अरावली संरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट की हाई-पावर्ड कमेटी वागड़ पहुंचेगी, डूंगरपुर-बांसवाड़ा में जांच
जयपुर। अरावली पर्वतमाला की परिभाषा, सीमांकन और संरक्षण से जुड़े मुद्दों की पड़ताल के लिए सुप्रीम कोर्ट की ओर से गठित हाई-पावर्ड कमेटी राजस्थान के वागड़ क्षेत्र का दौरा करेगी। प्रस्तावित कार्यक्रम के अनुसार, कमेटी 11 से 13 अक्टूबर तक डूंगरपुर और बांसवाड़ा के चयनित इलाकों में जमीनी स्थिति का आकलन करेगी। इस दौरान खनन गतिविधियों, वन क्षेत्र, भूमि उपयोग, जलस्रोतों और स्थानीय आदिवासी समुदायों की आजीविका से जुड़े पहलुओं पर जानकारी जुटाई जाएगी। कमेटी को 30 नवंबर 2026 तक अपनी रिपोर्ट पेश करनी है।
अरावली की परिभाषा और सीमांकन की समीक्षा
अरावली पर्वतमाला की पहचान और उसके संरक्षण से जुड़े मामलों में विशेषज्ञों की राय लेने के लिए हाई-पावर्ड कमेटी गठित की गई है। इसका उद्देश्य पहले तैयार की गई परिभाषा और उसके आधार पर हुए सीमांकन का स्वतंत्र तथा विशेषज्ञ दृष्टिकोण से मूल्यांकन करना है।इस प्रक्रिया में अरावली क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति, पारिस्थितिकी और मानवीय गतिविधियों के प्रभाव को समझने पर जोर दिया जा रहा है। वागड़ क्षेत्र का दौरा इसी जमीनी पड़ताल का हिस्सा होगा।
डूंगरपुर के पालदेवल-सरकन में होगा निरीक्षण
निर्धारित कार्यक्रम के मुताबिक, 11 अक्टूबर को कमेटी डूंगरपुर जिले के पालदेवल-सरकन क्षेत्र का दौरा करेगी। यहां पहाड़ियों, वन क्षेत्र, खनन और आसपास की भूमि के इस्तेमाल से जुड़े तथ्यों का आकलन किया जाएगा।कमेटी स्थानीय परिस्थितियों को समझने के लिए संबंधित अधिकारियों और अन्य हितधारकों से जानकारी ले सकती है। इस दौरान क्षेत्र की पर्यावरणीय स्थिति और स्थानीय लोगों की आजीविका से जुड़े मुद्दे भी महत्वपूर्ण रहेंगे।
बांसवाड़ा के केवड़िया-कोठारा में पड़ताल
डूंगरपुर के बाद 12 अक्टूबर को कमेटी बांसवाड़ा जिले के केवड़िया-कोठारा क्षेत्र पहुंचेगी। यहां भी खनन, स्टोन क्रशर, वन क्षेत्र, जलस्रोतों और भूमि उपयोग की स्थिति का आकलन किया जाएगा।दौरे के दौरान यह समझने का प्रयास होगा कि प्राकृतिक संसाधनों से जुड़ी गतिविधियों का आसपास के पर्यावरण और स्थानीय समुदायों पर क्या प्रभाव पड़ता है। दोनों जिलों में स्थानीय लोगों के अनुभव और सुझाव भी रिपोर्ट के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
आदिवासी समुदायों और अन्य हितधारकों से संवाद
कमेटी के दौरे में स्थानीय आदिवासी समुदायों की भागीदारी पर विशेष जोर दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने 7 सितंबर के आदेश में निर्देश दिया था कि राजस्थान और गुजरात के आदिवासी समुदायों सहित सभी संबंधित हितधारकों को अपनी बात रखने का उचित अवसर दिया जाए।इसी क्रम में शाम को बैठकों के दौरान पर्यावरणविदों, विशेषज्ञों, खनन पट्टाधारकों, ग्रामीणों, किसानों, श्रमिकों और आदिवासी प्रतिनिधियों से सुझाव लिए जाने का कार्यक्रम है। स्थानीय लोगों की बात सुनकर क्षेत्र की वास्तविक परिस्थितियों को बेहतर तरीके से समझने में मदद मिल सकती है।
