सिंधु जल संधि पर पाकिस्तान की बढ़ी चिंता, पूर्व WAPDA प्रमुख ने गिनाए संभावित असर
सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty-IWT) को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव लगातार बना हुआ है। पाकिस्तान के जल एवं बिजली विकास प्राधिकरण (WAPDA) के पूर्व चेयरमैन लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) मुहम्मद सईद ने दावा किया है कि यदि मौजूदा स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो पाकिस्तान को जल, कृषि, ऊर्जा और बाढ़ प्रबंधन जैसे कई क्षेत्रों में गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि, ये उनके सार्वजनिक दावे और आकलन हैं, जिन पर भारत की ओर से इस संदर्भ में कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
पूर्व WAPDA प्रमुख ने जताई गहरी चिंता
पाकिस्तान के पूर्व WAPDA चेयरमैन लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) मुहम्मद सईद ने एक लेख में कहा कि सिंधु जल संधि पाकिस्तान के जल प्रबंधन ढांचे की आधारशिला रही है। उनके अनुसार, देश का सिंधु बेसिन सिंचाई तंत्र (IBIS) दुनिया के सबसे बड़े सिंचाई नेटवर्क में शामिल है और करोड़ों लोगों की कृषि गतिविधियां इसी पर निर्भर हैं। उनका दावा है कि यदि जल प्रवाह और जल प्रबंधन की मौजूदा व्यवस्था प्रभावित होती है तो इसका असर देश की खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा पर भी पड़ सकता है।
भारत के कदमों पर लगाए आरोप
मुहम्मद सईद ने आरोप लगाया कि भारत ने पश्चिमी नदियों से जुड़े बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की गति बढ़ाई है और जल संबंधी आंकड़ों (हाइड्रोलॉजिकल डेटा) के आदान-प्रदान पर भी रोक लगा दी है। उनके अनुसार, इससे पाकिस्तान के लिए बाढ़ की पूर्व चेतावनी प्रणाली प्रभावित हुई है। गौरतलब है कि इन आरोपों पर भारत की ओर से इस संदर्भ में कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। भारत पहले भी यह कह चुका है कि सिंधु जल संधि और सीमा पार आतंकवाद के मुद्दों को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता।
पाकिस्तान ने गिनाए छह संभावित प्रभाव
पूर्व सैन्य अधिकारी ने अपने विश्लेषण में छह प्रमुख संभावित चुनौतियों का उल्लेख किया है। इनमें कृषि उत्पादन पर असर, चिनाब नदी पर निर्भर सिंचाई व्यवस्था, बाढ़ की पूर्वानुमान प्रणाली में कठिनाई, भारत की जल परियोजनाओं से जल प्रवाह पर संभावित प्रभाव, जलविद्युत उत्पादन में बाधा और संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) को हासिल करने में मुश्किलें शामिल हैं। ये सभी उनके व्यक्तिगत आकलन हैं और भविष्य की संभावनाओं के रूप में प्रस्तुत किए गए हैं।
कृषि और ऊर्जा सुरक्षा पर जताई चिंता
मुहम्मद सईद के अनुसार, पाकिस्तान का अधिकांश कृषि उत्पादन सिंधु नदी प्रणाली पर आधारित है। उनका कहना है कि यदि जल प्रवाह में अनिश्चितता बढ़ती है तो सिंचाई व्यवस्था प्रभावित हो सकती है, जिससे कृषि उत्पादन और खाद्य सुरक्षा पर असर पड़ सकता है। उन्होंने यह भी आशंका जताई कि पश्चिमी नदियों पर निर्भर जलविद्युत परियोजनाओं के संचालन में भी चुनौतियां पैदा हो सकती हैं, जिससे ऊर्जा क्षेत्र प्रभावित होने की संभावना है।
भारत का रुख क्या है?
भारत का कहना है कि सिंधु जल संधि 1960 की परिस्थितियों में बनी थी और मौजूदा समय में सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन तथा जल प्रबंधन की नई चुनौतियों के अनुरूप इसकी समीक्षा की आवश्यकता है। भारत यह भी दोहराता रहा है कि सीमा पार आतंकवाद और द्विपक्षीय संबंधों के मौजूदा स्वरूप को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। दूसरी ओर पाकिस्तान इस संधि को दोनों देशों के बीच जल सहयोग का महत्वपूर्ण आधार मानता है। ऐसे में यह मुद्दा केवल जल बंटवारे तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि क्षेत्रीय कूटनीति और सुरक्षा से भी जुड़ गया है।