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सुप्रीम कोर्ट के आवारा पशु हटाने के आदेश पर मेनका गांधी का बड़ा बयान — “अव्यावहारिक फैसला, भारत की सोच करुणा पर टिकी”…

पशु अधिकारों की मुखर आवाज और पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी ने आवारा पशुओं को सड़कों से हटाकर शेल्टर होम में भेजने के सुप्रीम कोर्ट के ताजा निर्देश पर कड़ा रुख जताया है। उन्होंने इस फैसले को जमीनी हकीकत से दूर बताते हुए कहा कि भारत में पशुओं के प्रति दृष्टिकोण ‘करुणा और सह-अस्तित्व’ पर आधारित है, जिसे एक आदेश से बदला नहीं जा सकता।

मेनका गांधी ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देश को बताया अव्यावहारिक

मेनका गांधी ने कहा कि देश की मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए आवारा पशुओं को बड़े पैमाने पर पकड़कर आश्रय गृहों में रखना संभव ही नहीं है। उन्होंने तर्क दिया कि भारत जैसे विशाल देश में न तो इतने बड़े पशु आश्रय उपलब्ध हैं, न ही वे पशुओं की प्राकृतिक गतिविधियों को संभाल सकते हैं।

पशुओं को शेल्टर में रखना ‘प्राकृतिक व्यवहार’ के खिलाफ

पूर्व मंत्री ने यह भी कहा कि गायों, कुत्तों और अन्य आवारा पशुओं को अचानक कैद जैसी परिस्थितियों में डाल देना उनके स्वास्थ्य और मानसिक स्थिति को प्रभावित कर सकता है। उन्होंने समझाया कि कई पशु स्वतंत्र रूप से रहने के आदी होते हैं और उन्हें सीमित दायरे में बंद करना वैज्ञानिक और मानवीय दोनों दृष्टियों से गलत है।

भारत की संस्कृति ‘दया-भाव’ पर आधारित — मेनका गांधी

मेनका गांधी ने कहा कि भारतीय सभ्यता का आधार करुणा और पशु-हित की सोच है। उन्होंने बताया कि आवारा पशु भारतीय समाज का हिस्सा रहे हैं और लोग भी पारंपरिक रूप से इनके प्रति सहानुभूति रखते आए हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि समस्या का समाधान दंडात्मक या कठोर कदमों में नहीं, बल्कि सामुदायिक जागरूकता और प्रबंधन में है।

स्थायी समाधान क्या? मेनका गांधी ने दिए सुझाव

मेनका गांधी ने सुझाव दिया कि आवारा पशुओं की समस्या का समाधान वैज्ञानिक प्रबंधन, टीकाकरण, नसबंदी और स्थानीय निकायों की जिम्मेदारियों को मजबूत करने में है। उन्होंने कहा कि शेल्टर बनाने के बजाय समुदाय आधारित कार्यक्रमों पर जोर दिया जाना चाहिए, जिससे पशु और मनुष्य दोनों सुरक्षित रहें।

अदालत के आदेश पर उठे सवाल, बहस तेज

मेनका गांधी के बयान के बाद सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज हो गई है। विशेषज्ञ भी मानते हैं कि पशु कल्याण से जुड़े ऐसे फैसले जमीनी स्थिति देखकर ही लागू किए जाने चाहिए। यह मुद्दा अब केवल कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक और मानवीय संवेदनाओं से भी गहराई से जुड़ गया है।

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