राज्य सरकार ने अधिकारियों को सौंपी जिम्मेदारी
कमेटी के दौरे की तैयारियों के लिए राज्य सरकार ने संबंधित अधिकारियों को जिम्मेदारी सौंपी है। वन विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी को फील्ड कोऑर्डिनेटर के रूप में नियुक्त किया जाएगा। वहीं डूंगरपुर और बांसवाड़ा के उप वन संरक्षक तथा फील्ड स्टाफ निरीक्षण के दौरान कमेटी के साथ रहेंगे।अधिकारियों की भूमिका दौरे के दौरान आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराने और क्षेत्रीय स्तर पर समन्वय बनाए रखने की होगी।
30 नवंबर तक रिपोर्ट पेश करने का निर्देश
हाई-पावर्ड कमेटी पहले भी राजस्थान के विभिन्न क्षेत्रों का दौरा कर चुकी है। अब दक्षिणी राजस्थान में अतिरिक्त जमीनी पड़ताल और स्थानीय समुदायों से संवाद पर ध्यान दिया जा रहा है।सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार कमेटी को 30 नवंबर 2026 तक व्यापक रिपोर्ट सौंपनी है। इस रिपोर्ट में अरावली की परिभाषा, सीमांकन, पर्यावरणीय स्थिति और संबंधित हितधारकों की बातों के आधार पर निष्कर्ष रखे जाएंगे।
अरावली संरक्षण के लिए अहम मानी जा रही जांच
अरावली पर्वतमाला पर्यावरण, जैव विविधता, जलस्रोतों और स्थानीय आजीविका के लिहाज से महत्वपूर्ण है। ऐसे में इसकी परिभाषा और सीमांकन से जुड़े फैसलों का असर क्षेत्र में भूमि उपयोग तथा खनन गतिविधियों पर पड़ सकता है।वागड़ के डूंगरपुर और बांसवाड़ा में होने वाली यह पड़ताल स्थानीय परिस्थितियों को समझने का अवसर देगी। अब इस दौरे से जुटने वाले तथ्यों और कमेटी की अंतिम रिपोर्ट पर नजर रहेगी।जयपुर। अरावली पर्वतमाला की परिभाषा, सीमांकन और संरक्षण से जुड़े मुद्दों की पड़ताल के लिए सुप्रीम कोर्ट की ओर से गठित हाई-पावर्ड कमेटी राजस्थान के वागड़ क्षेत्र का दौरा करेगी। प्रस्तावित कार्यक्रम के अनुसार, कमेटी 11 से 13 अक्टूबर तक डूंगरपुर और बांसवाड़ा के चयनित इलाकों में जमीनी स्थिति का आकलन करेगी। इस दौरान खनन गतिविधियों, वन क्षेत्र, भूमि उपयोग, जलस्रोतों और स्थानीय आदिवासी समुदायों की आजीविका से जुड़े पहलुओं पर जानकारी जुटाई जाएगी। कमेटी को 30 नवंबर 2026 तक अपनी रिपोर्ट पेश करनी है।
अरावली की परिभाषा और सीमांकन की समीक्षा
अरावली पर्वतमाला की पहचान और उसके संरक्षण से जुड़े मामलों में विशेषज्ञों की राय लेने के लिए हाई-पावर्ड कमेटी गठित की गई है। इसका उद्देश्य पहले तैयार की गई परिभाषा और उसके आधार पर हुए सीमांकन का स्वतंत्र तथा विशेषज्ञ दृष्टिकोण से मूल्यांकन करना है।इस प्रक्रिया में अरावली क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति, पारिस्थितिकी और मानवीय गतिविधियों के प्रभाव को समझने पर जोर दिया जा रहा है। वागड़ क्षेत्र का दौरा इसी जमीनी पड़ताल का हिस्सा होगा।
डूंगरपुर के पालदेवल-सरकन में होगा निरीक्षण
निर्धारित कार्यक्रम के मुताबिक, 11 अक्टूबर को कमेटी डूंगरपुर जिले के पालदेवल-सरकन क्षेत्र का दौरा करेगी। यहां पहाड़ियों, वन क्षेत्र, खनन और आसपास की भूमि के इस्तेमाल से जुड़े तथ्यों का आकलन किया जाएगा।कमेटी स्थानीय परिस्थितियों को समझने के लिए संबंधित अधिकारियों और अन्य हितधारकों से जानकारी ले सकती है। इस दौरान क्षेत्र की पर्यावरणीय स्थिति और स्थानीय लोगों की आजीविका से जुड़े मुद्दे भी महत्वपूर्ण रहेंगे।
