Pre-Diabetes के संकेत जो Diabetes बनने से पहले शरीर देता है, जानिए शुरुआती लक्षण और बचाव
क्या आपको बार-बार प्यास लगती है, बिना ज्यादा मेहनत किए भी थकान महसूस होती है या बार-बार पेशाब जाने की जरूरत पड़ती है? यदि हां, तो इन संकेतों को हल्के में लेना आपके लिए भारी पड़ सकता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार कई बार शरीर डायबिटीज होने से पहले ही कुछ ऐसे संकेत देना शुरू कर देता है, जिन्हें पहचानकर समय रहते बीमारी को रोका जा सकता है। CDC, ADA और Mayo Clinic का कहना है कि प्री-डायबिटीज की समय पर पहचान और जीवनशैली में बदलाव से टाइप-2 डायबिटीज का खतरा काफी हद तक कम किया जा सकता है।
प्री-डायबिटीज क्या है और क्यों है यह चेतावनी?
प्री-डायबिटीज ऐसी स्थिति होती है, जिसमें ब्लड शुगर सामान्य स्तर से ऊपर पहुंच जाता है, लेकिन अभी उसे डायबिटीज की श्रेणी में नहीं रखा जाता। विशेषज्ञ इसे शरीर की शुरुआती चेतावनी मानते हैं। इस अवस्था में इंसुलिन का प्रभाव कम होने लगता है और शरीर ग्लूकोज का सही उपयोग नहीं कर पाता। यदि इस समय खानपान, व्यायाम और वजन पर ध्यान नहीं दिया जाए, तो आने वाले वर्षों में टाइप-2 डायबिटीज विकसित होने की संभावना काफी बढ़ जाती है। इसलिए इस चरण को नजरअंदाज करना भविष्य में गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं को न्योता दे सकता है।
शरीर देता है ये शुरुआती संकेत
प्री-डायबिटीज के दौरान शरीर कई संकेत देता है, जिन्हें लोग अक्सर सामान्य समस्या समझकर अनदेखा कर देते हैं। इनमें बार-बार प्यास लगना, बार-बार पेशाब आना, बिना कारण थकान महसूस होना, जल्दी-जल्दी भूख लगना, धुंधला दिखाई देना और छोटे घावों का देर से भरना प्रमुख हैं। इसके अलावा गर्दन, बगल या कमर के आसपास त्वचा का काला और मोटा पड़ना भी इंसुलिन रेजिस्टेंस का संकेत हो सकता है। यदि इनमें से एक या अधिक लक्षण लंबे समय तक बने रहें, तो ब्लड शुगर की जांच कराना जरूरी है।
किन लोगों में ज्यादा रहता है खतरा?
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार कुछ लोगों में प्री-डायबिटीज का जोखिम दूसरों की तुलना में अधिक होता है। यदि आपकी उम्र 35 वर्ष या उससे अधिक है, वजन सामान्य से ज्यादा है, शारीरिक गतिविधि कम करते हैं या परिवार में किसी को डायबिटीज रही है, तो आपको अधिक सतर्क रहने की जरूरत है। इसके अलावा हाई ब्लड प्रेशर, महिलाओं में पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (PCOS) और गर्भावस्था के दौरान हुई डायबिटीज भी इस बीमारी का खतरा बढ़ा सकती है। ऐसे लोगों को नियमित स्वास्थ्य जांच कराते रहना चाहिए।
समय रहते कैसे होती है पहचान?
प्री-डायबिटीज की पुष्टि केवल लक्षणों के आधार पर नहीं की जाती, बल्कि कुछ विशेष ब्लड टेस्ट के जरिए इसका पता लगाया जाता है। डॉक्टर आमतौर पर फास्टिंग ब्लड शुगर टेस्ट, HbA1c टेस्ट और ओरल ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट कराने की सलाह देते हैं। HbA1c टेस्ट पिछले लगभग तीन महीनों के औसत ब्लड शुगर की जानकारी देता है, जबकि फास्टिंग और ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट शरीर में शुगर को नियंत्रित करने की क्षमता का आकलन करते हैं। इन रिपोर्टों के आधार पर डॉक्टर आगे की सलाह देते हैं।
जीवनशैली में बदलाव से टल सकता है खतरा
विशेषज्ञों का मानना है कि प्री-डायबिटीज को शुरुआती अवस्था में नियंत्रित किया जा सकता है। इसके लिए रोजाना कम से कम 30 मिनट पैदल चलना या व्यायाम करना, वजन नियंत्रित रखना और संतुलित आहार अपनाना बेहद जरूरी है। मीठे पेय, अधिक चीनी वाले खाद्य पदार्थ और प्रोसेस्ड फूड से दूरी बनानी चाहिए। इसके बजाय साबुत अनाज, हरी सब्जियां, ताजे फल और प्रोटीन से भरपूर भोजन को प्राथमिकता दें। पर्याप्त नींद, तनाव कम करना और नियमित स्वास्थ्य जांच भी डायबिटीज के खतरे को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
कब डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है?
यदि आपको लंबे समय से बार-बार प्यास लग रही है, बार-बार पेशाब आ रहा है, लगातार थकान बनी रहती है, धुंधला दिखाई देता है या घाव सामान्य से अधिक समय में भर रहे हैं, तो स्वयं इलाज करने के बजाय डॉक्टर से सलाह लें। समय पर जांच और सही मार्गदर्शन से प्री-डायबिटीज की पहचान की जा सकती है और टाइप-2 डायबिटीज होने की संभावना को काफी हद तक कम किया जा सकता है। छोटी-सी सतर्कता भविष्य में बड़ी स्वास्थ्य समस्याओं से बचा सकती है।