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Gen Z के बाद अब Gen Alpha की आवाज, 5 राज्यों में सड़कों पर उतरे स्कूली बच्चे

नई दिल्ली: देश में युवाओं के आंदोलनों के बीच अब स्कूली बच्चों की आवाज भी कई राज्यों में सुनाई देने लगी है। उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में बच्चों ने स्कूलों की बुनियादी सुविधाओं को लेकर विरोध प्रदर्शन किए हैं। कहीं पंखे और बिजली की समस्या है तो कहीं पीने का पानी, शौचालय, शिक्षक, मिड-डे मील और स्कूल तक सड़क की मांग उठी है। कई जगह बच्चों ने कक्षाओं का बहिष्कार किया, पैदल मार्च निकाला और अधिकारियों के कार्यालय तक पहुंचे। हालांकि, कुछ स्थानों पर बच्चों को आंदोलन में आगे किए जाने के आरोप भी लगे हैं, लेकिन उनकी शिकायतों ने सरकारी स्कूलों की जमीनी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

क्लासरूम से निकलकर कलेक्टरेट तक पहुंचे बच्चे

पिछले कुछ दिनों में कई राज्यों से ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां स्कूली बच्चों ने अपनी समस्याओं को लेकर सीधे प्रशासन का दरवाजा खटखटाया। सामान्य तौर पर बच्चों की शिकायतें स्कूल प्रबंधन, शिक्षक या अभिभावकों तक सीमित रहती हैं, लेकिन इन घटनाओं में उन्होंने सामूहिक रूप से अपनी आवाज उठाई। बच्चों की प्रमुख मांगों में बेहतर शैक्षणिक माहौल, पर्याप्त शिक्षक, बिजली, पंखे, स्वच्छ पानी, शौचालय, भोजन और स्कूल तक सड़क जैसी सुविधाएं शामिल हैं। इन प्रदर्शनों ने यह सवाल खड़ा किया है कि सरकारी स्कूलों में बच्चों को पढ़ाई के लिए जरूरी बुनियादी सुविधाएं आखिर कब तक उपलब्ध होंगी।

हमीरपुर में बच्चों ने निकाली 5 किलोमीटर तिरंगा यात्रा

उत्तर प्रदेश के हमीरपुर में 11 अगस्त को चंदू पुर ग्राम पंचायत के बच्चों और ग्रामीणों ने स्कूल तक पक्की सड़क की मांग को लेकर तिरंगा यात्रा निकाली। करीब पांच किलोमीटर पैदल मार्च के बाद प्रदर्शनकारी कलेक्टरेट पहुंचे। बच्चों की शिकायत थी कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी उनके स्कूल तक पक्की सड़क नहीं बन सकी है। बारिश के मौसम में रास्ते की स्थिति और खराब हो जाती है, जिससे विद्यार्थियों को स्कूल पहुंचने में परेशानी होती है। बच्चों के इस प्रदर्शन ने स्थानीय प्रशासन का ध्यान लंबे समय से चली आ रही सड़क की समस्या की ओर खींचा।

फतेहपुर में 1500 छात्रों ने किया कक्षाओं का बहिष्कार

उत्तर प्रदेश के फतेहपुर में सर्वोदय इंटर कॉलेज के करीब 1,500 छात्रों के कक्षाओं के बहिष्कार का मामला सामने आया। छात्रों ने स्कूल में खराब पंखों, बिजली की वायरिंग और मिड-डे मील से जुड़ी समस्याओं पर नाराजगी जताई। विद्यार्थियों का कहना था कि गर्मी के बीच कक्षाओं में पर्याप्त पंखे और बिजली की व्यवस्था नहीं होने से पढ़ाई प्रभावित होती है। वहीं भोजन की गुणवत्ता को लेकर भी शिकायतें सामने आईं। छात्रों के सामूहिक विरोध के बाद स्कूल प्रशासन को उनकी मांगों पर ध्यान देना पड़ा। इस घटना ने स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल उठाए।

गया में बच्चे 4 किलोमीटर पैदल पहुंच गए SDM कार्यालय

बिहार के गया में सिमुआरा मिडिल स्कूल के करीब 40 से 50 बच्चे अपनी शिकायत लेकर प्रशासनिक अधिकारियों के पास पहुंचे। बताया गया कि बच्चों ने खराब भोजन, बंद हैंडपंप और टूटे बेंच जैसी समस्याओं को लेकर करीब चार किलोमीटर पैदल चलकर एसडीएम कार्यालय का रुख किया। बच्चों के इस कदम से साफ है कि स्कूल में छोटी दिखने वाली बुनियादी सुविधाओं की कमी उनके रोजमर्रा के अध्ययन और स्वास्थ्य पर असर डाल रही है। प्रशासनिक अधिकारियों के सामने बच्चों की मौजूदगी ने स्थानीय स्तर पर स्कूल व्यवस्था को लेकर चर्चा तेज कर दी।

