरी तरह निर्दलीय पार्षदों के रुख पर निर्भर हो गया है। स्थानीय मुद्दों और उम्मीदवारों की व्यक्तिगत पकड़ ने यहां पार्टी राजनीति को पीछे छोड़ दिया।
केंद्रीय विद्यालय का मुद्दा बना चुनावी फैक्टर
राजगढ़ में केंद्रीय विद्यालय का मुद्दा लंबे समय से राजनीतिक बहस के केंद्र में रहा है। केंद्रीय विद्यालय की मांग को लेकर करीब नौ महीने से आंदोलन चल रहा था।
आंदोलन से जुड़े लोगों ने ‘केंद्रीय विद्यालय नहीं तो वोट नहीं’ जैसे संदेशों के साथ जनसंपर्क किया। राजगढ़ के लिए स्वीकृत केंद्रीय विद्यालय को रैणी के दलालपुरा में खोले जाने का विरोध भी आंदोलन का प्रमुख मुद्दा रहा। चुनाव परिणामों में भाजपा और कांग्रेस दोनों के कमजोर प्रदर्शन को इसी स्थानीय नाराजगी के संदर्भ में देखा जा रहा है।
नौगांवा में BJP की रणनीति सफल
नौगांवा भाजपा के लिए अलवर जिले का सबसे मजबूत परिणाम देने वाला निकाय रहा। पार्टी ने यहां स्थानीय समीकरणों को ध्यान में रखते हुए प्रत्याशी उतारे।
वार्ड 19 से भाजपा प्रत्याशी राजेश सिंह निर्विरोध निर्वाचित हो चुके थे। चुनाव परिणाम के बाद भाजपा ने यहां स्पष्ट बहुमत हासिल किया। हालांकि वार्ड 17 और 19 के आरक्षण को लेकर चुनाव से पहले विवाद भी सामने आया था। इसके बावजूद भाजपा संगठन चुनावी समीकरण साधने में सफल रहा।
रामगढ़ में बगावत ने बिगाड़ा BJP का गणित
रामगढ़ नगरपालिका के 35 वार्डों में भाजपा ने 28 सीटों पर प्रत्याशी उतारे। इनमें से 13 उम्मीदवार जीत दर्ज करने में सफल रहे।
टिकट वितरण को लेकर पार्टी के भीतर असंतोष सामने आया और कई बागी प्रत्याशी मैदान में उतर गए। इनमें से कई बागियों की जीत ने भाजपा के बोर्ड गठन के समीकरण को प्रभावित किया। कांग्रेस ने भी सिर्फ 20 वार्डों में प्रत्याशी उतारे। कुछ पुराने कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा।
मालाखेड़ा में कांग्रेस के गढ़ में निर्दलीयों का असर
मालाखेड़ा को लंबे समय से कांग्रेस के प्रभाव वाला क्षेत्र माना जाता रहा है। लेकिन इस बार परिणाम कांग्रेस के लिए चुनौतीपूर्ण रहे। निर्दलीय प्रत्याशियों ने कई वार्डों में मजबूत प्रदर्शन किया।
वार्ड 9 में कांग्रेस प्रत्याशी नरेश जोशी को एक भी वोट नहीं मिला। यह परिणाम कांग्रेस के लिए खासा चर्चा का विषय बना। वहीं भाजपा भी यहां स्पष्ट बढ़त बनाने में सफल नहीं रही। इससे संकेत मिला कि पारंपरिक राजनीतिक समीकरण स्थानीय चुनाव में कमजोर पड़े हैं।
बहादुरपुर में कांग्रेस की गुटबाजी का असर
बहादुरपुर में कांग्रेस के भीतर गुटबाजी और बागी उम्मीदवारों ने पार्टी के चुनावी समीकरण को प्रभावित किया। भाजपा ने अपेक्षाकृत मजबूत तरीके से चुनाव लड़ा, लेकिन वह भी बहुमत के आंकड़े तक नहीं पहुंच सकी।
ऐसे में यहां भी निर्दलीय पार्षद बोर्ड गठन में महत्वपूर्ण भूमिका में हैं। अध्यक्ष पद के चुनाव से पहले दोनों प्रमुख दलों की नजर निर्दलीयों पर रहेगी।
लक्ष्मणगढ़ में निर्दलीयों ने मारी बाजी
लक्ष्मणगढ़ में भाजपा ने 25 में से 20 वार्डों में उम्मीदवार उतारे। कांग्रेस सिर्फ 13 वार्डों में चुनाव लड़ सकी।
दोनों दलों के सीमित उम्मीदवार और संगठनात्मक चुनौतियों का फायदा निर्दलीयों को मिला। यहां 14 निर्दलीय प्रत्याशी चुनाव जीतकर आए। परिणाम ने स्थानीय स्तर पर पार्टी संगठनों की स्थिति पर सवाल खड़े किए हैं।
गोविंदगढ़ में BJP सबसे बड़ी पार्टी, बहुमत से एक सीट दूर
गोविंदगढ़-रामबास क्षेत्र को रामगढ़ विधायक सुखवंत सिंह का गृहक्षेत्र माना जाता है। इसलिए इस निकाय का परिणाम उनके लिए भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण रहा।
भाजपा ने 25 में से 23 वार्डों में उम्मीदवार उतारे और 12 सीटों पर जीत हासिल की। कांग्रेस को 2 सीटें मिलीं। हालांकि भाजपा बहुमत से एक सीट दूर रह गई। ऐसे में बोर्ड गठन के लिए निर्दलीयों का समर्थन जरूरी होगा।
