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महेश भट्ट ने निर्देशन से लिया संन्यास, बोले- अब नई पीढ़ी का समय, वापसी का कोई अफसोस नहीं

हिंदी सिनेमा के दिग्गज फिल्मकार महेश भट्ट ने निर्देशन से हमेशा के लिए दूरी बनाने का ऐलान कर दिया है। उन्होंने साफ कहा कि उन्हें इस फैसले का कोई अफसोस नहीं है। महेश भट्ट का मानना है कि आज फिल्म निर्माण का तरीका पूरी तरह बदल चुका है और अब वह कैमरे के पीछे नहीं, बल्कि नई पीढ़ी के फिल्मकारों का मार्गदर्शन करके संतुष्टि महसूस करते हैं।

निर्देशन में वापसी की अटकलों पर लगाया विराम

हिंदी सिनेमा के मशहूर निर्देशक, लेखक और निर्माता महेश भट्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अब दोबारा किसी फिल्म का निर्देशन नहीं करेंगे। एक बातचीत में उन्होंने कहा कि उन्होंने निर्देशक के रूप में अपना सफर पूरी संतुष्टि के साथ पूरा किया है और अब इस भूमिका में लौटने की उनकी कोई इच्छा नहीं है। उनके मुताबिक, जीवन के इस पड़ाव पर वह अपने फैसले से पूरी तरह संतुष्ट हैं और निर्देशन छोड़ने का उन्हें बिल्कुल भी पछतावा नहीं है।

आज का फिल्म निर्माण पहले से पूरी तरह अलग

महेश भट्ट ने कहा कि मौजूदा दौर में फिल्म इंडस्ट्री का काम करने का तरीका काफी बदल चुका है। उनके अनुसार अब फिल्मों की योजना मार्केट रिसर्च, ट्रेंड्स, बिजनेस स्ट्रैटेजी और दर्शकों की पसंद को ध्यान में रखकर बनाई जाती है। पहले निर्देशक को अपनी कल्पना और निजी दृष्टिकोण के आधार पर कहानी कहने की अधिक स्वतंत्रता मिलती थी, जबकि आज कंटेंट का बड़ा हिस्सा तय फॉर्मूलों और व्यावसायिक रणनीतियों के अनुसार तैयार होता है। यही बदलाव उन्हें निर्देशन से दूर रहने के फैसले पर कायम रखता है।

सिनेमा उनके लिए सिर्फ मनोरंजन नहीं था

महेश भट्ट ने कहा कि उन्होंने हमेशा फिल्मों को अपनी व्यक्तिगत अभिव्यक्ति का माध्यम माना। उनके लिए सिनेमा केवल मनोरंजन का जरिया नहीं था, बल्कि समाज, रिश्तों और इंसानी भावनाओं को समझने और उन्हें पर्दे पर उतारने का माध्यम भी था। यही वजह रही कि उनकी कई फिल्मों में निजी अनुभवों और वास्तविक जीवन की झलक दिखाई देती है, जिससे दर्शकों ने खुद को गहराई से जुड़ा हुआ महसूस किया।

नई पीढ़ी के साथ काम करने में मिलती है खुशी

महेश भट्ट का कहना है कि अब उन्हें खुद फिल्म निर्देशित करने से ज्यादा संतोष युवा कलाकारों और नए फिल्मकारों का मार्गदर्शन करने में मिलता है। उनका मानना है कि आने वाला समय नई सोच और नए क्रिएटिव टैलेंट का है। ऐसे में अनुभवी लोगों की भूमिका उन्हें सही दिशा दिखाने और अपने अनुभव साझा करने की होनी चाहिए। यही कारण है कि वह अब कैमरे के पीछे लौटने के बजाय नई प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने पर ध्यान देना चाहते हैं।

कई यादगार फिल्मों से बनाई अलग पहचान

करीब पांच दशक लंबे करियर में महेश भट्ट ने हिंदी सिनेमा को कई ऐसी फिल्में दीं, जिन्होंने दर्शकों के दिलों पर गहरी छाप छोड़ी। ‘अर्थ’, ‘सारांश’, ‘डैडी’, ‘नाम’, ‘जख्म’ जैसी फिल्मों के जरिए उन्होंने पारिवारिक रिश्तों, मानसिक संघर्ष, प्रेम और सामाजिक मुद्दों को बेहद संवेदनशील तरीके से बड़े पर्दे पर प्रस्तुत किया। निर्देशक के साथ-साथ लेखक और निर्माता के रूप में भी उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री को कई सफल और यादगार प्रोजेक्ट दिए।

फिल्मों से नहीं, सिर्फ निर्देशन से बनाई दूरी

हालांकि महेश भट्ट ने निर्देशन में वापसी की संभावना को पूरी तरह खारिज कर दिया है, लेकिन उन्होंने सिनेमा से दूरी बनाने की बात नहीं कही। उनका कहना है कि वह आगे भी नए प्रोजेक्ट्स और रचनात्मक गतिविधियों से जुड़े रहेंगे। उनका अनुभव आने वाले समय में नई पीढ़ी के फिल्मकारों और कलाकारों के लिए मार्गदर्शन का काम करेगा। ऐसे में भले ही दर्शकों को उनकी नई निर्देशित फिल्म देखने को न मिले, लेकिन उनके विचार और अनुभव हिंदी सिनेमा पर अपना प्रभाव जरूर छोड़ते रहेंगे।

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