राजस्थान में शिक्षक की कमी को लेकर प्रदर्शन

राजस्थान के बाड़मेर और जालोर से भी सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी को लेकर विद्यार्थियों के प्रदर्शन की खबर सामने आई है। छात्रों ने स्कूलों के मुख्य द्वार पर ताले लगाकर अपनी नाराजगी जाहिर की। विद्यार्थियों की मांग थी कि पर्याप्त संख्या में शिक्षक उपलब्ध कराए जाएं, ताकि पढ़ाई नियमित रूप से हो सके। प्रशासन की ओर से शिक्षकों की नियुक्ति का आश्वासन दिए जाने के बाद प्रदर्शन समाप्त होने की बात सामने आई। राजस्थान में ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में शिक्षकों की उपलब्धता लंबे समय से शिक्षा व्यवस्था से जुड़ा अहम मुद्दा रही है।

मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में भी उठी बच्चों की आवाज

मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा और महाराष्ट्र के कुछ आवासीय स्कूलों में भी विद्यार्थियों ने भोजन और बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी शिकायतों को लेकर विरोध जताया। बच्चों की ओर से भोजन में कथित तौर पर कीड़े मिलने और शौचालय जैसी सुविधाओं की खराब स्थिति पर सवाल उठाए गए। आवासीय स्कूलों में रहने वाले विद्यार्थियों के लिए भोजन, स्वच्छता और सुरक्षित वातावरण विशेष रूप से महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में इन शिकायतों को केवल विरोध प्रदर्शन के रूप में देखने के बजाय संबंधित विभागों द्वारा व्यवस्थाओं की जांच और सुधार की जरूरत भी सामने आती है।

क्या Gen Z से प्रभावित है Gen Alpha?

इन प्रदर्शनों को कुछ लोग युवा पीढ़ी के बदलते विरोध के तौर-तरीकों से जोड़कर देख रहे हैं। सोशल मीडिया के दौर में बच्चे और किशोर भी अपनी समस्याओं को सार्वजनिक मंचों तक पहुंचाने के तरीकों से परिचित हो रहे हैं। हालांकि, यह कहना जल्दबाजी होगी कि देशभर में सामने आए सभी प्रदर्शनों के पीछे एक ही संगठन या रणनीति है। अलग-अलग राज्यों में बच्चों की स्थानीय समस्याएं अलग हैं। फिर भी एक समान बात दिखाई देती है—बच्चे अब अपनी बुनियादी जरूरतों को लेकर चुप रहने के बजाय सामूहिक रूप से आवाज उठाने लगे हैं।

सोशल मीडिया बना बच्चों की आवाज का नया माध्यम

प्रदर्शन के वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से प्रसारित होने के कारण स्थानीय समस्याएं कुछ ही समय में व्यापक चर्चा का विषय बन जाती हैं। बच्चों के पैदल मार्च, नारेबाजी और अधिकारियों से बातचीत के वीडियो प्रशासन पर कार्रवाई का दबाव बढ़ा सकते हैं। हालांकि, सोशल मीडिया की इस ताकत के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी है। बच्चों की पहचान और सुरक्षा का ध्यान रखना जरूरी है। उनकी शिकायतों को राजनीतिक रंग देने के बजाय पहले यह देखना महत्वपूर्ण है कि स्कूलों में बताई गई समस्याएं वास्तविक हैं या नहीं और उनके समाधान के लिए क्या कदम उठाए गए हैं।

बच्चों को मोहरा बनाने के आरोप भी सामने आए

कुछ प्रशासनिक अधिकारियों ने प्रदर्शन के पीछे वयस्कों या अन्य समूहों की भूमिका होने की आशंका जताई है। हमीरपुर में भी अधिकारियों की ओर से बच्चों को कथित तौर पर मोहरा बनाए जाने की बात कही गई। ऐसे आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि के बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा। लेकिन यदि बच्चे स्वयं स्कूल की सुविधाओं को लेकर शिकायत कर रहे हैं, तो उनकी समस्याओं की जांच करना प्रशासन की जिम्मेदारी है। बच्चों की शिक्षा और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को राजनीति से अलग रखते हुए समयबद्ध तरीके से समाधान करना ही सबसे जरूरी कदम माना जाएगा।

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