राजसमंद में 65 साल के उस्ताद भानु सिखा रहे कुश्ती के दांव-पेच, बोले- मिट्टी में पसीना बहाने से बनता है पहलवान
राजसमंद में 65 वर्षीय उस्ताद नरेंद्र कुमार चौधरी उर्फ भानु आज भी युवाओं को पारंपरिक कुश्ती के दांव-पेच सिखा रहे हैं। करीब 201 साल पुराने इंद्र के अखाड़े नया खड़ा से उनका जुड़ाव बचपन से है। उनका मानना है कि सिर्फ सिक्स पैक बनाने से कोई पहलवान नहीं बनता। इसके लिए मिट्टी में नियमित अभ्यास, अनुशासन, दमखम और गुरु के मार्गदर्शन की जरूरत होती है। जेके टायर से सेवानिवृत्त होने के बाद भी वे रोज अखाड़े पहुंचते हैं और नई पीढ़ी को कुश्ती की परंपरा से जोड़ने में जुटे हैं।
जिम नहीं, अखाड़े की मिट्टी में तैयार होता है असली पहलवान
आज के दौर में युवा सिक्स पैक बनाने के लिए आधुनिक जिम और मशीनों का सहारा लेते हैं। लेकिन उस्ताद भानु का मानना है कि कुश्ती केवल मांसपेशियां बनाने तक सीमित नहीं है। इसके लिए दमखम, संतुलन, फुर्ती, धैर्य और प्रतिद्वंद्वी के दांव को समझने की क्षमता जरूरी है। ये गुण नियमित अभ्यास और मैदान में उतरने से विकसित होते हैं।वे युवाओं को सलाह देते हैं कि केवल आकर्षक शरीर बनाकर पहलवान होने का भ्रम न पालें। मिट्टी में पसीना बहाएं, गुरु से तकनीक सीखें और लगातार अभ्यास करें। उनके अनुसार, अखाड़ा शारीरिक मजबूती के साथ अनुशासन और विनम्रता भी सिखाता है।
पांच साल की उम्र से अखाड़े से जुड़ा है नाता
उस्ताद नरेंद्र कुमार चौधरी उर्फ भानु का अखाड़े से जुड़ाव बचपन में शुरू हुआ था। पांच साल की उम्र में वे अपने नाना सुंदरलाल के कंधों पर बैठकर अखाड़े जाया करते थे। उस समय शुरू हुआ सिलसिला आज भी जारी है।उनके लिए अखाड़ा केवल व्यायाम करने की जगह नहीं, बल्कि आस्था और संस्कारों का केंद्र है। वे रोज अखाड़े की मिट्टी माथे पर लगाकर अभ्यास शुरू करते हैं। उनका कहना है कि मिट्टी का सम्मान और गुरुजनों के प्रति श्रद्धा पहलवानी की परंपरा का अहम हिस्सा है। जेके टायर में टायर बिल्डर के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद भी उनकी दिनचर्या में अखाड़े की जगह बनी हुई है।
201 साल पुराने इंद्र के अखाड़े का गौरवशाली इतिहास
उस्ताद भानु के अनुसार, द्वारकाधीश बालकृष्ण महाराज ने अखाड़े के लिए जगह उपलब्ध कराई थी। इसकी नींव इंद्र सिंह जाट ने रखी थी। बाद में नाथूलाल जाट, श्रीकृष्ण जाट, माणक गुर्जर और छन्नू सिंह चौधरी सहित अन्य लोगों ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया।बताया जाता है कि इंदौर और मथुरा सहित दूसरे क्षेत्रों से भी पहलवान यहां कुश्ती के दांव-पेच सीखने आते थे। वर्षों से यह अखाड़ा स्थानीय पहलवानों को प्रशिक्षण देने का केंद्र बना हुआ है। यहां की परंपरा ने कई पीढ़ियों को कुश्ती से जोड़े रखा है।
राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना चुके हैं अखाड़े के पहलवान
इस अखाड़े से हरिवल्लभ गुर्जर, चंद्रलाल सनाढ्य, रमाकांत चौधरी, द्वारकाप्रसाद सनाढ्य, रोड़ीलाल सनाढ्य, मनोहर गिरी गोस्वामी, चांदमल सामर, तारीख खान पठान, नानालाल पोरवाल, किशनलाल कुमावत, बृजेश गुर्जर और शौकत हुसैन सहित कई पहलवान जुड़े रहे हैं।वर्तमान पीढ़ी में कमलेंद्र कुमावत, अनिरुद्ध जोशी, चंदन चौधरी, लेखपाल चौधरी, शिवम चौधरी, शिवदत्त चौधरी, किश जोशी और राजेश चौधरी सहित कई पहलवानों ने राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई है। राजेश चौधरी ने पीएनटीआई विभाग में स्वर्ण पदक जीतकर अखाड़े का नाम रोशन किया है।
80 साल की उम्र में भी व्यायाम, पुरानी पीढ़ी से प्रेरणा
उस्ताद भानु बताते हैं कि पुराने समय में आर्थिक परेशानियों और सुविधाओं की कमी के कारण कई प्रतिभाशाली पहलवान राष्ट्रीय स्तर तक नहीं पहुंच पाए। इसके बावजूद उनका कुश्ती के प्रति समर्पण कम नहीं हुआ।करीब 80 वर्ष के सेवानिवृत्त अध्यापक हरिवल्लभ गुर्जर आज भी अखाड़े से जुड़े हैं और व्यायाम करते हैं। उनकी सक्रियता बताती है कि नियमित अभ्यास और अनुशासन जीवन का हिस्सा बन सकते हैं। पुरानी पीढ़ी का यह जुड़ाव युवाओं को मेहनत और निरंतरता का संदेश देता है।
200 से अधिक पहलवान अखाड़े से जुड़े
उस्ताद भानु के अनुसार, वर्तमान में 200 से अधिक पहलवान इस अखाड़े से जुड़े हुए हैं। यहां युवाओं को कुश्ती की तकनीक सिखाने के साथ नियमित अभ्यास और अनुशासन का महत्व भी समझाया जाता है। उनकी कोशिश है कि नई पीढ़ी आधुनिक सुविधाओं का इस्तेमाल करे, लेकिन पारंपरिक अखाड़ों की अहमियत को भी समझे।अखाड़े की वर्तमान कार्यकारिणी में महेंद्र सनाढ्य अध्यक्ष, नरेंद्र चौधरी उर्फ भानु उपाध्यक्ष, जयसिंह राणावत सचिव और जितेंद्र सनाढ्य कोषाध्यक्ष हैं। निर्माण कमेटी में बृजेश गुर्जर, योगेश गुर्जर और दुर्गेश पालीवाल सहित अन्य सदस्य शामिल हैं।
उस्ताद भानु का संदेश: मेहनत, अभ्यास और अनुशासन जरूरी
उस्ताद भानु का मानना है कि शरीर बनाना और पहलवान बनना दो अलग बातें हैं। कुश्ती में सफलता के लिए लगातार अभ्यास, दमखम, तकनीक और मानसिक मजबूती जरूरी है। मिट्टी के प्रति सम्मान और गुरु के मार्गदर्शन को भी वे अहम मानते हैं।उनका संदेश साफ है—सिक्स पैक दिखाने से कोई पहलवान नहीं बनता। असली पहचान अखाड़े में बहाए गए पसीने, नियमित अभ्यास, अनुशासन और हौसले से बनती है।