BRICS: विस्तार के बाद अब सामूहिक सामर्थ्य साबित करने की परीक्षा
ब्रिक्स का विस्तार उसकी वैश्विक पहुंच को लगातार बढ़ा रहा है। हालांकि, बढ़ती सदस्य संख्या के साथ संगठन के सामने सामूहिक निर्णय और कार्रवाई की चुनौती भी बढ़ी है। 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में होने वाला 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन भारत की अध्यक्षता की अहम परीक्षा माना जा रहा है। ब्रिक्स के सामने अब सवाल केवल विस्तार का नहीं है। चुनौती यह है कि विविध हितों वाले देशों को साझा उद्देश्यों और प्रभावी संस्थागत तंत्र से कैसे जोड़ा जाए।
साझेदार व्यवस्था से बढ़ा दायरा
अक्टूबर 2024 के कजान शिखर सम्मेलन में साझेदार-देश व्यवस्था स्थापित की गई थी। इस व्यवस्था ने पूर्ण सदस्यता और व्यापक सहभागिता के बीच एक नया रास्ता बनाया। वर्ष 2025 में दस देशों को साझेदार का दर्जा मिला। इसके अलावा क्यूबा, थाईलैंड, मलेशिया और नाइजीरिया ने पूर्ण सदस्यता की इच्छा जताई है। तुर्किये और अजरबैजान ने भी ब्रिक्स से जुड़ने में रुचि दिखाई है। इससे संगठन के संभावित विस्तार की दिशा स्पष्ट होती है। हालांकि, नए सदस्यों को जोड़ने के साथ संस्थागत क्षमता का विस्तार भी जरूरी होगा।
विस्तार और संस्थागत क्षमता में संतुलन जरूरी
रूस और चीन अपेक्षाकृत तेज विस्तार के पक्ष में रहे हैं। वहीं भारत और ब्राजील ने विस्तार को लेकर अधिक सावधानी बरतने की बात कही है। यह केवल विस्तार बनाम संकुचन का सवाल नहीं है। नए सदस्यों की भागीदारी संगठन की निर्णय क्षमता और साझा जिम्मेदारियों के अनुरूप होनी चाहिए। ब्रिक्स की सदस्य संख्या बढ़ने से उसकी प्रतिनिधिक क्षमता मजबूत हो सकती है। लेकिन, यदि निर्णय प्रक्रिया कमजोर होती है तो व्यापकता प्रभाव में नहीं बदल पाएगी। इसलिए विस्तार के साथ संस्थागत तैयारी भी जरूरी है।
लचीली सहयोग व्यवस्था बन सकती है रास्ता
ब्रिक्स के पास पहले से कई संस्थागत तंत्र मौजूद हैं। इनमें शिखर सम्मेलन, मंत्रिस्तरीय संवाद, शेरपा प्रक्रिया और विषयगत कार्यसमूह शामिल हैं। इसके अलावा व्यापारिक और शैक्षणिक नेटवर्क भी सक्रिय हैं। न्यू डेवलपमेंट बैंक तथा आकस्मिक आरक्षित व्यवस्था इसकी संस्थागत आधारभूमि को मजबूत करते हैं। इन्हें अधिक लचीली सहयोग व्यवस्था में बदला जा सकता है। इसमें सभी सदस्य हर मुद्दे पर समान गति से आगे बढ़ने के लिए बाध्य न हों। इसके बावजूद साझा हितों वाले क्षेत्रों में ठोस कार्रवाई की जा सके।
वैश्विक दक्षिण की आवाज मजबूत करने की चुनौती
ब्रिक्स की भूमिका को किसी पश्चिम-विरोधी शक्ति-ध्रुव तक सीमित करना उसके दायरे को कम कर सकता है। संगठन वैश्विक दक्षिण की आकांक्षाओं को प्रभावी मंच दे सकता है। विश्व व्यापार संगठन के पुनरोद्धार, वैश्विक आर्थिक संस्थानों में उभरती अर्थव्यवस्थाओं की भागीदारी और विकास-वित्त के विस्तार पर काम किया जा सकता है। इससे मौजूदा वैश्विक व्यवस्था को बदलने के बजाय उसे अधिक संतुलित बनाने में मदद मिल सकती है। वैश्विक दक्षिण को केवल प्रतिनिधित्व नहीं, बल्कि आर्थिक और संस्थागत सहयोग के मजबूत सेतु की जरूरत है।
सदस्य देशों के मतभेद भी बड़ी चुनौती
ब्रिक्स के भीतर सदस्य देशों की प्राथमिकताएं एक जैसी नहीं हैं। भारत और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा, रूस और पश्चिम के बीच तनाव तथा अलग-अलग आर्थिक हित संगठन की जटिलता बढ़ाते हैं। इसके बावजूद द्विपक्षीय मतभेदों को बहुपक्षीय गतिरोध में बदलने से रोकना जरूरी है। यही ब्रिक्स की राजनीतिक परिपक्वता की कसौटी होगी। संगठन की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सदस्य देश मतभेदों के बावजूद किन क्षेत्रों में साझा हितों पर आगे बढ़ सकते हैं।
घोषणाओं से आगे क्रियान्वयन पर जोर
किसी भी अंतरराष्ट्रीय संस्था की वास्तविक प्रभावशीलता उसके फैसलों के क्रियान्वयन से तय होती है। इसलिए ब्रिक्स के प्रमुख निर्णयों के लिए समयबद्ध लक्ष्य और स्पष्ट जिम्मेदारी तय की जा सकती है। नियमित समीक्षा से इन फैसलों की प्रगति पर नजर रखी जा सकती है। शिखर सम्मेलनों के बीच संस्थागत तंत्र को भी लगातार सक्रिय रखना होगा। ब्रिक्स ने साबित किया है कि वह व्यापक हो सकता है। अब चुनौती यह साबित करने की है कि उसकी व्यापकता उसे अधिक सक्षम और प्रभावी भी बना सकती है।
भारत की अध्यक्षता की बड़ी परीक्षा
भारत की अध्यक्षता ऐसे समय में हो रही है जब ब्रिक्स अपनी भूमिका को नए सिरे से परिभाषित कर रहा है। विस्तार ने संगठन को बदलती विश्व व्यवस्था का अधिक व्यापक प्रतिनिधि बनाया है। अब सामूहिक सामर्थ्य तय करेगी कि वह वैश्विक निर्णय प्रक्रिया को कितना प्रभावित कर सकता है। भारत के लिए चुनौती विभिन्न शक्ति-केंद्रों के साथ सहयोग करते हुए संगठन की रणनीतिक स्वायत्तता और साझा एजेंडे के बीच संतुलन बनाने की होगी। नई दिल्ली शिखर सम्मेलन इसी दिशा में महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हो सकता है।