मारवाड़ निकाय चुनाव: बड़े दलों की धमक फीकी, निर्दलीयों के हाथ निकायों की चाबी
मारवाड़ में निकाय चुनाव का मुकाबला इस बार सिर्फ भाजपा और कांग्रेस के बीच नहीं है। नागौर और डीडवाना-कुचामन जिले के शहरी निकायों में निर्दलीय प्रत्याशी कई वार्डों में मुकाबले को त्रिकोणीय और रोचक बना रहे हैं। नागौर, डीडवाना और कुचामन नगर परिषद समेत कई नगर पालिकाओं में बुधवार को मतदान शुरू हो गया। वहीं बाकी निकायों में 11 सितंबर को दूसरे चरण में वोट डाले जाएंगे। शुरुआती घंटों में करीब 25 से 28 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया। स्थानीय समीकरण, व्यक्तिगत संपर्क और निर्दलीय प्रत्याशियों की मौजूदगी ने इस बार बड़े दलों के चुनावी गणित को उलझा दिया है।
17 निकायों में चुनाव, कई जगह पहली बार मतदान
नागौर और डीडवाना-कुचामन जिले में कुल 17 शहरी निकाय हैं। इनमें नागौर, डीडवाना, कुचामन और मकराना नगर परिषद के अलावा 14 नगर पालिकाएं शामिल हैं।
नवसृजित जायल, बासनी, रियांबड़ी, मेड़ता रोड और खाटू खुर्द के मतदाता पहली बार अपने क्षेत्र के पार्षद चुनने के लिए मतदान कर रहे हैं। वहीं पुराने निकायों में पिछले चुनावों का दलगत इतिहास इस बार भी उम्मीदवारों की रणनीति और मतदाताओं के रुख को प्रभावित कर रहा है।
नागौर में भाजपा-कांग्रेस के साथ निर्दलीयों की चुनौती
नागौर नगर परिषद के 60 वार्डों में भाजपा ने 46 और कांग्रेस ने 47 वार्डों में प्रत्याशी उतारे हैं। आरएलपी के उम्मीदवार भी 17 वार्डों में मैदान में हैं।
सबसे ज्यादा चर्चा निर्दलीय प्रत्याशियों को लेकर है। करीब 130 निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं। पिछले चुनाव में निर्दलीय सभापति बनने के बाद इस बार भी उनकी भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कई वार्डों में निर्दलीय प्रत्याशी भाजपा और कांग्रेस के समीकरण बिगाड़ने की स्थिति में नजर आ रहे हैं।
डीडवाना में यूनुस खान समर्थक निर्दलीयों पर नजर
डीडवाना नगर परिषद के 40 वार्डों में भाजपा ने 34 और कांग्रेस ने 37 प्रत्याशी मैदान में उतारे हैं। यहां निर्दलीय उम्मीदवारों की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
स्थानीय विधायक यूनुस खान के समर्थकों से जुड़े कई निर्दलीय प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं। वहीं कांग्रेस ने अपने बोर्ड को दोबारा सत्ता में लाने की रणनीति के तहत पूर्व विधायक चेतन डूडी को चुनाव की कमान सौंपी है। ऐसे में डीडवाना में पार्टी प्रत्याशियों के साथ व्यक्तिगत प्रभाव और स्थानीय नेटवर्क भी निर्णायक भूमिका निभा सकता है।
कुचामन में भाजपा-कांग्रेस आमने-सामने
कुचामनसिटी नगर परिषद के 45 वार्डों में भाजपा ने 41 और कांग्रेस ने 44 वार्डों में प्रत्याशी उतारे हैं। आरएलपी के सात प्रत्याशी भी मैदान में हैं, जबकि निर्दलीय उम्मीदवारों की संख्या भी मुकाबले को दिलचस्प बना रही है।
कुचामन का पिछला चुनावी इतिहास भी इस बार चर्चा में है। करीब छह साल पहले यहां बिना पार्षद बने सीधे सभापति चुने जाने वाला प्रदेश का पहला हाइब्रिड मॉडल सामने आया था। उस घटनाक्रम के बाद कांग्रेस ने लंबे अंतराल के बाद निकाय में वापसी की थी। अब भाजपा दोबारा बोर्ड बनाने के लिए पूरी ताकत लगा रही है।
मकराना में जातीय समीकरण बड़ी चुनौती
मकराना नगर परिषद को कांग्रेस का मजबूत क्षेत्र माना जाता रहा है। इस बार भाजपा ने 45 में से सिर्फ 23 वार्डों में प्रत्याशी उतारे हैं।
यहां जातीय समीकरण और स्थानीय सामाजिक समीकरण भाजपा के लिए बड़ी चुनौती माने जा रहे हैं। वहीं निर्दलीय उम्मीदवारों की मौजूदगी मुकाबले को और जटिल बना रही है। कई वार्डों में निर्दलीय उम्मीदवार किस ओर जाते हैं, इसका असर बोर्ड गठन के समय दिखाई दे सकता है।
कुचेरा में चाचा-भतीजे की सियासी टक्कर
कुचेरा की चुनावी राजनीति में रिश्तों का समीकरण भी चर्चा में है। भाजपा नेता रिछपाल मिर्धा जहां अपने पक्ष में बोर्ड बनाने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं उनके भतीजे कांग्रेस के समर्थन में सक्रिय बताए जा रहे हैं।
दूसरी ओर मूण्डवा, लाडनूं, बोरावड़, मेड़ता सिटी, डेगाना, परबतसर और नावां में भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबला कड़ा बताया जा रहा है। किसी एक दल के पक्ष में एकतरफा माहौल दिखाई नहीं दे रहा।
बड़े नेताओं की सीमित सक्रियता से भी सवाल
चुनावी मैदान में स्थानीय प्रत्याशी जहां पूरी ताकत लगा रहे हैं, वहीं बड़े नेताओं की सीमित मौजूदगी भी चर्चा का विषय है। भाजपा प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ ने मूण्डवा, मेड़ता सिटी और नागौर में थोड़े समय के लिए चुनावी दौरा किया।
इसके अलावा बड़े नेताओं की व्यापक मौजूदगी नजर नहीं आने से यह चुनाव काफी हद तक स्थानीय चेहरों और स्थानीय मुद्दों के भरोसे चलता दिखाई दे रहा है। यही वजह है कि इस बार पार्टी के बड़े नामों से ज्यादा वार्ड स्तर के समीकरण महत्वपूर्ण बन गए हैं।
निर्दलीयों के हाथ में क्यों हो सकती है सत्ता की चाबी?
