China India: तिब्बत पहुंचे भारत के नए राजदूत, क्या बदल रहे हैं दोनों पड़ोसियों के रिश्ते?
भारत और चीन के बीच लंबे समय से जारी सीमा विवाद और कूटनीतिक तनाव के बीच एक नया संकेत सामने आया है। चीन में भारत के नए राजदूत विक्रम दोराईस्वामी ने पद संभालने के महज एक महीने के भीतर तिब्बत का दौरा किया है। इस यात्रा को केवल कैलाश मानसरोवर यात्रा की तैयारियों से जोड़कर नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे दोनों देशों के बीच धीरे-धीरे सामान्य होते रिश्तों के संकेत के तौर पर भी माना जा रहा है।
कैलाश मानसरोवर यात्रा की तैयारियों का लिया जायजा
भारतीय दूतावास के अनुसार, विक्रम दोराईस्वामी का तिब्बत दौरा मुख्य रूप से कैलाश मानसरोवर यात्रा से जुड़ी व्यवस्थाओं का आकलन करने के लिए था। उन्होंने तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र की राजधानी ल्हासा का दौरा कर तीर्थयात्रियों के लिए उपलब्ध सुविधाओं और प्रबंधन की समीक्षा की। हाल के वर्षों में सीमा तनाव के कारण ऐसी यात्राएं सीमित हो गई थीं, लेकिन अब दोनों देशों के बीच संवाद बढ़ने के साथ धार्मिक यात्राओं को फिर से गति मिलती दिखाई दे रही है।
गलवान संघर्ष के बाद पहली बार दिख रहे सकारात्मक संकेत
साल 2020 में गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प के बाद भारत और चीन के रिश्ते गंभीर तनाव के दौर से गुजरे थे। इसके बाद दोनों देशों ने कई स्तरों पर बातचीत जारी रखी और धीरे-धीरे संबंधों को सामान्य बनाने की कोशिशें शुरू हुईं। पिछले वर्ष तिब्बत के रास्ते को फिर से खोलने का फैसला भी इसी दिशा में एक अहम कदम माना गया था। विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा यात्रा दोनों देशों के बीच बढ़ते भरोसे का संकेत हो सकती है।
नेपाल के दावे के कारण भी चर्चा में है यात्रा
भारत और चीन ने इस वर्ष लिपुलेख दर्रे के जरिए कैलाश मानसरोवर यात्रा को फिर से शुरू करने का निर्णय लिया है। हालांकि, इस क्षेत्र पर नेपाल भी अपना दावा करता है और उसने इस फैसले पर आपत्ति दर्ज कराई थी। ऐसे में भारतीय राजदूत का तिब्बत दौरा क्षेत्रीय भू-राजनीति के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह घटनाक्रम दक्षिण एशिया में बदलते कूटनीतिक समीकरणों को भी दर्शाता है।
सीमा विवाद के बावजूद जारी है संवाद
भारत और चीन के बीच करीब 3,200 किलोमीटर लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर अभी भी कई संवेदनशील मुद्दे मौजूद हैं। हाल ही में दोनों देशों ने सीमा मामलों पर बातचीत के तहत एक और दौर की वार्ता की थी, जिसमें सीमावर्ती क्षेत्रों में शांति और स्थिरता बनाए रखने पर जोर दिया गया। हालांकि अरुणाचल प्रदेश को लेकर चीन के दावे और नाम बदलने जैसे मुद्दे अब भी मतभेद का कारण बने हुए हैं, लेकिन दोनों पक्ष बातचीत के जरिए समाधान की दिशा में आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं।