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BRICS Summit 2026: भारत की कूटनीतिक पहल, रिश्तों से ऊपर नहीं होगी प्रतिद्वंद्विता; ‘मानवता प्रथम’ पर जोर

भारत में होने वाले 18वें BRICS शिखर सम्मेलन में वैश्विक सहयोग और संवाद पर जोर रहने की उम्मीद है। भारत की अध्यक्षता में होने वाले सम्मेलन का फोकस प्रतिद्वंद्विता के बजाय रिश्तों को मजबूत करने और बयानों के बजाय ठोस परिणामों पर रहेगा। भारतीय अधिकारियों के मुताबिक, लोगों के हितों को राजनीति से ऊपर रखना भारत की प्राथमिकता होगी। पश्चिम एशिया में ईरान और UAE के बीच तनाव के बीच यह सम्मेलन और अहम हो गया है। भारत BRICS के मंच से संवाद की राह बनाए रखने के साथ ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूत करने की कोशिश करेगा।

भारत की अध्यक्षता में ‘मानवता प्रथम’ का संदेश

भारत BRICS के मौजूदा मंच को केवल राजनीतिक चर्चा तक सीमित रखने के बजाय विकास और जनहित से जोड़ना चाहता है। भारतीय पक्ष के अनुसार, अध्यक्षता के दौरान ‘मानवता प्रथम’ की भावना को प्राथमिकता दी जाएगी।

भारत का जोर ऐसे मुद्दों पर रहेगा, जिनका सीधा असर आम लोगों और विकासशील देशों पर पड़ता है। इसके अलावा बहुपक्षीय सहयोग और वैश्विक संस्थाओं में सुधार जैसे विषय भी एजेंडे में प्रमुख रह सकते हैं।

ईरान-UAE तनाव के बीच भारत की बड़ी चुनौती

BRICS के मंच पर इस बार पश्चिम एशिया की परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण रहेंगी। समूह के सदस्य ईरान और संयुक्त अरब अमीरात क्षेत्रीय तनाव के बीच अलग-अलग परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं।

ऐसे में भारत के सामने दोनों देशों के बीच संवाद और सहयोग की गुंजाइश बनाए रखने की चुनौती होगी। नई दिल्ली की रणनीतिक स्वायत्तता को देखते हुए भारत अलग-अलग पक्षों के साथ संवाद जारी रखने पर जोर दे सकता है।

नौ देशों के नेता वैश्विक मुद्दों पर करेंगे चर्चा

BRICS के सदस्य देशों भारत, ब्राजील, रूस, चीन, दक्षिण अफ्रीका, ईरान, मिस्र, इथियोपिया और UAE के नेता शिखर सम्मेलन में शामिल होंगे। पहले दिन वैश्विक शासन व्यवस्था और बहुपक्षीय सहयोग से जुड़े मुद्दों पर चर्चा प्रस्तावित है।

सऊदी अरब को जनवरी 2024 से BRICS का पूर्ण सदस्य माना गया है। हालांकि, दिए गए विवरण के अनुसार उसने अभी तक सदस्य देश के तौर पर किसी शिखर सम्मेलन में हिस्सा नहीं लिया है।

ग्लोबल साउथ की आवाज मजबूत करने की तैयारी

भारत BRICS के जरिए विकासशील देशों से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता देने की कोशिश करेगा। ग्लोबल साउथ के देशों के लिए वित्त, विकास, तकनीक और वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में अधिक प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण हैं।

भारतीय पक्ष के मुताबिक, BRICS वैश्विक शासन व्यवस्था में सुधार और बहुपक्षीय व्यवस्था को मजबूत करने की प्रतिबद्धता को आगे बढ़ाएगा। भारत का यह प्रयास उसके व्यापक कूटनीतिक दृष्टिकोण से भी जुड़ा है।

BRICS के साथ G20, SCO और Quad में भी सक्रिय भारत

भारत BRICS को बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण मंच मानता है। हालांकि, नई दिल्ली की कूटनीति केवल BRICS तक सीमित नहीं है।

भारत G20, शंघाई सहयोग संगठन और क्वाड जैसे अलग-अलग मंचों पर भी सक्रिय भूमिका निभाता है। इससे भारत को अलग-अलग देशों के साथ अपने रणनीतिक और आर्थिक हितों के आधार पर सहयोग करने का अवसर मिलता है।

पश्चिम एशिया संकट से तेल की कीमतों पर दबाव

पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष का असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े घटनाक्रमों ने ऊर्जा आपूर्ति और कच्चे तेल की कीमतों को लेकर चिंता बढ़ाई है।

भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देश के लिए तेल की कीमतों में बढ़ोतरी आर्थिक दबाव बढ़ा सकती है। ऐसे में BRICS सम्मेलन में पश्चिम एशिया की स्थिति और उसके वैश्विक आर्थिक प्रभाव पर भी चर्चा महत्वपूर्ण हो सकती है।

संयुक्त घोषणा पर भी बनी नजर

BRICS देशों के बीच अलग-अलग मुद्दों पर मतभेद होने के बावजूद सम्मेलन के अंत में साझा रुख सामने लाने की कोशिश होगी। रूस के राष्ट्रपति कार्यालय के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने भी ईरान और UAE के मतभेदों का संयुक्त घोषणा की भाषा पर असर पड़ने की बात कही थी।

हालांकि, पेस्कोव ने उम्मीद जताई थी कि दोनों देशों के लिए स्वीकार्य भाषा पर सहमति बनाई जा सकती है। ऐसे में भारत के लिए सम्मेलन के दौरान सभी पक्षों को साथ लेकर चलना महत्वपूर्ण होगा।

मोदी-पुतिन और शी जिनपिंग की मुलाकात पर नजर

BRICS सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ संभावित मुलाकातों पर भी नजर रहेगी।

शी जिनपिंग की भारत यात्रा को भी कूटनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। दोनों देशों के बीच संबंधों और वैश्विक मुद्दों को देखते हुए मोदी-शी बैठक का संदेश अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण हो सकता है।

BRICS के जरिए शांति और सहयोग का संदेश

भारत की कोशिश BRICS को ऐसे मंच के रूप में पेश करने की है, जहां अलग-अलग मत रखने वाले देश भी साझा हितों पर सहयोग कर सकें। पश्चिम एशिया तनाव के बीच यह भूमिका और चुनौतीपूर्ण हो जाती है।

भारत का जोर प्रतिद्वंद्विता के बजाय संवाद, राजनीतिक बयानबाजी के बजाय ठोस परिणाम और राजनीति से ऊपर लोगों के हितों पर रखने की रणनीति पर है। आने वाले सम्मेलन में इसी दृष्टिकोण की वास्तविक परीक्षा होगी।

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