मारवाड़ के कई निकायों में निर्दलीय उम्मीदवार बड़ी संख्या में चुनाव लड़ रहे हैं। ऐसे में अगर भाजपा या कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता है तो बोर्ड बनाने के लिए निर्दलीय पार्षदों का समर्थन जरूरी हो सकता है।
नागौर जैसे निकायों में निर्दलीयों की बड़ी संख्या को देखते हुए यह संभावना और मजबूत होती है। चुनाव परिणाम के बाद निर्दलीय पार्षद सत्ता पक्ष के लिए ‘किंगमेकर’ की भूमिका में आ सकते हैं।
कानाफूसी: असुरक्षित छत बनी मतदान केंद्र
नागौर के हनुमान बाग स्थित सरकारी स्कूल के भवन को पहले असुरक्षित घोषित किए जाने की बात सामने आई थी। लेकिन चुनाव के दौरान इसी भवन में वार्ड 41 के दो मतदान केंद्र बनाए गए।
मतदान से पहले भवन में मरम्मत भी कराई गई। चुनावी तैयारियों के दौरान भवन की छत की कुछ टूटी पट्टियां भी चर्चा में रहीं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जिस भवन को पहले असुरक्षित माना गया, वहां मतदान केंद्र बनाने से पहले सुरक्षा मानकों की पूरी जांच कैसे हुई।
चुनावी मनोरंजन में आरोप-प्रत्यारोप का दौर
मारवाड़ में चुनावी सभाओं के वीडियो भी सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं। भाजपा, कांग्रेस और आरएलपी नेताओं के बीच आरोप-प्रत्यारोप के कई वीडियो चर्चा में हैं।
कहीं नेताओं की तीखी बयानबाजी तो कहीं एक सभा में लगाए गए आरोपों का जवाब दूसरी सभा में दिए जाने से चुनावी माहौल और गरमा गया है। सोशल मीडिया ने स्थानीय निकाय चुनावों को भी लगातार चर्चा में बनाए रखा है।
हालांकि वायरल वीडियो में कही गई बातों की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है और राजनीतिक दलों के आरोपों को उसी रूप में देखा जाना चाहिए।
मतदान से पहले प्रत्याशियों ने झोंकी ताकत
मतदान से एक दिन पहले प्रत्याशियों ने वार्ड स्तर पर मतदाताओं से व्यक्तिगत संपर्क तेज कर दिया था। कई उम्मीदवारों ने नाराज मतदाताओं को मनाने और पुराने रिश्तों को सक्रिय करने की कोशिश की।
मतदाता खुलकर किसी प्रत्याशी के पक्ष में नहीं बोल रहे हैं, ऐसे में उम्मीदवारों ने अपने स्थानीय नेटवर्क और समर्थकों से फीडबैक लेना शुरू किया। अंतिम समय में व्यक्तिगत संपर्क, घर-घर पहुंच और वार्डवार रणनीति पर जोर रहा।
11 सितंबर को दूसरे चरण का मतदान
पहले चरण में नागौर, डीडवाना, कुचामन समेत कुछ निकायों में मतदान हो रहा है, जबकि शेष 8 निकायों में 11 सितंबर को दूसरे चरण के तहत मतदान कराया जाएगा।
अब निगाहें मतदान प्रतिशत, वार्डवार परिणाम और बोर्ड गठन पर रहेंगी। खास बात यह होगी कि भाजपा और कांग्रेस में से कौन अपने दम पर बहुमत हासिल करता है और कहां निर्दलीय पार्षद सत्ता की चाबी अपने हाथ में रखते हैं।