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LNG से कच्चे तेल तक भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर बड़ा सवाल, जानिए कितना गहरा है संकट

नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में जारी तनाव और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से जुड़े जोखिमों ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर नई चिंता पैदा कर दी है। LNG की आपूर्ति में व्यवधान, कच्चे तेल के आयात पर भारी निर्भरता और सीमित रणनीतिक भंडारण क्षमता ने चुनौती बढ़ा दी है। कतर से LNG आपूर्ति प्रभावित होने के बाद भारत को अमेरिका, ओमान, अफ्रीका और अन्य देशों से आयात बढ़ाना पड़ा है। दूसरी ओर, भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा करता है। ऐसे में सवाल यह है कि अगर वैश्विक सप्लाई रूट लंबे समय तक प्रभावित रहे तो भारत के पास कितने दिनों का सुरक्षित भंडार है और सरकार इसके लिए क्या कदम उठा रही है?

कतर की LNG सप्लाई प्रभावित, भारत की बढ़ी चिंता

भारत LNG का बड़ा आयातक है और लंबे समय से कतर उसके प्रमुख आपूर्तिकर्ताओं में शामिल रहा है। पश्चिम एशिया में संघर्ष के कारण कतर के रास लाफन गैस उत्पादन क्षेत्र में व्यवधान की खबरों के बाद LNG आपूर्ति प्रभावित हुई। इसके चलते भारतीय कंपनियों को वैकल्पिक स्रोतों से गैस खरीदने की जरूरत बढ़ी। पेट्रोनेट LNG के अधिकारियों के मुताबिक भविष्य की आपूर्ति स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की स्थिति और कतर में उत्पादन बहाली की योजना पर निर्भर करेगी। ऐसे में सितंबर से आगे की LNG उपलब्धता को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। इसका सीधा असर भारत के गैस आयात और घरेलू बाजार पर पड़ सकता है।

56 LNG कार्गो प्रभावित होने का दावा

आपूर्ति संकट का असर LNG की शिपमेंट पर भी पड़ा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार अब तक 56 LNG कार्गो प्रभावित हुए हैं। कतर से LNG लाने के लिए इस्तेमाल होने वाले पेट्रोनेट के कुछ टैंकर भी प्रभावित हुए हैं। लंबी अवधि के अनुबंधों के बावजूद यदि आपूर्ति में लगातार व्यवधान रहता है तो भारतीय कंपनियों को वैकल्पिक बाजार से LNG खरीदनी पड़ सकती है। स्पॉट मार्केट में गैस की कीमतें आमतौर पर दीर्घकालिक अनुबंधों की तुलना में अधिक अस्थिर होती हैं। इससे आयात लागत बढ़ सकती है और उसका असर गैस आधारित उद्योगों, सिटी गैस कंपनियों और उपभोक्ताओं तक पहुंच सकता है।

उद्योगों को गैस कटौती, महंगी LNG से बढ़ा दबाव

LNG आपूर्ति में कमी का सबसे पहला असर बड़े औद्योगिक उपभोक्ताओं पर पड़ता है। संकट के शुरुआती दौर में उद्योगों और सिटी गैस कंपनियों को गैस आपूर्ति में कटौती का सामना करना पड़ा। घरेलू PNG और CNG जैसे प्राथमिकता वाले क्षेत्रों को अपेक्षाकृत पहले गैस उपलब्ध कराने की कोशिश की गई। वहीं महंगी स्पॉट LNG खरीदने से कंपनियों की लागत बढ़ी। गैस की कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर सिटी गैस वितरण कंपनियों के मार्जिन पर भी पड़ा। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में LNG की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं तो इसका प्रभाव परिवहन, उद्योग और ऊर्जा लागत पर देखने को मिल सकता है।

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बना सबसे बड़ा जोखिम

भारत के लिए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बेहद महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्ग है। पश्चिम एशिया से आने वाले तेल और LNG के बड़े हिस्से की आवाजाही इसी समुद्री रास्ते से होती है। क्षेत्र में सैन्य तनाव बढ़ने या इस मार्ग पर आवाजाही बाधित होने की स्थिति में जहाजों की आवाजाही, बीमा लागत और माल ढुलाई खर्च बढ़ सकता है। इसका असर भारत के ऊर्जा आयात पर पड़ने की आशंका है। यही वजह है कि भारत LNG के लिए नए आपूर्तिकर्ताओं की तलाश कर रहा है। हालांकि वैकल्पिक स्रोतों से खरीद बढ़ाना तत्काल राहत दे सकता है, लेकिन लंबे समय की ऊर्जा सुरक्षा के लिए पर्याप्त भंडारण क्षमता जरूरी होगी।

