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196 साल पुरानी परंपरा का भव्य उत्सव: अलवर में निकली भगवान जगन्नाथ की ऐतिहासिक रथयात्रा, ‘इंद्र विमान’ बना आकर्षण का केंद्र

आस्था, परंपरा और भव्यता का संगम – अलवर की जगन्नाथ रथयात्रा

अलवर शहर, जिसे अरावली की गोद में बसा सांस्कृतिक और आध्यात्मिक धरोहरों का नगर कहा जाता है, एक बार फिर भगवान जगन्नाथ की भक्ति में सराबोर नजर आया। यहां आयोजित होने वाला जगन्नाथ महोत्सव न सिर्फ एक धार्मिक आयोजन है, बल्कि 196 वर्षों से चली आ रही एक जीवंत परंपरा है, जो आज भी उतनी ही श्रद्धा और भव्यता के साथ निभाई जा रही है।

ऐतिहासिक विरासत – 196 वर्षों से जीवित परंपरा

इस भव्य रथयात्रा की शुरुआत लगभग 196 वर्ष पूर्व अलवर रियासत के समय हुई थी। पुराने कटले में स्थित करीब 269 वर्ष पुराने भगवान जगन्नाथ मंदिर से हर वर्ष आषाढ़ शुक्ल नवमी से त्रयोदशी तक यह महोत्सव आयोजित होता है। यह मेला अलवर के सबसे पुराने और प्रमुख आयोजनों में शामिल है, जहां लोक संस्कृति, परंपराएं और धार्मिक आस्था एक साथ दिखाई देती हैं।

‘इंद्र विमान’ – अलवर की अनूठी पहचान

देशभर में होने वाली रथयात्राओं से अलग, अलवर की रथयात्रा की सबसे खास पहचान है ‘इंद्र विमान’। यह विशाल रथ अलवर के तत्कालीन राजघराने द्वारा मंदिर को भेंट किया गया था।
करीब 15 फीट चौड़ा और 25 फीट लंबा यह रथ छह बड़े पहियों पर चलता है और इसकी ऊंचाई इतनी अधिक है कि रास्ते में पेड़ों की शाखाएं और बिजली के तार हटाने पड़ते हैं। पहले इस रथ को हाथियों द्वारा खींचा जाता था, लेकिन अब इसे ट्रैक्टर की सहायता से खींचा जाता है।

2026 का आयोजन – भक्ति से गूंज उठा पूरा शहर

वर्ष 2026 में यह महोत्सव 21 जुलाई से 27 जुलाई तक आयोजित किया जा रहा है। यह महोत्सव हर वर्ष भगवान जगन्नाथ और जानकी मैया के विवाह का प्रतीकात्मक आयोजन होता है , यहां मंदिर में भगवान जगन्नाथ की शादी से पूर्व हल्दी , कंगन डोरे से लेकर गीत और भजन कर शादी का माहौल नजर आता है , भगवान जगन्नाथ की दूल्हे की रूप में तैयार होकर इंद्र विमान में सवार होकर रूप बास मंदिर पहुंचते है जहां उनके और जानकी मैया के विवाह की रस्में होती है ।

22 जुलाई की शाम 6 बजे सुभाष चौक से निकली रथयात्रा शहर के विभिन्न बाजारों से होती हुई रूपबास स्थित जानकी मैया मंदिर पहुंची

यह आयोजन ‘लक्खी मेला’ के रूप में प्रसिद्ध है। रथयात्रा के दौरान घोड़े, पट्टेबाज, झांकियां और सांस्कृतिक दल आकर्षण बढ़ाते हैं। रास्ते भर में आने वाले 50 से ज्यादा मंदिरों के आगे रथ रुकता है और वहां भगवान जगन्नाथ जी की आरती की जाती है।
मेले में मनोरंजन, धार्मिक अनुष्ठान और सामाजिक मेलजोल का अनोखा संगम देखने को मिलता है।

करीब 6 किलोमीटर लंबी इस यात्रा में हजारों श्रद्धालु शामिल हुए। शंख और घंटों की गूंज, भजन-कीर्तन और ढोल ताशे , विभिन्न धार्मिक झांकिया और इस्कॉन मंडली द्वारा नाचते गाते भजनों से पूरा शहर धार्मिक वातावरण में डूब गया।

रूपबास में होता है दिव्य विवाह उत्सव

रथयात्रा का अंतिम पड़ाव रूपबास होता है, यहां प्रशासनिक स्तर पर सुरक्षा की दृष्टि से सीसीटीवी कैमरे , पुलिस जाप्ता , सहायता केंद्र , एंबुलेंस , फायर ब्रिगेड सहित तमाम व्यवस्थाओं पर निगरानी रखी जाती है । रूपबास मंदिर में भगवान जगन्नाथ और जानकी मैया के विवाह की रस्में बड़े ही विधि-विधान से संपन्न होती हैं। वरमाला महोत्सव इस आयोजन का सबसे आकर्षक क्षण होता है, जिसे देखने के लिए लाखों श्रद्धालु एकत्रित होते हैं। रंगीन रोशनी और भक्ति के माहौल में यह दृश्य अत्यंत मनोहारी होता है। पांच दिन तक भरने वाले इस भव्य मेले देश के अलग अलग राज्यों से लाखों श्रद्धालु शामिल होते है । इस मेले में चारो तरफ लगे झूले , खाने पीने की दुकानें बच्चों के खिलौने की दुकानों सहित अलग अलग प्रदेशों के फेमस मिठाई की दुकान भी आकर्षण का केंद्र रहती है , रूपबास स्थित मंदिर में भगवान जगन्नाथ और माता जानकी की विवाह की रस्मो के बाद विदाई समारोह होता है , मेला स्थल रूपबास के आसपास के ग्रामीण और महिलाये माता जानकी को अपनी बेटी मानकर कन्यादान की रस्म पूरी कर बिदा किया जाता है

भक्ति की पराकाष्ठा – दंडौती यात्रा

भगवान के प्रति श्रद्धा का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि हजारों श्रद्धालु मंदिर से रूपबास तक दंडौती देते हुए पहुंचते हैं। हाथ में नारियल और पंखी लेकर भक्त अपनी मनोकामनाएं मांगते हैं और इस यात्रा को अपनी आस्था का प्रतीक मानते हैं।

लोक संस्कृति और मेले की रौनक

यह परंपरा का गौरवशाली निर्वाह
त्रयोदशी के दिन भगवान जगन्नाथ, जानकी मैया को ब्याह कर पुनः पुराने कटले स्थित मंदिर लौटते हैं। इस दिन भी श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ता है और पूरे शहर में उत्सव का माहौल बना रहता है।

अलवर की यह रथयात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था, संस्कृति और इतिहास का जीवंत उत्सव है — जो पीढ़ी दर पीढ़ी लोगों को जोड़ता चला आ रहा है।

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