थानागाजी में BJP आगे, लेकिन निर्दलीय निर्णायक
थानागाजी में भाजपा 11 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी। कांग्रेस को 7 सीटें मिलीं। भाजपा के पास बहुमत के लिए जरूरी संख्या से दो सीटें कम हैं।
कांग्रेस में टिकट वितरण को लेकर असंतोष की चर्चा रही। अब बोर्ड गठन के लिए निर्दलीय पार्षदों की भूमिका अहम हो गई है। यहां भी भाजपा को सत्ता हासिल करने के लिए समर्थन जुटाना होगा।
बड़ौदामेव में बागियों ने दोनों दलों को रोका
बड़ौदामेव में भाजपा और कांग्रेस दोनों को टिकट वितरण से जुड़ी नाराजगी का सामना करना पड़ा। स्थानीय दावेदारों की जगह दूसरे क्षेत्रों से जुड़े उम्मीदवारों को टिकट दिए जाने को लेकर विरोध की बात सामने आई।
पार्टी के बागी उम्मीदवारों ने अधिकृत प्रत्याशियों को चुनौती दी। इसका असर परिणामों में दिखाई दिया और किसी भी प्रमुख दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिल सका।
कठूमर में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी
कठूमर में कांग्रेस ने भाजपा पर बढ़त बनाई। कुल 20 वार्डों में कांग्रेस ने 10 सीटें जीतीं, जबकि भाजपा को 5 और निर्दलीयों को 5 सीटें मिलीं।
स्थानीय विकास से जुड़े मुद्दों को चुनाव में महत्वपूर्ण माना गया। भरतपुर सांसद संजना जाटव की सक्रियता का फायदा कांग्रेस को मिलने की स्थानीय राजनीतिक चर्चा रही। हालांकि बोर्ड गठन के लिए कांग्रेस को निर्दलीयों के समर्थन की जरूरत पड़ेगी।
खेड़ली में BJP ने बरकरार रखा दबदबा
खेड़ली भाजपा के लिए जिले का दूसरा स्पष्ट बहुमत वाला निकाय रहा। कुल 25 वार्डों में भाजपा ने 19 सीटें जीतकर बहुमत हासिल किया।
वार्ड 10 और 17 में भाजपा प्रत्याशी पहले ही निर्विरोध चुने जा चुके थे। बाकी वार्डों के परिणाम आने के बाद भाजपा ने बोर्ड बनाने की स्थिति मजबूत कर ली। स्थानीय स्तर पर खींची परिवार के प्रभाव को भी चुनावी समीकरण से जोड़कर देखा जा रहा है।
छह विधायकों की प्रतिष्ठा भी दांव पर थी
इन निकाय चुनावों में अलवर जिले के छह विधायकों की राजनीतिक प्रतिष्ठा भी जुड़ी थी। कई क्षेत्रों में विधायकों को चुनाव संचालन की जिम्मेदारी दी गई थी।
रामगढ़ विधायक सुखवंत सिंह के प्रभाव वाले चार निकायों में से सिर्फ नौगांवा में भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिला। कठूमर विधायक रमेश खींची के क्षेत्र में खेड़ली में भाजपा को बहुमत मिला, जबकि कठूमर में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी रही।
नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली के प्रभाव वाले मालाखेड़ा और बहादुरपुर में कांग्रेस बहुमत नहीं ला सकी। वहीं राजगढ़-लक्ष्मणगढ़ क्षेत्र में भी कांग्रेस का प्रदर्शन कमजोर रहा। थानागाजी में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी।
अलवर नगर निगम में भी बहुमत से पांच सीट दूर BJP
अलवर नगर निगम में भी भाजपा स्पष्ट बहुमत के आंकड़े से पांच सीट दूर रह गई। ऐसे में वन राज्यमंत्री और अलवर विधायक संजय शर्मा के सामने बोर्ड गठन की चुनौती बनी हुई है।
अब निर्दलीय पार्षदों का रुख तय करेगा कि नगर निगम में बोर्ड किस दल का बनता है। अध्यक्ष पद के चुनाव से पहले दोनों प्रमुख दलों की कोशिश निर्दलीयों को अपने पक्ष में करने की होगी।
नतीजों का बड़ा संदेश: स्थानीय चेहरे भारी पड़े
अलवर जिले के निकाय चुनावों का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश यही है कि कई जगह मतदाताओं ने पार्टी के बजाय स्थानीय प्रत्याशी और मुद्दों को प्राथमिकता दी।
12 निकायों में सिर्फ दो जगह स्पष्ट बहुमत मिलना बताता है कि भाजपा और कांग्रेस को बोर्ड गठन के लिए निर्दलीयों पर निर्भर रहना होगा। आने वाले दिनों में पार्षदों की लामबंदी, समर्थन और बोर्ड गठन को लेकर स्थानीय राजनीति में गतिविधियां तेज होने की संभावना है।