अमेरिका समेत कई देशों से बढ़ाया LNG आयात

कतर पर निर्भरता कम करने के लिए भारत ने LNG खरीद के स्रोतों में विविधता बढ़ाई है। अमेरिका, ओमान, नाइजीरिया, अंगोला, ब्राजील और मोजाम्बिक जैसे देशों से आयात बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए गए हैं। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक मई से जुलाई 2026 के दौरान अमेरिका भारत के प्रमुख LNG आपूर्तिकर्ताओं में सबसे आगे रहा, जबकि कतर से आयात में बड़ी गिरावट दर्ज हुई। ऑस्ट्रेलिया से भी LNG आपूर्ति बढ़ाने की संभावनाएं हैं। हालांकि विशेषज्ञों के मुताबिक किसी एक नए देश पर अत्यधिक निर्भरता भी भविष्य में जोखिम पैदा कर सकती है। इसलिए भारत को आपूर्ति स्रोतों में संतुलन बनाए रखना होगा।

कच्चे तेल के मामले में भी भारत आयात पर निर्भर

LNG के साथ भारत की कच्चे तेल की जरूरत भी बड़ी चुनौती है। देश अपनी कुल कच्चे तेल की खपत का 85 प्रतिशत से अधिक हिस्सा आयात करता है। आपूर्ति में किसी बड़े वैश्विक व्यवधान की स्थिति में रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार यानी SPR महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के अनुसार 23 मार्च 2026 तक रणनीतिक भंडार में करीब 3.372 मिलियन मीट्रिक टन कच्चा तेल था। भारत की मौजूदा SPR क्षमता लगभग 9.5 दिनों की जरूरत के बराबर बताई जाती है। हालांकि तेल कंपनियों के व्यावसायिक स्टॉक को शामिल करने पर देश की कुल उपलब्ध भंडारण क्षमता इससे काफी अधिक हो जाती है।

90 दिन के मानक से अभी दूर भारत

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से रणनीतिक तेल भंडार का महत्व काफी अधिक है। IEA सदस्य देशों के लिए कम से कम 90 दिनों के शुद्ध तेल आयात के बराबर आपातकालीन भंडार रखने का मानक महत्वपूर्ण माना जाता है। भारत की मौजूदा रणनीतिक भंडारण क्षमता इस स्तर से काफी नीचे है। सरकार ने SPR के दूसरे चरण में अतिरिक्त भंडारण क्षमता विकसित करने की योजना बनाई है। चंडीखोल और पादुर में प्रस्तावित परियोजनाओं से क्षमता बढ़ाने की योजना है। हालांकि भूमि, लागत और प्रक्रिया संबंधी देरी के कारण परियोजनाओं की गति प्रभावित हुई है। नए संभावित स्थलों में बीना और बीकानेर भी शामिल हैं।

LPG में भी बदली आयात रणनीति

ऊर्जा सुरक्षा की चुनौती केवल LNG और कच्चे तेल तक सीमित नहीं है। LPG के आयात स्रोतों में भी बड़ा बदलाव देखने को मिला है। पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी के अनुसार भारत के LPG आयात में अमेरिका की हिस्सेदारी काफी बढ़ी है। पश्चिम एशिया में तनाव और समुद्री मार्गों से जुड़े जोखिमों के बीच भारत ने वैकल्पिक स्रोतों से LPG खरीद बढ़ाई है। इससे तत्काल आपूर्ति बनाए रखने में मदद मिल सकती है, लेकिन किसी एक क्षेत्र या देश पर अत्यधिक निर्भरता लंबे समय में जोखिम पैदा कर सकती है। इसलिए ऊर्जा आयात के साथ-साथ घरेलू भंडारण और आपूर्ति नेटवर्क को मजबूत करना भी जरूरी है।

क्या भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर्याप्त मजबूत है?

मौजूदा परिस्थितियां बताती हैं कि भारत ने ऊर्जा आपूर्ति के स्रोतों में विविधता लाने की दिशा में कदम जरूर उठाए हैं, लेकिन भंडारण क्षमता अब भी बड़ी चुनौती है। LNG के लिए पर्याप्त रणनीतिक भंडारण व्यवस्था का अभाव और कच्चे तेल के आयात पर भारी निर्भरता किसी बड़े वैश्विक संकट में जोखिम बढ़ा सकती है। अमेरिका, ओमान, अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया जैसे नए स्रोत तत्काल विकल्प उपलब्ध करा सकते हैं, लेकिन ये स्थायी समाधान नहीं हैं। भारत को दीर्घकाल में रणनीतिक तेल भंडार बढ़ाने, LNG स्टोरेज विकसित करने और आयात स्रोतों में संतुलन कायम करने पर जोर देना होगा। यही मजबूत ऊर्जा सुरक्षा की बुनियाद होगी।

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