राम मंदिर चढ़ावा विवाद: अशोक गहलोत ने ट्रस्ट भंग करने और सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच की मांग उठाई
राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने राम मंदिर चढ़ावा चोरी और कथित वित्तीय अनियमितताओं के मुद्दे पर केंद्र सरकार और राम मंदिर ट्रस्ट को लेकर कई सवाल उठाए हैं। उन्होंने मौजूदा ट्रस्ट को भंग करने, नए ट्रस्ट के गठन तथा पूरे मामले की जांच सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त या वर्तमान न्यायाधीश की निगरानी में कराने की मांग की। गहलोत ने यह बातें नई दिल्ली में कांग्रेस मुख्यालय में आयोजित प्रेस वार्ता के दौरान कहीं।
ट्रस्ट भंग कर नए गठन की उठाई मांग
अशोक गहलोत ने कहा कि चढ़ावे में कथित चोरी के आरोपों से श्रद्धालुओं की आस्था प्रभावित हुई है। उनके अनुसार, यदि शुरुआती स्तर पर ही ट्रस्ट में बदलाव कर दिया जाता तो लोगों का विश्वास बना रहता। उन्होंने कहा कि मौजूदा ट्रस्ट को भंग कर नया ट्रस्ट बनाया जाना चाहिए, जिसमें धार्मिक परंपराओं से जुड़े प्रमुख धर्माचार्यों और शंकराचार्यों को भी शामिल किया जाए। उनका दावा है कि इससे मंदिर प्रबंधन में पारदर्शिता और भरोसा दोनों मजबूत होंगे।
SIT जांच और चंदे की पारदर्शिता पर उठाए सवाल
पूर्व मुख्यमंत्री ने उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित एसआईटी की निष्पक्षता पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की जानी चाहिए ताकि लोग जान सकें कि जांच में क्या निष्कर्ष निकले हैं। गहलोत ने यह भी मांग की कि राम मंदिर निर्माण के लिए किस व्यक्ति या संस्था ने कितना चंदा दिया, इसकी जानकारी भी सार्वजनिक की जाए। उनके अनुसार, देशभर के श्रद्धालुओं के योगदान से बने मंदिर में वित्तीय पारदर्शिता बनाए रखना जरूरी है।
प्रधानमंत्री से हस्तक्षेप की अपील
गहलोत ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इस पूरे मामले में सार्वजनिक रूप से हस्तक्षेप करने की अपील की। उन्होंने कहा कि राम मंदिर देश की करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है, इसलिए इस मुद्दे पर स्पष्टता आनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि मामले में लगे आरोप गंभीर हैं और यदि किसी स्तर पर अनियमितता हुई है तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। गहलोत ने ट्रस्ट के कुछ पदाधिकारियों की भूमिका और वित्तीय प्रक्रियाओं को लेकर भी सवाल उठाए।
राजनीतिक आरोपों के बीच जांच पर टिकी नजर
पूर्व मुख्यमंत्री ने भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर भी निशाना साधते हुए कहा कि पूरे मामले में केवल औपचारिक कार्रवाई नहीं, बल्कि ठोस और पारदर्शी जांच होनी चाहिए। उन्होंने दावा किया कि श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़े मामले में जवाबदेही तय करना आवश्यक है। हालांकि, इस पूरे प्रकरण में संबंधित पक्षों की ओर से अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ चुकी हैं और मामले की जांच अभी जारी है। अंतिम निष्कर्ष जांच प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होंगे।