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48 घंटे पहले बनीं मां, फिर दी जज की परीक्षा… 23 साल की श्रीपति ने रचा इतिहास

तमिलनाडु की 23 वर्षीय श्रीपति ने संघर्ष, समर्पण और आत्मविश्वास की ऐसी मिसाल पेश की है, जिसने पूरे देश का ध्यान खींचा। बेटी को जन्म देने के महज 48 घंटे बाद उन्होंने करीब 200 किलोमीटर का सफर तय कर सिविल जज की परीक्षा दी। उनकी मेहनत रंग लाई और वह तमिलनाडु के मलैयाली आदिवासी समुदाय की पहली महिला सिविल जज बन गईं। सीमित संसाधनों और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बावजूद उनकी सफलता आज लाखों युवाओं और बेटियों के लिए प्रेरणा बन चुकी है।

दूरदराज के गांव से शुरू हुआ संघर्ष का सफर

श्रीपति का जन्म तमिलनाडु के तिरुवन्नामलाई जिले के धनियाक्कुप्पम गांव में हुआ, जो वन क्षेत्र में स्थित है और जहां आज भी बुनियादी सुविधाओं की कमी है। गांव तक पहुंचने के लिए लंबा सफर तय करना पड़ता है और शिक्षा जैसी सुविधाएं भी सीमित हैं। आर्थिक रूप से साधारण परिवार से आने वाली श्रीपति के पिता खेती और मजदूरी कर परिवार चलाते थे। तमाम कठिनाइयों के बावजूद उनके माता-पिता ने बच्चों की पढ़ाई को प्राथमिकता दी। यही मजबूत पारिवारिक समर्थन उनके भविष्य की सबसे बड़ी ताकत बना।

समाज की पीड़ा देखकर चुना न्यायपालिका का रास्ता

श्रीपति बचपन से अपने आदिवासी समुदाय के लोगों को कानूनी जानकारी के अभाव में परेशान होते देखती थीं। इसी अनुभव ने उनके भीतर न्यायपालिका से जुड़ने का सपना जगाया। उन्होंने कानून की पढ़ाई पूरी की और कॉलेज के दौरान ही तमिलनाडु सिविल जज परीक्षा की तैयारी शुरू कर दी। उनका उद्देश्य केवल सरकारी पद हासिल करना नहीं था, बल्कि अपने समाज के लोगों को न्याय और कानूनी अधिकारों के प्रति जागरूक करना भी था। यही सोच उनकी सफलता की मजबूत नींव बनी।

शादी और मातृत्व भी नहीं रोक सके उनका सपना

श्रीपति की शादी कम उम्र में एक ट्रक ड्राइवर से हुई, लेकिन उन्होंने अपने करियर को बीच में नहीं छोड़ा। परिवार और पति ने भी उनके सपनों का पूरा साथ दिया। नवंबर 2023 में उन्होंने एक बेटी को जन्म दिया। आमतौर पर इस समय महिलाएं आराम करती हैं, लेकिन परीक्षा की तारीख तय होने के कारण श्रीपति ने प्रसव के सिर्फ दो दिन बाद अपने पति के साथ लगभग 200 किलोमीटर का सफर तय कर परीक्षा केंद्र पहुंचने का निर्णय लिया। यह कदम उनके लक्ष्य के प्रति असाधारण समर्पण का प्रतीक बन गया।

23 साल की उम्र में बनीं पहली आदिवासी महिला सिविल जज

श्रीपति की मेहनत आखिरकार सफल हुई और उन्होंने तमिलनाडु सिविल जज परीक्षा उत्तीर्ण कर केवल 23 वर्ष की आयु में न्यायिक सेवा में स्थान हासिल किया। इसके साथ ही वह मलैयाली आदिवासी समुदाय की पहली महिला सिविल जज बन गईं। उनकी इस उपलब्धि पर पूरे गांव में उत्सव का माहौल रहा और राज्यभर में उनकी सराहना हुई। उनकी सफलता को महिला सशक्तिकरण, शिक्षा और आदिवासी समाज के सशक्त प्रतिनिधित्व की प्रेरक मिसाल माना गया।

लाखों युवाओं के लिए बनीं प्रेरणा

श्रीपति की कहानी यह साबित करती है कि कठिन परिस्थितियां, आर्थिक चुनौतियां, पारिवारिक जिम्मेदारियां या मातृत्व किसी व्यक्ति के सपनों की राह नहीं रोक सकते। यदि लक्ष्य स्पष्ट हो और उसे पाने का संकल्प मजबूत हो, तो हर मुश्किल को पार किया जा सकता है। उनकी उपलब्धि आज उन सभी युवाओं, विशेषकर बेटियों के लिए प्रेरणा है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद अपने जीवन में बड़ी सफलता हासिल करने का सपना देखती हैं।

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