अरावली पर भू-माफिया की मार: 35% हिस्सा बर्बाद, 40% प्राकृतिक झरने बंद
राजस्थान की अरावली पर्वतमाला में अवैध खनन और अनियंत्रित निर्माण से पर्यावरणीय संकट गहराता जा रहा है। अजमेर और आसपास के क्षेत्रों में छोटी चट्टानें तेजी से नष्ट हो रही हैं। रिपोर्ट के अनुसार, अवैध खनन से अरावली का करीब 35 प्रतिशत हिस्सा प्रभावित होकर बर्बाद हो चुका है। वहीं, चट्टानी क्षेत्रों के लगभग 40 प्रतिशत प्राकृतिक झरने बंद होने की बात सामने आई है। इससे मिट्टी की उर्वरता, जैव विविधता और भूजल संरक्षण पर असर पड़ रहा है।
अरावली की छोटी चट्टानों पर बढ़ता संकट
राजस्थान में अरावली पर्वतमाला केवल पहाड़ियों का समूह नहीं है। यह प्राकृतिक पर्यावरण, मिट्टी और जल संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। लेकिन पिछले 30 से 35 वर्षों में शहरी विस्तार, आवासीय निर्माण और अवैध खनन ने इसके प्राकृतिक स्वरूप को नुकसान पहुंचाया है।अरावली राजस्थान और हरियाणा से होते हुए दिल्ली तक फैली हुई है। इसकी लंबाई करीब 700 किलोमीटर बताई जाती है। अजमेर, ब्यावर, उदयपुर, देवगढ़ और पाली-सिरोही के मैदानी क्षेत्रों में छोटी चट्टानें पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में मदद करती हैं।हालांकि, निर्माण गतिविधियों के कारण इन चट्टानों के अस्तित्व पर खतरा बढ़ गया है। इसका असर स्थानीय वनस्पति, मिट्टी और जलस्रोतों पर भी दिखाई देने लगा है।
अजमेर के कई इलाकों में चट्टानें काटकर निर्माण
अजमेर के वैशाली नगर, हरिभाऊ उपाध्याय नगर, शास्त्री नगर, एलआईसी कॉलोनी, आंतेड़, कृष्णगंज, पंचशील और लोहागल सहित कई क्षेत्रों में पहले बड़ी संख्या में छोटी चट्टानें मौजूद थीं।बताई गई जानकारी के अनुसार, इन इलाकों में पहले करीब 70 प्रतिशत क्षेत्र चट्टानी था। आवासीय और व्यावसायिक निर्माण के लिए ब्लास्टिंग और चट्टानें काटने की गतिविधियों के बाद अब लगभग 30 प्रतिशत चट्टानें ही बची हैं।हाथीखेड़ा, बोराज, ब्यावर और किशनगढ़ के आसपास भी चट्टानी क्षेत्रों को नुकसान पहुंचने की जानकारी सामने आई है। लगातार निर्माण से प्राकृतिक भू-आकृति बदल रही है। इससे स्थानीय पर्यावरण पर दीर्घकालीन असर पड़ने की आशंका है।
40 प्रतिशत प्राकृतिक झरने बंद होने का दावा
चट्टानों के नष्ट होने का असर केवल पहाड़ियों तक सीमित नहीं है। इससे प्राकृतिक जलस्रोतों और वनस्पति को भी नुकसान पहुंच रहा है।उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, चट्टानी क्षेत्रों के लगभग 40 प्रतिशत प्राकृतिक झरने बंद हो चुके हैं। गूंदा, खेजड़ी, देसी बबूल, बेर और थोर जैसी स्थानीय वनस्पतियों पर भी दबाव बढ़ रहा है।कई जगह जमीन के भीतर तक नुकसान पहुंचने की बात सामने आई है। इससे मिट्टी की नमी बनाए रखने और भूजल के प्राकृतिक पुनर्भरण की क्षमता प्रभावित हो सकती है।
रेतीले टीलों का दायरा भी बढ़ रहा
