भरतपुर में रिटायर्ड कैप्टन की अर्थी को बेटियों ने दिया कंधा, मुखाग्नि देकर निभाया फर्ज; भावुक हुआ गांव
भरतपुर। राजस्थान के भरतपुर जिले के नदबई क्षेत्र के ऊंच गांव में सेना से सेवानिवृत्त कैप्टन रणधीर सिंह चाहर का बीमारी के चलते निधन हो गया। पिता की अंतिम विदाई के समय उनकी तीनों बेटियों ने मिसाल पेश की। बेटियों ने पिता की अर्थी को कंधा दिया और मुखाग्नि देकर अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी निभाई। परिवार पहले ही कोरोना काल में अपने इकलौते बेटे नवीन को खो चुका था। अब पिता के निधन से घर में एक बार फिर शोक छा गया। अंतिम यात्रा का भावुक दृश्य देखकर गांव के लोगों की आंखें नम हो गईं।
पहले भाई को खोया, अब पिता के बिछड़ने का दुख
भरतपुर के नदबई क्षेत्र के ऊंच गांव निवासी रणधीर सिंह चाहर भारतीय सेना से कैप्टन पद से सेवानिवृत्त हुए थे। उन्होंने लंबे समय तक सेना में रहकर देश की सेवा की थी। सेवानिवृत्ति के बाद वह परिवार के साथ रह रहे थे।परिवार में एक बेटा नवीन और तीन बेटियां थीं। हालांकि, कोरोना काल में इकलौते बेटे नवीन का निधन हो गया था। परिवार अभी इस दुख से उबर भी नहीं पाया था कि रणधीर सिंह चाहर के निधन से एक और बड़ा सदमा लग गया।लगातार दो अपनों को खोने का दर्द परिवार के लिए बेहद कठिन रहा। इस दुखद घड़ी में तीनों बेटियां एक-दूसरे का सहारा बनीं।
बेटियों ने अर्थी को कंधा दिया, मुखाग्नि देकर की अंतिम विदाई
पिता के निधन के बाद तीनों बेटियों ने अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी संभाली। उन्होंने पिता की अर्थी को कंधा दिया और मुखाग्नि देकर उन्हें अंतिम विदाई दी।अंतिम यात्रा के दौरान बेटियों का अपने पिता के प्रति प्रेम और जिम्मेदारी साफ नजर आई। यह दृश्य देखकर वहां मौजूद लोग भावुक हो गए।परिवार की कठिन परिस्थितियों के बीच बेटियों का यह कदम चर्चा का विषय बना। उन्होंने परंपरागत सोच से आगे बढ़कर अपने पिता के प्रति कर्तव्य निभाया।
दो बेटियां शिक्षा विभाग में कार्यरत, तीसरी गृहिणी
रणधीर सिंह चाहर की तीन बेटियों में से दो शिक्षा विभाग में कार्यरत हैं। वहीं, तीसरी बेटी गृहिणी हैं।इकलौते भाई के निधन के बाद बेटियों का परिवार के प्रति साथ और भी महत्वपूर्ण हो गया था। अब पिता के निधन के समय भी उन्होंने एकजुट होकर परिवार की जिम्मेदारी संभाली।पिता की अंतिम विदाई में बेटियों की भागीदारी ने यह संदेश दिया कि माता-पिता के प्रति प्रेम और कर्तव्य निभाने के लिए बेटा होना जरूरी नहीं है।
बेटियों के समान अधिकार और बदलती सामाजिक सोच
समृद्ध भारत अभियान के संयोजक सीताराम गुप्ता के अनुसार, बदलते दौर में बेटियां शिक्षा, रोजगार और पारिवारिक जिम्मेदारियों में आगे बढ़ रही हैं। वे हर क्षेत्र में अपनी भूमिका निभा रही हैं।उन्होंने बेटियों के समान अधिकारों और सामाजिक भागीदारी का उल्लेख किया। हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 के तहत बेटियों को पैतृक संपत्ति में बेटों के समान अधिकार दिए गए हैं।वहीं, माता-पिता की देखभाल और अंतिम संस्कार जैसी जिम्मेदारियों में बेटियों की भागीदारी भी सामाजिक बदलाव का उदाहरण है। ऊंच गांव की यह घटना इसी बदलती सोच को सामने लाती है।
भरतपुर में पहले भी बेटियों ने निभाया अंतिम संस्कार का फर्ज
भरतपुर जिले में इससे पहले भी बेटियों की ओर से पिता को कंधा देने के उदाहरण सामने आ चुके हैं।जानकारी के अनुसार, 16 मार्च 2019 को कृष्णा नगर कॉलोनी निवासी राकेश की अर्थी को उनकी दो बेटियों ने कंधा दिया था। मृतक का कोई पुत्र नहीं था।इसी तरह, भरतपुर के बिजली विभाग में कार्यरत रहे प्रेम शंकर शर्मा के निधन पर भी उनकी बेटियों ने अर्थी को कंधा देकर अंतिम विदाई दी थी। उनका भी कोई बेटा नहीं था।ये घटनाएं बताती हैं कि परिवार के प्रति जिम्मेदारी और संवेदना किसी एक रिश्ते या लिंग तक सीमित नहीं होती।
पिता की अंतिम विदाई में बेटियों ने पेश की मिसाल
सेना से सेवानिवृत्त कैप्टन रणधीर सिंह चाहर की अंतिम यात्रा परिवार के लिए बेहद भावुक रही। पहले बेटे और अब पिता को खोने के दुख के बीच तीनों बेटियों ने हिम्मत के साथ जिम्मेदारी निभाई।अर्थी को कंधा देने और मुखाग्नि देने के उनके फैसले ने गांव के लोगों को भावुक कर दिया। यह घटना माता-पिता के प्रति प्रेम, सम्मान और कर्तव्य की एक मार्मिक मिसाल बन गई।