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ईरान-अमेरिका समझौते के बावजूद खाड़ी देशों की बढ़ी चिंता, शांति से ज्यादा स्थिरता पर टिकी निगाहें

अमेरिका और ईरान के बीच हाल ही में हुए समझौते ने मध्य पूर्व में तनाव कम होने की उम्मीद जरूर जगाई है, लेकिन खाड़ी देशों की चिंताएं अभी खत्म नहीं हुई हैं। क्षेत्र के कई देश इस बात को लेकर आशंकित हैं कि अगर समझौता लंबे समय तक नहीं टिक पाया और संघर्ष फिर भड़क उठा, तो सबसे बड़ा आर्थिक और सुरक्षा नुकसान उन्हें ही उठाना पड़ेगा। खासकर होर्मुज़ जलडमरूमध्य, तेल निर्यात और क्षेत्रीय स्थिरता को लेकर चिंता लगातार बनी हुई है।

समझौते के बाद भी थम नहीं रहा क्षेत्रीय तनाव

अमेरिका और ईरान के बीच समझौते के बावजूद क्षेत्र में पूरी तरह शांति नहीं लौटी है। लेबनान में इसराइल और हिज़्बुल्लाह के बीच जारी संघर्ष ने समझौते की स्थिरता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। विश्लेषकों का मानना है कि जब तक क्षेत्र के सभी प्रमुख मोर्चों पर हिंसा नहीं रुकती, तब तक किसी भी समझौते को स्थायी नहीं माना जा सकता। यही वजह है कि खाड़ी देशों की सरकारें और आम नागरिक दोनों स्थिति पर करीबी नजर बनाए हुए हैं।

मिसाइल और ड्रोन हमलों की याद अब भी ताजा

खाड़ी देशों की सबसे बड़ी चिंता सुरक्षा को लेकर है। हाल के संघर्ष के दौरान ईरानी मिसाइलों और ड्रोन हमलों ने उन क्षेत्रों को भी प्रभावित किया जहां अमेरिकी सैन्य ठिकाने मौजूद हैं। इससे तेल समृद्ध देशों की सुरक्षित और स्थिर क्षेत्र की छवि को नुकसान पहुंचा। कई परिवारों और बच्चों ने पहली बार युद्ध जैसी परिस्थितियों का सामना किया। ऐसे में लोग नहीं चाहते कि क्षेत्र फिर किसी बड़े सैन्य टकराव की ओर बढ़े।

होर्मुज़ जलडमरूमध्य बना सबसे बड़ा मुद्दा

खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्था काफी हद तक तेल निर्यात पर निर्भर करती है और इसके लिए होर्मुज़ जलडमरूमध्य बेहद महत्वपूर्ण है। दुनिया के बड़े हिस्से तक तेल की आपूर्ति इसी समुद्री मार्ग से होती है। संघर्ष के दौरान इस मार्ग पर दबाव बढ़ा और जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई। समझौते के बाद स्थिति सामान्य होने लगी थी, लेकिन नए तनाव के संकेतों ने फिर अनिश्चितता पैदा कर दी है। यदि इस मार्ग में दोबारा बाधा आती है तो वैश्विक ऊर्जा बाजार और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्थाओं पर गंभीर असर पड़ सकता है।

आर्थिक लाभ के वादों पर भी बनी हुई है उलझन

समझौते में ईरान को संभावित आर्थिक राहत, प्रतिबंधों में ढील और बड़े निवेश पैकेज जैसे वादों की चर्चा हुई है। हालांकि इन योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर अभी स्पष्टता नहीं है। यह भी साफ नहीं है कि प्रस्तावित आर्थिक सहायता किस तरह उपलब्ध कराई जाएगी और इसमें खाड़ी देशों की भूमिका क्या होगी। कई क्षेत्रीय विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक सुरक्षा और स्थिरता की ठोस गारंटी नहीं मिलती, तब तक खाड़ी देश किसी बड़े आर्थिक योगदान को लेकर सतर्क रुख अपनाएंगे।

खाड़ी देशों को चाहिए स्थायी शांति का भरोसा

विशेषज्ञों के अनुसार, ईरान और उसके अरब पड़ोसियों के बीच वास्तविक विश्वास बहाली अभी भी एक लंबी प्रक्रिया है। हालांकि भविष्य में निवेश और आर्थिक सहयोग के जरिए संबंध बेहतर हो सकते हैं, लेकिन इसके लिए क्षेत्रीय सुरक्षा की मजबूत व्यवस्था जरूरी होगी। फिलहाल खाड़ी देशों की प्राथमिकता यही है कि समझौता कायम रहे, व्यापार और तेल आपूर्ति बिना रुकावट जारी रहे तथा आम लोगों को युद्ध और अस्थिरता के माहौल का सामना न करना पड़े।

आम लोगों की सबसे बड़ी उम्मीद है सामान्य जीवन

राजनीतिक और रणनीतिक चर्चाओं के बीच आम नागरिकों की सबसे बड़ी चिंता अपनी सुरक्षा और सामान्य जीवन है। लोग चाहते हैं कि उन्हें फिर से युद्ध के सायरन, मिसाइल हमलों या बंकरों की ओर भागने जैसी परिस्थितियों का सामना न करना पड़े। इसलिए क्षेत्र के लोगों की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि अमेरिका और ईरान के बीच हुआ समझौता वास्तव में शांति और स्थिरता का रास्ता खोल पाता है या नहीं।

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