अजमेर के आसपास रेतीले टीलों का विस्तार भी चिंता का विषय बन रहा है। करीब 25 से 30 वर्ष पहले कई क्षेत्रों में छोटे-छोटे टीले दिखाई देते थे। अब माकड़वाली, होकरा और कायड़ के आसपास इनके बढ़ते दायरे की जानकारी सामने आई है।पुष्कर-नागौर सीमा, चाचियावास, नसीराबाद और ब्यावर-उदयपुर मार्ग के कुछ हिस्सों में भी रेतीले टीलों के विस्तार की बात कही गई है।विशेषज्ञों के अनुसार, प्राकृतिक वनस्पति और चट्टानी संरचनाओं के कमजोर होने से मिट्टी का कटाव बढ़ सकता है। इससे भूमि की गुणवत्ता प्रभावित होने के साथ मरुस्थलीकरण का खतरा भी बढ़ सकता है।
CEC रिपोर्ट में अरावली को हुए नुकसान का उल्लेख
केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (CEC) की 2024-25 की रिपोर्ट के हवाले से बताया गया है कि अवैध खनन के कारण अरावली का करीब 35 प्रतिशत हिस्सा बर्बाद हो चुका है।अजमेर, ब्यावर, उदयपुर, राजसमंद, सावर, सिरोही, चित्तौड़गढ़, नागौर और पाली सहित कई क्षेत्रों में अवैध खनन और निर्माण गतिविधियों से पहाड़ियों को नुकसान पहुंचने की बात सामने आई है।हालांकि, 35 प्रतिशत नुकसान के आंकड़े का सटीक भौगोलिक दायरा और आकलन का आधार आधिकारिक रिपोर्ट से मिलान करना जरूरी है। इसके बावजूद अरावली की सुरक्षा और अवैध गतिविधियों पर नियंत्रण का मुद्दा गंभीर बना हुआ है।
छोटी चट्टानें क्यों हैं जरूरी?
अरावली की छोटी चट्टानें पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में कई तरह से मदद करती हैं।
- मिट्टी का कटाव रोकने में सहायक होती हैं।
- मिट्टी की नमी और उर्वरता बनाए रखने में मदद करती हैं।
- स्थानीय वनस्पतियों और जैव विविधता को सहारा देती हैं।
- मिट्टी में मौजूद कार्बनिक पदार्थों के संरक्षण में भूमिका निभाती हैं।
- रेत, गाद और चिकनी मिट्टी के प्राकृतिक संतुलन को बनाए रखने में मदद करती हैं।
- वर्षा के पानी के जमीन में समाने और भूजल पुनर्भरण की प्रक्रिया को प्रभावित करती हैं।
- उपजाऊ मिट्टी के संरक्षण के जरिए कृषि उत्पादन में योगदान देती हैं।
इन संरचनाओं के नष्ट होने से प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ सकता है। इसलिए उनका संरक्षण पर्यावरण के साथ स्थानीय जनजीवन के लिए भी महत्वपूर्ण है।
विशेषज्ञ ने संरक्षण पर दिया जोर
एमडीएस विश्वविद्यालय के रिमोट सेंसिंग एवं पर्यावरण विभाग के प्रो. सुब्रोतो दत्ता के अनुसार, छोटी चट्टानें प्राकृतिक रूप से बनी ठोस संरचनाएं हैं। इनमें मौजूद खनिज और उनकी भौतिक बनावट मिट्टी की उर्वरता तथा अपरदन नियंत्रण में योगदान देते हैं।उनके अनुसार, चट्टानों की कमी से प्राकृतिक असंतुलन बढ़ सकता है। यदि समय रहते संरक्षण के उपाय नहीं किए गए, तो मिट्टी का कटाव और मरुस्थलीकरण बढ़ने का खतरा रहेगा।
अवैध खनन और निर्माण पर नियंत्रण जरूरी
अरावली को बचाने के लिए अवैध खनन पर प्रभावी निगरानी, निर्माण गतिविधियों की जांच और संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान जरूरी है। साथ ही, प्राकृतिक जलस्रोतों और स्थानीय वनस्पतियों के संरक्षण पर भी ध्यान देना होगा।अरावली की छोटी चट्टानें नष्ट होने से होने वाला नुकसान लंबे समय तक बना रह सकता है। इसलिए विकास कार्यों के साथ पर्यावरणीय नियमों का पालन और प्राकृतिक संरचनाओं की सुरक्षा भी प्राथमिकता होनी चाहिए।