रूस की नई यूरेशियन रणनीति पर दुनिया की नजर, क्या BRICS से ज्यादा ASEAN पर है पुतिन का फोकस?
रूस की विदेश नीति में हाल के वर्षों में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। पश्चिमी प्रतिबंधों के बीच मॉस्को अब एशिया और विशेष रूप से ASEAN देशों के साथ आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी को तेजी से मजबूत करने में जुटा है। इसी क्रम में राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की ‘ग्रेटर यूरेशियन पार्टनरशिप’ (Greater Eurasian Partnership) योजना चर्चा में है। कुछ रणनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस पहल से BRICS की तुलना में क्षेत्रीय संगठनों की भूमिका अधिक मजबूत हो सकती है, हालांकि इस पर अलग-अलग विशेषज्ञों की राय भी सामने आ रही है।
क्या है ‘ग्रेटर यूरेशियन पार्टनरशिप’ की अवधारणा?
‘ग्रेटर यूरेशियन पार्टनरशिप’ रूस की वह रणनीतिक सोच है, जिसके तहत यूरोप और एशिया के बड़े हिस्से को आर्थिक, व्यापारिक और परिवहन नेटवर्क के जरिए जोड़ने की कोशिश की जा रही है। इस मॉडल में यूरेशियन इकोनॉमिक यूनियन (EAEU), शंघाई सहयोग संगठन (SCO), ASEAN और चीन की बेल्ट एंड रोड पहल (BRI) जैसे मंचों के बीच तालमेल बढ़ाने की बात की जाती है। रूस का उद्देश्य पश्चिमी देशों पर आर्थिक निर्भरता कम करना और वैकल्पिक क्षेत्रीय ढांचा तैयार करना है।
ASEAN पर क्यों बढ़ा रूस का जोर?
यूक्रेन युद्ध के बाद लगे पश्चिमी प्रतिबंधों ने रूस को नए व्यापारिक साझेदार तलाशने के लिए प्रेरित किया है। ASEAN क्षेत्र तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं का समूह है, जहां ऊर्जा, रक्षा, एलपीजी, परमाणु ऊर्जा और निवेश के क्षेत्र में सहयोग की संभावनाएं मौजूद हैं। रूस वियतनाम, मलेशिया, थाईलैंड और अन्य दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ व्यापार बढ़ाकर अपने निर्यात बाजारों का विस्तार करना चाहता है। यही वजह है कि हाल के समय में ASEAN रूस की कूटनीतिक प्राथमिकताओं में प्रमुख स्थान पर दिखाई दे रहा है।
क्या BRICS को पीछे छोड़ रहा है रूस?
कुछ रणनीतिक विशेषज्ञों, जिनमें पूर्व भारतीय राजनयिक रघु गुरुराज भी शामिल हैं, का तर्क है कि रूस की नई प्राथमिकताओं में BRICS की तुलना में क्षेत्रीय संगठनों को अधिक महत्व मिल रहा है। उनका कहना है कि यूरेशियन कनेक्टिविटी, लॉजिस्टिक्स और व्यापार गलियारों जैसे मुद्दों पर EAEU, SCO और ASEAN रूस के लिए अधिक व्यावहारिक मंच साबित हो सकते हैं। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि रूस ने BRICS से दूरी बना ली है। BRICS अब भी वैश्विक दक्षिण (Global South) और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के लिए रूस की महत्वपूर्ण कूटनीतिक रणनीति का हिस्सा बना हुआ है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह बदलाव?
भारत BRICS और SCO दोनों का सदस्य है, लेकिन वह EAEU का हिस्सा नहीं है। साथ ही दक्षिण एशिया की भू-राजनीतिक परिस्थितियां और पाकिस्तान के साथ सीमित संपर्क भारत की यूरेशियन भूमि आधारित परियोजनाओं में भागीदारी को चुनौतीपूर्ण बनाते हैं। ऐसे में यदि रूस ASEAN और यूरेशियन नेटवर्क पर अधिक ध्यान देता है, तो भारत को भी अपनी ‘एक्ट ईस्ट’ नीति और दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ आर्थिक साझेदारी को और मजबूत करने की आवश्यकता महसूस हो सकती है।
रूस की रणनीति का व्यापक संदेश
विश्लेषकों का मानना है कि रूस अपनी विदेश नीति में बहुध्रुवीय व्यवस्था को मजबूत करने के लिए समानांतर आर्थिक और रणनीतिक ढांचे तैयार कर रहा है। इसका उद्देश्य केवल पश्चिमी प्रभाव को संतुलित करना ही नहीं, बल्कि रूस को एक स्वतंत्र वैश्विक शक्ति केंद्र के रूप में स्थापित करना भी है। आने वाले वर्षों में यह देखना अहम होगा कि BRICS, SCO, ASEAN और अन्य क्षेत्रीय मंच किस प्रकार एक-दूसरे के साथ समन्वय बनाते हैं और वैश्विक शक्ति संतुलन को किस दिशा में प्रभावित करते हैं।