कैंसर की महंगी दवाओं पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, मरीज की मौत के बाद स्वत: संज्ञान; केंद्र सरकार से मांगा जवाब
कैंसर की जीवनरक्षक दवाओं की ऊंची कीमतों और इलाज में देरी के कारण एक मरीज की मौत के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया है। अदालत ने इसे केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं, बल्कि जीवन के अधिकार से जुड़ा व्यापक जनहित का मुद्दा बताया। कोर्ट ने केंद्र सरकार से महंगी पेटेंट दवाओं की उपलब्धता और उनकी कीमतों को लेकर जवाब तलब किया है।
जीवनरक्षक दवाओं की कीमतों पर सुप्रीम कोर्ट की चिंता
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहन की पीठ ने कहा कि कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली महंगी दवाएं आम मरीजों की पहुंच से बाहर होती जा रही हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह मामला केवल एक याचिकाकर्ता तक सीमित नहीं है, बल्कि उन सभी मरीजों से जुड़ा है जो आर्थिक कारणों से समय पर उपचार नहीं करा पाते। इसलिए इस मुद्दे पर व्यापक स्तर पर सुनवाई की जाएगी।
केरल हाईकोर्ट में लंबित याचिका से जुड़ा है मामला
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संबंधित याचिका पर फैसला केरल हाईकोर्ट अपने स्तर पर करेगा, जबकि शीर्ष अदालत महंगी जीवनरक्षक दवाओं की कीमत, उपलब्धता और सार्वजनिक हित से जुड़े व्यापक पहलुओं की समीक्षा करेगी। यह कार्रवाई ‘वर्किंग ग्रुप ऑन एक्सेस टू मेडिसिन्स एंड ट्रीटमेंट’ के संयोजकों ज्योत्सना सिंह और के. एम. गोपाकुमार द्वारा भेजे गए प्रतिनिधित्व के आधार पर शुरू की गई।
हाईकोर्ट में देरी पर भी जताई नाराजगी
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी चिंता जताई कि संबंधित मामले की सुनवाई समय पर पूरी नहीं हो सकी। अदालत के अनुसार, मेटास्टैटिक ब्रेस्ट कैंसर से पीड़ित एक महिला ने वर्ष 2022 में महंगी पेटेंट दवा रिबोसिक्लिब (Ribociclib) उपलब्ध कराने की मांग को लेकर केरल हाईकोर्ट का रुख किया था। हालांकि, कई बार सूचीबद्ध होने के बावजूद समय पर फैसला नहीं हो पाया और इस बीच याचिकाकर्ता की मृत्यु हो गई।
धारा 100 के इस्तेमाल पर भी हुई चर्चा
मामले की सुनवाई के दौरान पेटेंट अधिनियम की धारा 100 का भी उल्लेख हुआ। यह प्रावधान सार्वजनिक हित और जनस्वास्थ्य की आवश्यकता होने पर केंद्र सरकार को पेटेंट प्राप्त आविष्कार के उपयोग की अनुमति देने का अधिकार देता है। हालांकि, केंद्र सरकार ने पहले हाईकोर्ट में कहा था कि मौजूदा परिस्थितियां ऐसी नहीं हैं जिन्हें राष्ट्रीय आपातकाल जैसी स्थिति माना जाए, इसलिए इस प्रावधान का उपयोग उचित नहीं है।
केंद्र सरकार से मांगा विस्तृत जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने अब केंद्र सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा है कि महंगी पेटेंट दवाओं को आम मरीजों की पहुंच में लाने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं। अदालत का मानना है कि जीवनरक्षक दवाओं की उपलब्धता और वहनीयता (Affordability) सीधे तौर पर नागरिकों के जीवन के अधिकार से जुड़ा प्रश्न है। इस मामले का फैसला भविष्य में कैंसर और अन्य गंभीर बीमारियों के इलाज से जुड़ी नीतियों पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है।