अमेरिका-ईरान समझौते को चीन में क्यों माना जा रहा है अपनी रणनीतिक जीत?
अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौता ज्ञापन का चीन ने आधिकारिक तौर पर स्वागत किया है, लेकिन चीनी विशेषज्ञ इसे स्थायी शांति की गारंटी मानने से बचने की सलाह दे रहे हैं। उनका मानना है कि कई मूलभूत विवाद अब भी कायम हैं। साथ ही कुछ चीनी विश्लेषक इस घटनाक्रम को चीन की कूटनीतिक रणनीति और ऊर्जा सुरक्षा मॉडल की मजबूती के रूप में भी देख रहे हैं।
चीनी विशेषज्ञों ने शांति को लेकर बरती सतर्कता
अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौते के बाद जहां कई देशों ने इसे सकारात्मक कदम बताया, वहीं चीन के कई विशेषज्ञों ने इसे स्थायी समाधान मानने से इनकार किया है। उनका कहना है कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय सुरक्षा और मध्य पूर्व में जारी संघर्षों जैसे अहम मुद्दों पर दोनों देशों के बीच अब भी बड़े मतभेद मौजूद हैं। विशेषज्ञों के अनुसार केवल एक समझौता ज्ञापन से दशकों पुराने विवाद समाप्त नहीं हो सकते और आगे की बातचीत में कई कठिन चुनौतियां सामने आ सकती हैं।
60 दिनों की समयसीमा पर उठे सवाल
कुछ चीनी टिप्पणीकारों का मानना है कि अमेरिका और ईरान के बीच आगे की बातचीत के लिए तय की गई 60 दिनों की समयसीमा बेहद कम है। उन्होंने 2015 के परमाणु समझौते (JCPOA) का उदाहरण देते हुए कहा कि उस समझौते तक पहुंचने में लगभग 20 महीने की लंबी वार्ता लगी थी। विशेषज्ञों को आशंका है कि मौजूदा प्रक्रिया भी लंबी खिंच सकती है और दोनों देश ऐसी स्थिति में पहुंच सकते हैं, जहां बातचीत जारी रहे लेकिन कोई ठोस परिणाम सामने न आए।
गहरे विवाद अब भी बने हुए हैं
विश्लेषकों के मुताबिक मौजूदा समझौता ईरान के परमाणु कार्यक्रम, अमेरिकी प्रतिबंधों, क्षेत्रीय संघर्षों और दोनों देशों के बीच लंबे समय से मौजूद अविश्वास जैसे मूलभूत मुद्दों का समाधान नहीं करता। उनका कहना है कि यह केवल तनाव को अस्थायी रूप से कम करने का माध्यम बन सकता है। साथ ही ईरान को युद्ध के बाद घरेलू स्तर पर राजनीतिक और सामाजिक संतुलन बनाए रखने जैसी चुनौतियों का भी सामना करना पड़ सकता है।
चीन अपने कूटनीतिक मॉडल को मान रहा मजबूत
चीनी विशेषज्ञों का तर्क है कि इस संकट ने सैन्य शक्ति की तुलना में कूटनीतिक प्रयासों की उपयोगिता को अधिक प्रभावी साबित किया है। उनका मानना है कि चीन का “शांतिपूर्ण विकास” और संवाद आधारित दृष्टिकोण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिक स्वीकार्यता हासिल कर रहा है। चीन क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए व्यापक सहयोग और साझा ढांचे की वकालत करता रहा है, जिसे कुछ विश्लेषक इस घटनाक्रम के बाद और अधिक प्रासंगिक मान रहे हैं।
ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक मजबूती को बताया बड़ी ताकत
चीन के कुछ विश्लेषकों ने इस मौके पर देश की ऊर्जा सुरक्षा रणनीति की भी सराहना की है। उनका कहना है कि विविध स्रोतों से तेल आयात, बड़े रणनीतिक भंडार, इलेक्ट्रिक वाहनों का विस्तार और नई ऊर्जा तकनीकों में निवेश ने चीन को वैश्विक संकटों का सामना करने में अधिक सक्षम बनाया है। इसके अलावा विशाल बिजली ग्रिड और मजबूत आपूर्ति श्रृंखला को भी चीन की आर्थिक स्थिरता का प्रमुख आधार माना जा रहा है।
ताइवान मुद्दे पर भी दिख रहा असर
कुछ राष्ट्रवादी चीनी विश्लेषकों का दावा है कि मध्य पूर्व के घटनाक्रम ने अमेरिका के संसाधनों और रणनीतिक प्राथमिकताओं पर दबाव बढ़ाया है। उनके अनुसार इससे ताइवान को लेकर अमेरिका की सैन्य क्षमता और प्रभाव पर भी बहस तेज हो सकती है। हालांकि यह दृष्टिकोण मुख्य रूप से चीनी विश्लेषकों की राय है और इस पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-अलग मत मौजूद हैं।