बाड़मेर के 1383 फीट ऊंचे गढ़ पर विराजीं जोगमाया, 1965 और 1971 के युद्ध में लोगों ने यहीं ली थी शरण
राजस्थान के बाड़मेर शहर में 1383 फीट ऊंची पहाड़ी पर स्थित जोगमाया मंदिर आस्था और इतिहास का प्रमुख केंद्र है। मान्यता है कि वर्ष 1965 और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान बमबारी के बीच शहर के लोग सुरक्षा की उम्मीद में मंदिर की सीढ़ियों पर पहुंचते थे। गढ़ मंदिर का निर्माण 16वीं सदी में रावत भीमा ने करवाया था। नवरात्र के दौरान यहां नौ दिन तक श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है। सैनिक भी मां की आरती में शामिल होकर देश की सुरक्षा और खुशहाली की कामना करते हैं।
बाड़मेर के गढ़ पर स्थित है जोगमाया मंदिर
बाड़मेर। राजस्थान की रेगिस्तानी धरती पर स्थित जोगमाया मंदिर शहर की प्राचीन धार्मिक धरोहरों में शामिल है। ऊंची पहाड़ी पर बने इस मंदिर में सालभर श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। नवरात्र के दौरान यहां विशेष धार्मिक माहौल रहता है। पहाड़ी पर माता के जयकारे गूंजते हैं और भक्त परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।मंदिर की खासियत केवल इसकी धार्मिक पहचान नहीं है। इसका जुड़ाव बाड़मेर के पुराने इतिहास और युद्ध के दौर की यादों से भी है। यहां पहुंचने वाले श्रद्धालु माता के दर्शन के साथ शहर की ऐतिहासिक विरासत को भी करीब से महसूस करते हैं।
16वीं सदी में रावत भीमा ने करवाया था निर्माण
बाड़मेर के इतिहास की कई कड़ियां जूना बाड़मेर से जुड़ी हुई हैं। स्थानीय जानकारों के अनुसार, जूना बाड़मेर के बाद बाहड़मेर बसा था। इसे बाहड़राव ने बसाया था। जूना बाड़मेर शहर से करीब 25 किलोमीटर दूर स्थित है।इसके बाद 16वीं सदी में रावत भीमा ने ऊंची पहाड़ी पर गढ़ मंदिर का निर्माण करवाया। समय के साथ यह मंदिर जोगमाया के नाम से प्रसिद्ध हुआ। आज यह बाड़मेर की धार्मिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है।पहाड़ी की ऊंचाई से आसपास के क्षेत्र का दृश्य दिखाई देता है। मंदिर तक पहुंचने वाली सीढ़ियां और पहाड़ी का प्राकृतिक परिवेश श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है।
पुराने बाड़मेर की बसावट से जुड़ी हैं कई यादें
गढ़ की पहाड़ी की तलहटी में पुराने बाड़मेर की बसावट थी। इस क्षेत्र में सोन तालाब, कारेली नाडी और नरगासर तालाब जैसे जलस्रोत महत्वपूर्ण माने जाते थे। पुरानी बावड़ियां और आसपास की पहाड़ियां भी इस इलाके की पहचान थीं।पुराने शहर में जोशियों का वास, ढाणी बाजार, जीनगरों की बस्ती और मोक्षमार्ग प्रमुख हिस्सों में शामिल थे। स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, उस समय शहर का विस्तार सीमित था। शहर की सीमा शहर कोतवाली तक मानी जाती थी।बताया जाता है कि कोतवाली क्षेत्र में पहले घुड़साल हुआ करती थी। गांधी चौक के सामने स्थित ओल्ड स्कूल को भी अंग्रेजों के समय का बताया जाता है। रेलवे स्टेशन की ओर का इलाका कभी काफी सुनसान रहता था।
1965 और 1971 के युद्ध में मंदिर बना आसरे का ठिकाना
गढ़ मंदिर का इतिहास भारत-पाकिस्तान युद्धों की यादों से भी जुड़ा है। रावत भीमा की वंश परंपरा से जुड़े रावत त्रिभुवनसिंह के अनुसार, वर्ष 1965 और 1971 के युद्ध के दौरान बाड़मेर शहर पर बमबारी हुई थी।उनका कहना है कि उस मुश्किल समय में लोग सुरक्षा की उम्मीद लेकर मंदिर की सीढ़ियों पर पहुंचते थे। पहाड़ी पर स्थित मंदिर लोगों के लिए धार्मिक आस्था के साथ भरोसे का ठिकाना भी बना हुआ था।युद्ध के दौरान लोगों के मन में भय और अनिश्चितता का माहौल था। ऐसे समय में मंदिर में पहुंचकर लोग मां से परिवार और शहर की सुरक्षा की प्रार्थना करते थे। इन घटनाओं की यादें आज भी स्थानीय लोगों की चर्चाओं में सामने आती हैं।
मंदिर परिसर में नागणेच्यां माता का मंदिर और बंकर
गढ़ मंदिर परिसर में नागणेच्यां माता का मंदिर भी स्थित है। स्थानीय जानकारी के अनुसार, इसके पास बंकर बनाए गए थे। पहाड़ी की भौगोलिक स्थिति और संकरी सीढ़ियों के कारण युद्ध के समय लोग यहां पहुंचते थे।मंदिर से जुड़ी ये स्मृतियां बाड़मेर के धार्मिक इतिहास को युद्धकालीन अनुभवों से जोड़ती हैं। यहां आने वाले श्रद्धालु माता के प्रति अपनी आस्था व्यक्त करते हैं और देश की सुरक्षा की कामना करते हैं।
नवरात्र में उमड़ते हैं श्रद्धालु, सैनिक भी करते हैं प्रार्थना
नवरात्र के नौ दिनों में जोगमाया मंदिर में विशेष धार्मिक गतिविधियां होती हैं। श्रद्धालु दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं। मंदिर में माता की आरती के दौरान जयकारे गूंजते हैं।स्थानीय परंपरा के अनुसार, सैनिक भी मां की आरती में शामिल होकर देश की रक्षा की प्रार्थना करते हैं। श्रद्धालु परिवार की खुशहाली, सुख-समृद्धि और क्षेत्र में शांति की कामना करते हैं।इस तरह बाड़मेर का जोगमाया मंदिर केवल पूजा-अर्चना का स्थान नहीं है। यह शहर की ऐतिहासिक स्मृतियों, स्थानीय परंपराओं और लोगों की आस्था से जुड़ा एक महत्वपूर्ण धरोहर स्थल भी है।