बांसवाड़ा के केवड़िया-कोठारा में पड़ताल
डूंगरपुर के बाद 12 अक्टूबर को कमेटी बांसवाड़ा जिले के केवड़िया-कोठारा क्षेत्र पहुंचेगी। यहां भी खनन, स्टोन क्रशर, वन क्षेत्र, जलस्रोतों और भूमि उपयोग की स्थिति का आकलन किया जाएगा।दौरे के दौरान यह समझने का प्रयास होगा कि प्राकृतिक संसाधनों से जुड़ी गतिविधियों का आसपास के पर्यावरण और स्थानीय समुदायों पर क्या प्रभाव पड़ता है। दोनों जिलों में स्थानीय लोगों के अनुभव और सुझाव भी रिपोर्ट के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
आदिवासी समुदायों और अन्य हितधारकों से संवाद
कमेटी के दौरे में स्थानीय आदिवासी समुदायों की भागीदारी पर विशेष जोर दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने 7 सितंबर के आदेश में निर्देश दिया था कि राजस्थान और गुजरात के आदिवासी समुदायों सहित सभी संबंधित हितधारकों को अपनी बात रखने का उचित अवसर दिया जाए।इसी क्रम में शाम को बैठकों के दौरान पर्यावरणविदों, विशेषज्ञों, खनन पट्टाधारकों, ग्रामीणों, किसानों, श्रमिकों और आदिवासी प्रतिनिधियों से सुझाव लिए जाने का कार्यक्रम है। स्थानीय लोगों की बात सुनकर क्षेत्र की वास्तविक परिस्थितियों को बेहतर तरीके से समझने में मदद मिल सकती है।
राज्य सरकार ने अधिकारियों को सौंपी जिम्मेदारी
कमेटी के दौरे की तैयारियों के लिए राज्य सरकार ने संबंधित अधिकारियों को जिम्मेदारी सौंपी है। वन विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी को फील्ड कोऑर्डिनेटर के रूप में नियुक्त किया जाएगा। वहीं डूंगरपुर और बांसवाड़ा के उप वन संरक्षक तथा फील्ड स्टाफ निरीक्षण के दौरान कमेटी के साथ रहेंगे।अधिकारियों की भूमिका दौरे के दौरान आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराने और क्षेत्रीय स्तर पर समन्वय बनाए रखने की होगी।
30 नवंबर तक रिपोर्ट पेश करने का निर्देश
हाई-पावर्ड कमेटी पहले भी राजस्थान के विभिन्न क्षेत्रों का दौरा कर चुकी है। अब दक्षिणी राजस्थान में अतिरिक्त जमीनी पड़ताल और स्थानीय समुदायों से संवाद पर ध्यान दिया जा रहा है।सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार कमेटी को 30 नवंबर 2026 तक व्यापक रिपोर्ट सौंपनी है। इस रिपोर्ट में अरावली की परिभाषा, सीमांकन, पर्यावरणीय स्थिति और संबंधित हितधारकों की बातों के आधार पर निष्कर्ष रखे जाएंगे।
अरावली संरक्षण के लिए अहम मानी जा रही जांच
अरावली पर्वतमाला पर्यावरण, जैव विविधता, जलस्रोतों और स्थानीय आजीविका के लिहाज से महत्वपूर्ण है। ऐसे में इसकी परिभाषा और सीमांकन से जुड़े फैसलों का असर क्षेत्र में भूमि उपयोग तथा खनन गतिविधियों पर पड़ सकता है।वागड़ के डूंगरपुर और बांसवाड़ा में होने वाली यह पड़ताल स्थानीय परिस्थितियों को समझने का अवसर देगी। अब इस दौरे से जुटने वाले तथ्यों और कमेटी की अंतिम रिपोर्ट पर नजर रहेगी।