राजस्थान में दो नगर निगम ऐसे जहां कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी, फिर भी BJP ने बनाया बोर्ड; जानें कैसे बदला गणित
राजस्थान के नगर निगम चुनाव में अजमेर और पाली के नतीजों ने बोर्ड गठन के राजनीतिक समीकरण को चर्चा में ला दिया। दोनों नगर निगमों में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, लेकिन महापौर की कुर्सी भाजपा के खाते में गई। अजमेर में कांग्रेस के 37 और भाजपा के 32 पार्षद थे, फिर भी भाजपा की अनामिका शर्मा ने कांग्रेस की किरण गढ़वाल को हरा दिया। पाली में भी कांग्रेस के 29 पार्षदों के मुकाबले भाजपा के पास 21 पार्षद थे, लेकिन महापौर चुनाव में भाजपा की नमिता बुबकिया को 33 वोट मिले। दोनों मामलों में निर्दलीय पार्षदों और चुनाव के समय बने राजनीतिक समीकरणों ने अहम भूमिका निभाई।
अजमेर में कांग्रेस के 37 पार्षद, फिर भी भाजपा की अनामिका मेयर
अजमेर नगर निगम में कुल 80 वार्ड हैं। चुनाव परिणाम में कांग्रेस को 37, भाजपा को 32 और निर्दलीयों को 11 सीटें मिलीं। बहुमत का आंकड़ा 41 था।कांग्रेस बहुमत से चार सीट दूर थी। उसके पास निर्दलीय पार्षदों के समर्थन से बोर्ड बनाने का विकल्प मौजूद था। इसके बावजूद महापौर चुनाव में तस्वीर पूरी तरह बदल गई।भाजपा की अनामिका शर्मा को 43 वोट मिले, जबकि कांग्रेस की किरण गढ़वाल को 37 वोट मिले। यानी भाजपा उम्मीदवार ने छह वोट से जीत दर्ज की।
32 भाजपा पार्षदों से 43 तक कैसे पहुंचा आंकड़ा?
अजमेर में भाजपा के 32 पार्षद थे, लेकिन महापौर चुनाव में अनामिका शर्मा को 43 वोट मिले। यानी उन्हें पार्टी के अपने संख्याबल से 11 अधिक वोट मिले।उपलब्ध चुनाव परिणामों से यह स्पष्ट है कि भाजपा उम्मीदवार को अतिरिक्त पार्षदों का समर्थन मिला। दूसरी ओर कांग्रेस की उम्मीदवार को कांग्रेस के 37 पार्षदों के बराबर ही वोट मिले।निर्दलीय पार्षदों की संख्या 11 थी। ऐसे में महापौर चुनाव से पहले दोनों दलों के लिए निर्दलीयों का समर्थन महत्वपूर्ण था। हालांकि किस पार्षद ने किसे वोट दिया, इसकी पूरी जानकारी सार्वजनिक परिणाम से अलग-अलग तौर पर निर्धारित नहीं की जा सकती।
पाली में कांग्रेस के 29 पार्षद, भाजपा के पास 21
पाली नगर निगम में भी कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी रही। 65 सदस्यीय निगम में कांग्रेस के 29, भाजपा के 21 और निर्दलीयों के 15 पार्षद चुने गए।बहुमत के लिए 33 वोट जरूरी थे। यानी कांग्रेस को बहुमत तक पहुंचने के लिए चार अतिरिक्त वोटों की जरूरत थी। भाजपा को बहुमत के लिए 12 अतिरिक्त वोट चाहिए थे।महापौर चुनाव में भाजपा की नमिता बुबकिया को 33 वोट मिले। निर्दलीय राजबाला हिंगड़ को 29 और कांग्रेस की सुमित्रा जैन को तीन वोट मिले।
पाली में कांग्रेस के वोट बंटने से बदला समीकरण
पाली में महापौर चुनाव का आंकड़ा कांग्रेस के लिए खासा अलग रहा। कांग्रेस के 29 पार्षद होने के बावजूद उसके प्रत्याशी सुमित्रा जैन को केवल तीन वोट मिले।वहीं निर्दलीय उम्मीदवार राजबाला हिंगड़ को 29 वोट मिले। भाजपा की नमिता बुबकिया ने 33 वोट हासिल कर बहुमत का आंकड़ा छू लिया।कांग्रेस में फूट और एक कांग्रेस पार्षद के निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर खड़े होने को भाजपा के पक्ष में बने समीकरण से जोड़ा जा रहा है। हालांकि पार्टी के अंदरूनी मतभेदों और पार्षदों के मतदान व्यवहार को लेकर सभी दावों की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है।
निर्दलीय पार्षद बने दोनों जगह अहम
अजमेर और पाली दोनों नगर निगमों में निर्दलीय पार्षदों की संख्या बोर्ड गठन के लिहाज से महत्वपूर्ण थी। अजमेर में 11 और पाली में 15 निर्दलीय पार्षद थे।इन संख्याओं को देखते हुए दोनों जगह महापौर चुनाव में निर्दलीयों का समर्थन महत्वपूर्ण हो सकता था। हालांकि गुप्त मतदान होने के कारण प्रत्येक पार्षद ने किसे वोट दिया, यह आधिकारिक परिणाम से सीधे पता नहीं चलता।
पार्टी के संख्याबल से अलग रहा महापौर चुनाव
अजमेर और पाली के नतीजे यह दिखाते हैं कि नगर निगम चुनाव में पार्षदों की संख्या और महापौर चुनाव का अंतिम परिणाम हमेशा एक जैसा नहीं होता।पार्षद चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनने के बाद भी महापौर चुनाव के लिए बहुमत जुटाना जरूरी होता है। इसके लिए निर्दलीय पार्षदों का समर्थन, पार्टी के भीतर एकजुटता और मतदान के समय बने समीकरण महत्वपूर्ण हो सकते हैं।दोनों नगर निगमों में महापौर चुनाव के नतीजों ने इसी अंतर को सामने रखा है।
राजस्थान निकाय राजनीति में बदला बोर्ड का गणित
अजमेर और पाली के महापौर चुनावों के बाद राजस्थान की निकाय राजनीति में बोर्ड गठन को लेकर एक बार फिर निर्दलीय पार्षदों की भूमिका चर्चा में है।जहां किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता, वहां कुछ अतिरिक्त वोट पूरे बोर्ड का समीकरण बदल सकते हैं। ऐसे में चुनाव परिणाम के बाद होने वाली राजनीतिक गतिविधियां भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो जाती हैं जितना पार्षदों का शुरुआती संख्याबल।