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हल्दीघाटी युद्ध के असली विजेता महाराणा प्रताप थे: मोहन भागवत

उदयपुर में आयोजित महाराणा प्रताप जयंती एवं हल्दीघाटी विजय सार्द्ध चतुःशती समारोह में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि हल्दीघाटी युद्ध की वास्तविक विजय महाराणा प्रताप की थी। उन्होंने इतिहास की विभिन्न व्याख्याओं का उल्लेख करते हुए कहा कि समय के साथ कई घटनाओं को अलग-अलग दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया, लेकिन जनमानस आज भी महाराणा प्रताप को ही विजय और स्वाभिमान का प्रतीक मानता है।

हल्दीघाटी युद्ध पर रखा अपना दृष्टिकोण

मोहन भागवत ने अपने संबोधन में कहा कि हल्दीघाटी का युद्ध केवल सैन्य संघर्ष नहीं था, बल्कि स्वाभिमान और स्वतंत्रता की रक्षा का प्रतीक था। उन्होंने कहा कि इतिहास को अक्सर विजेताओं और इतिहासकारों के नजरिए से लिखा गया, जिसके कारण कई घटनाओं की व्याख्या समय-समय पर बदलती रही। उनके अनुसार महाराणा प्रताप ने कठिन परिस्थितियों में भी संघर्ष जारी रखा और अपने आत्मसम्मान से कभी समझौता नहीं किया। यही कारण है कि आज भी उनका नाम सम्मान और प्रेरणा के साथ लिया जाता है।

इतिहास की पुनर्व्याख्या की जरूरत बताई

सरसंघचालक ने कहा कि इतिहास केवल घटनाओं का संकलन नहीं होता, बल्कि उसे लिखने वालों के दृष्टिकोण का भी उस पर प्रभाव पड़ता है। उन्होंने कहा कि मुगलकालीन इतिहासकारों द्वारा लिखे गए विवरणों को लंबे समय तक अंतिम सत्य के रूप में स्वीकार किया गया, जबकि कई ऐतिहासिक घटनाओं पर नए सिरे से अध्ययन और विमर्श की आवश्यकता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि इतिहास को व्यापक संदर्भों में समझना चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ियों को संतुलित और तथ्यात्मक जानकारी मिल सके।

महाराणा प्रताप के प्रति जनभावना को बताया सबसे बड़ा प्रमाण

मोहन भागवत ने कहा कि किसी भी ऐतिहासिक व्यक्तित्व की वास्तविक पहचान जनता की स्मृति और सम्मान में दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि दुनिया में कहीं भी अकबर की जयंती व्यापक रूप से नहीं मनाई जाती, जबकि महाराणा प्रताप का स्मरण आज भी देशभर में श्रद्धा और गौरव के साथ किया जाता है। उनके अनुसार यह जनभावना इस बात का संकेत है कि लोगों के मन में महाराणा प्रताप का स्थान कितना ऊंचा है और उन्हें संघर्ष, स्वाभिमान तथा राष्ट्रभक्ति का प्रतीक माना जाता है।

समाज में एकता और समरसता पर दिया जोर

अपने संबोधन के दौरान भागवत ने भारतीय समाज की एकता और समरसता को देश की सबसे बड़ी शक्ति बताया। उन्होंने कहा कि भारत की संस्कृति सभी को साथ लेकर चलने और विविधताओं को स्वीकार करने की रही है। यहां विभिन्न समुदायों, परंपराओं और विचारों को सम्मान दिया गया है। उन्होंने कहा कि समाज में मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन उन्हें संघर्ष का कारण नहीं बनने देना चाहिए। देश की मजबूती तभी संभव है जब समाज आपसी सहयोग और सौहार्द के साथ आगे बढ़े।

सामान्य समय में भी एकजुट रहने का आह्वान

भागवत ने कहा कि जब देश की सीमाओं पर संकट आता है तो पूरा राष्ट्र एकजुट होकर खड़ा हो जाता है, लेकिन यही एकता सामान्य परिस्थितियों में भी बनी रहनी चाहिए। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखते हुए सभी नागरिकों को आपसी भेदभाव से ऊपर उठना चाहिए। उनके अनुसार मजबूत राष्ट्र निर्माण के लिए सामाजिक एकता, सांस्कृतिक गौरव और साझा जिम्मेदारी की भावना आवश्यक है। उन्होंने लोगों से राष्ट्रहित को प्राथमिकता देने और एकजुट समाज के निर्माण में योगदान देने की अपील की।

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