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करूर भगदड़ मामले में तमिलनाडु सरकार को सुप्रीम कोर्ट से राहत, हाईकोर्ट के आदेश पर अंतरिम रोक


तमिलनाडु के करूर में सितंबर 2025 में हुई भगदड़ में 41 लोगों की मौत के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को अंतरिम राहत दी है। शीर्ष अदालत ने मद्रास हाईकोर्ट के उस फैसले पर फिलहाल रोक लगा दी है, जिसमें भगदड़ में जान गंवाने वालों के परिजनों को अनुकंपा के आधार पर सरकारी नौकरी देने के राज्य सरकार के निर्णय को रद्द कर दिया गया था। न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने तमिलनाडु सरकार की याचिका पर सुनवाई करते हुए संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया। अब इस मामले में सरकारी नौकरी देने की नीति फिलहाल न्यायिक समीक्षा के अधीन रहेगी।

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश पर लगाई रोक

सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार और अन्य की ओर से दाखिल याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए मद्रास हाईकोर्ट के फैसले पर अंतरिम रोक लगा दी। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के उस फैसले को रद्द किया था, जिसके तहत करूर भगदड़ में मृत लोगों के परिवारों को अनुकंपा के आधार पर सरकारी नौकरी देने का निर्णय लिया गया था। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने मामले में संबंधित पक्षों को नोटिस भी जारी किया है। अंतरिम आदेश के बाद राज्य सरकार के फैसले को तत्काल प्रभाव से पूरी तरह निष्प्रभावी करने वाला हाईकोर्ट का आदेश फिलहाल लागू नहीं रहेगा। अंतिम निर्णय आगे की सुनवाई के बाद होगा।

राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में क्या दलील दी?

तमिलनाडु सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी ने हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए कई दलीलें रखीं। उन्होंने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति जैसे मामले में जनहित याचिका के जरिए हस्तक्षेप का सवाल उठता है। राज्य सरकार का पक्ष था कि यदि सरकार किसी त्रासदी से प्रभावित परिवारों को राहत देने के लिए विशेष कदम उठाती है, तो उसे केवल इसी आधार पर रद्द नहीं किया जाना चाहिए। सरकार ने यह भी तर्क दिया कि मृतकों के परिवारों की आर्थिक स्थिति को देखते हुए नौकरी को राहत पैकेज का हिस्सा माना गया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क पर विचार करते हुए हाईकोर्ट के आदेश पर अंतरिम रोक लगाई।

सुप्रीम कोर्ट ने परिवारों की स्थिति पर जताई चिंता

सुनवाई के दौरान पीठ ने पीड़ित परिवारों की स्थिति को लेकर महत्वपूर्ण मौखिक टिप्पणियां कीं। अदालत ने सवाल उठाया कि यदि किसी परिवार में हादसे में एकमात्र कमाने वाला सदस्य मारा गया हो, तो ऐसे परिवार की सहायता के लिए सरकार की ओर से नौकरी देने के फैसले पर किस तरह विचार किया जाना चाहिए। अदालत की टिप्पणी का केंद्र यह था कि त्रासदी के बाद सरकार यदि राहत और पुनर्वास के तौर पर कोई कदम उठाती है तो उसके औचित्य पर भी विचार जरूरी है। हालांकि, ये टिप्पणियां मौखिक थीं और मामले का अंतिम कानूनी निर्णय अभी बाकी है।

सुनवाई के दौरान राजनीति का मुद्दा भी उठा

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के फैसले का विरोध कर रहे एक वकील ने आरोप लगाया कि सरकार अपनी इच्छा के अनुसार सरकारी नौकरियां नहीं बांट सकती। उन्होंने करूर भगदड़ के लिए जिम्मेदारी से जुड़े राजनीतिक पहलू का भी उल्लेख किया। इस पर पीठ ने पूछा कि संबंधित वकील किस पक्ष की ओर से पेश हो रहे हैं। जब उन्होंने राजनीतिक दल की ओर से पेश होने की बात कही तो अदालत ने सुनवाई के दौरान राजनीति नहीं लाने की बात कही। इससे स्पष्ट हुआ कि सुप्रीम कोर्ट मामले की सुनवाई को कानूनी और संवैधानिक सवालों के दायरे में रखना चाहता है।

मद्रास हाईकोर्ट ने नौकरी के फैसले को क्यों रद्द किया था?

मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ ने राज्य सरकार के उस आदेश को रद्द कर दिया था, जिसके तहत करूर भगदड़ में मृत लोगों के परिजनों को सरकारी नौकरी देने का निर्णय लिया गया था। हाईकोर्ट ने इसे संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 में निहित समानता और सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर के सिद्धांत से जोड़कर देखा था। अदालत का तर्क था कि किसी विशेष घटना के पीड़ित परिवारों के लिए सरकारी नौकरी की अलग व्यवस्था भविष्य में दूसरे मामलों में भी ऐसी मांगों का रास्ता खोल सकती है। हाईकोर्ट ने इस तरह की व्यवस्था के व्यापक संवैधानिक प्रभावों पर चिंता जताई थी।

करूर में सितंबर 2025 में क्या हुआ था?

करूर में सितंबर 2025 में तमिलगा वेत्री कझगम (TVK) की एक राजनीतिक रैली के दौरान भगदड़ मच गई थी। इस हादसे में 41 लोगों की मौत हुई थी और बड़ी संख्या में लोग प्रभावित हुए थे। घटना के बाद मृतकों के परिवारों के लिए राहत और मुआवजे की घोषणा की गई। तमिलनाडु सरकार ने प्रभावित परिवारों के एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने का निर्णय भी लिया था। बाद में इसी निर्णय को कानूनी चुनौती मिली और मद्रास हाईकोर्ट ने सरकार के आदेश को रद्द कर दिया। अब सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश के बाद इस मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी।

अब आगे क्या होगा?

सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश के बाद मामले की अंतिम कानूनी स्थिति अभी तय नहीं हुई है। अदालत ने संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। आगे की सुनवाई में यह तय होगा कि क्या राज्य सरकार का विशेष राहत के तौर पर सरकारी नौकरी देने का निर्णय संवैधानिक प्रावधानों और अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े नियमों के अनुरूप है। फिलहाल हाईकोर्ट के आदेश पर लगी रोक तमिलनाडु सरकार के लिए राहत है। वहीं पीड़ित परिवारों की नजर इस बात पर रहेगी कि सुप्रीम कोर्ट अंतिम रूप से इस नीति को लेकर क्या फैसला सुनाता है।

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