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पिता के संघर्ष ने बदली बेटों की किस्मत, एक बना तहसीलदार तो दूसरा पुलिस सब इंस्पेक्टर

राजस्थान के प्रतापगढ़ जिले से दो ऐसी प्रेरणादायक कहानियां सामने आई हैं, जो साबित करती हैं कि कठिन परिस्थितियां भी मजबूत इरादों के आगे हार मान लेती हैं। आर्थिक तंगी, मजदूरी और संघर्षों के बीच दो पिता ने अपने बेटों की पढ़ाई नहीं रुकने दी। एक ने खेत गिरवी रख दिए तो दूसरे ने मजदूरी कर फीस जुटाई। आज उन्हीं बेटों ने सरकारी सेवा में बड़ा मुकाम हासिल कर परिवार और पूरे क्षेत्र का नाम रोशन किया है।

खेत गिरवी रखकर बेटे को पढ़ाया

दलोट तहसील क्षेत्र के ग्राम उंठेल निवासी अर्जुन मीणा ने अपने बेटे देवीलाल मीणा की शिक्षा के लिए हर संभव संघर्ष किया। परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर थी और घर का खर्च मजदूरी तथा खेती से चलता था। पढ़ाई का खर्च उठाना आसान नहीं था, लेकिन अर्जुन मीणा ने बेटे के भविष्य के सामने हर कठिनाई को छोटा मान लिया। जरूरत पड़ने पर उन्होंने खेत तक गिरवी रख दिए, लेकिन बेटे की शिक्षा बाधित नहीं होने दी।

संघर्षों के बीच हासिल की सफलता

देवीलाल मीणा ने भी पिता की मेहनत को व्यर्थ नहीं जाने दिया। उन्होंने लगातार पढ़ाई जारी रखी और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी की। पहले उनका चयन कांस्टेबल पद पर हुआ, फिर शिक्षक और ग्राम विकास अधिकारी जैसी सेवाओं में भी सफलता मिली। इसके बाद उन्होंने पुलिस सब इंस्पेक्टर बनने का लक्ष्य तय किया और वर्ष 2021 में यह सपना भी पूरा कर लिया। वर्तमान में वे उदयपुर जिले में पुलिस विभाग में सेवाएं दे रहे हैं।

युवाओं के लिए बने प्रेरणा स्रोत

देवीलाल मीणा केवल अपने परिवार तक सीमित नहीं हैं, बल्कि गांव और आसपास के युवाओं को भी शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए प्रेरित करते हैं। वे नशामुक्ति, सामाजिक जिम्मेदारियों और पर्यावरण संरक्षण को लेकर भी जागरूकता अभियान चलाते हैं। उनका मानना है कि सफलता केवल नौकरी पाने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि समाज के प्रति योगदान भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

मजदूरी कर बेटे को बनाया अधिकारी

प्रतापगढ़ जिले के बरखेड़ी क्षेत्र के बड़वास कलां गांव निवासी कचरूलाल निनामा की कहानी भी किसी प्रेरणा से कम नहीं है। कचरूलाल आर्थिक अभावों के कारण स्वयं दसवीं से आगे पढ़ाई नहीं कर सके, लेकिन उन्होंने यह ठान लिया कि उनका बेटा शिक्षा के माध्यम से बड़ा मुकाम हासिल करेगा। उन्होंने खेतों में मजदूरी की, मेहनत-मजदूरी से घर चलाया और बेटे की पढ़ाई के लिए हर संभव प्रयास किया।

‘बेटा तू पढ़ जा, मैं मजदूरी कर लूंगा’

कचरूलाल निनामा बताते हैं कि जब उनका बेटा नारायणलाल आठवीं कक्षा में पढ़ रहा था, तब शिक्षकों ने उसकी प्रतिभा की सराहना की। उसी समय उन्होंने निर्णय लिया कि चाहे कितनी भी मुश्किलें आएं, बेटे की पढ़ाई नहीं रुकने देंगे। उन्होंने उसे प्रतापगढ़ के प्रतिभावान छात्रावास में प्रवेश दिलाया और लगातार आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। कई बार आर्थिक संकट आया, लेकिन उन्होंने कभी बेटे के सपनों को टूटने नहीं दिया।

बेटा बना तहसीलदार

पिता के संघर्ष और बेटे की मेहनत का परिणाम यह रहा कि नारायणलाल निनामा ने प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता हासिल की और राजस्थान तहसीलदार सेवा में चयनित हो गए। आज वे प्रशासनिक सेवा में अपनी जिम्मेदारियां निभा रहे हैं। नारायणलाल का कहना है कि लोग उन्हें अधिकारी के रूप में सम्मान देते हैं, लेकिन उनके लिए सबसे बड़े अधिकारी उनके पिता हैं, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी उनका साथ नहीं छोड़ा।

गांव के लिए मिसाल बने दोनों परिवार

देवीलाल मीणा और नारायणलाल निनामा की सफलता ने पूरे क्षेत्र के युवाओं को प्रेरित किया है। ग्रामीणों का कहना है कि इन दोनों कहानियों ने साबित कर दिया है कि मेहनत, शिक्षा और परिवार का सहयोग किसी भी व्यक्ति की जिंदगी बदल सकता है। आज कई छात्र इन्हीं की तरह सरकारी सेवाओं में जाने का सपना देख रहे हैं और उनके माता-पिता भी बच्चों की शिक्षा को प्राथमिकता दे रहे हैं।

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