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उदयपुर में 10 साल से नहीं बना नया जलस्रोत, कई कॉलोनियों में पानी की किल्लत; एयरपोर्ट रोड पर सबसे ज्यादा असर

उदयपुर में तेजी से बढ़ती आबादी और नई कॉलोनियों के विस्तार के बीच पेयजल संकट गहराता जा रहा है। पिछले 10 साल से शहर में कोई नया जलस्रोत विकसित नहीं हुआ है। एयरपोर्ट रोड की कई कॉलोनियां जलापूर्ति नेटवर्क के अंतिम छोर पर होने के कारण पर्याप्त पानी से वंचित हैं। यहां हजारों परिवार निजी नलकूपों और महंगे टैंकरों पर निर्भर हैं। देवास परियोजना के तीसरे और चौथे चरण से राहत मिलने की उम्मीद है, लेकिन इनके पूरा होने में अभी समय लगेगा। नगर निगम की सीमा में शामिल होने के बाद भी कई कॉलोनियों तक नियमित पेयजल आपूर्ति नहीं पहुंच पाई है।

उदयपुर में शहर का विस्तार बढ़ा, जलापूर्ति व्यवस्था पीछे छूटी

उदयपुर शहर का भौगोलिक विस्तार पिछले दो से तीन दशकों में तेजी से हुआ है। चित्तौड़गढ़ मार्ग यानी एयरपोर्ट रोड की दिशा में नई कॉलोनियां और आवासीय क्षेत्र विकसित हुए हैं। नगर निगम की सीमा देबारी से आगे तक बढ़ चुकी है। वहीं, उदयपुर विकास प्राधिकरण के दायरे में भी कई नई कॉलोनियां आबाद हुई हैं।शहर के विस्तार के साथ बड़ी संख्या में परिवार इन इलाकों में रहने लगे हैं। लेकिन पेयजल आपूर्ति का बुनियादी ढांचा उसी अनुपात में विकसित नहीं हो पाया। इसका असर एयरपोर्ट रोड की कॉलोनियों पर सबसे ज्यादा दिखाई दे रहा है। कई इलाकों में नियमित सरकारी जलापूर्ति उपलब्ध नहीं होने से लोगों को वैकल्पिक इंतजाम करने पड़ रहे हैं।

पिछले 10 साल से नहीं बना नया जलस्रोत

उदयपुर में बढ़ती पेयजल मांग के बावजूद पिछले 10 साल में कोई नया जलस्रोत विकसित नहीं हुआ है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, देवास परियोजना के पहले और दूसरे चरण से पानी की आपूर्ति शुरू होने के बाद शहर को नए बड़े जलस्रोत का इंतजार है।अब देवास परियोजना के तीसरे और चौथे चरण से भविष्य में राहत मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। हालांकि, इन परियोजनाओं को पूरा होने में अभी समय लगेगा। इस बीच शहर की आबादी और आवासीय क्षेत्र लगातार बढ़ रहे हैं। ऐसे में मौजूदा जलस्रोतों और वितरण नेटवर्क पर दबाव बढ़ना स्वाभाविक है।नए जलस्रोत के साथ-साथ पानी को शहर के बाहरी इलाकों तक पहुंचाने के लिए पाइपलाइन और वितरण व्यवस्था का विस्तार भी जरूरी है। अन्यथा जलस्रोत उपलब्ध होने के बावजूद अंतिम छोर की कॉलोनियों तक पर्याप्त पानी पहुंचाना चुनौती बना रह सकता है।

नलकूप और महंगे टैंकरों पर निर्भर हैं परिवार

एयरपोर्ट रोड की कई कॉलोनियों में सरकारी पाइपलाइन से पर्याप्त पानी नहीं पहुंचने के कारण परिवार निजी नलकूपों और पानी के टैंकरों पर निर्भर हैं। गर्मी और पानी की कमी के दौरान यह निर्भरता और बढ़ जाती है।निजी टैंकरों से पानी मंगवाने पर परिवारों को अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ता है। वहीं, नलकूपों पर निर्भरता बढ़ने से भूजल के लगातार दोहन की चिंता भी बनी हुई है। यदि भूजल स्तर नीचे जाता है, तो इन इलाकों में पानी की उपलब्धता और कठिन हो सकती है।जलदाय विभाग की ओर से कुछ स्थानों पर नलकूप खुदवाकर अस्थायी व्यवस्था करने के प्रयास किए जाते रहे हैं। लेकिन बढ़ती आबादी की जरूरतों के मुकाबले ये इंतजाम पर्याप्त नहीं माने जा रहे हैं। स्थानीय लोगों के लिए नियमित और भरोसेमंद पेयजल आपूर्ति बड़ी जरूरत बनी हुई है।

प्रतापनगर के आगे जलापूर्ति नेटवर्क की चुनौती

उदयपुर शहर में पेयजल आपूर्ति के प्रमुख स्रोतों में पिछोला, फतहसागर, मानसी वाकल और जयसमंद शामिल हैं। शहर के अलग-अलग क्षेत्रों में इन स्रोतों से पानी पहुंचाया जाता है। हिरणमगरी के विभिन्न सेक्टरों में जयसमंद से, पुराने शहर में पिछोला से और अन्य क्षेत्रों में मानसी वाकल तथा फतहसागर से जलापूर्ति की जाती है।लेकिन एयरपोर्ट रोड की दिशा में विकसित कई कॉलोनियां जल वितरण नेटवर्क के अंतिम छोर पर हैं। प्रतापनगर के आसपास तक पहुंचने वाली व्यवस्था के आगे कई इलाकों में नियमित जलापूर्ति की समस्या बनी हुई है। इसका असर केवल नई कॉलोनियों तक सीमित नहीं है। कुछ पुरानी आवासीय बस्तियां भी लंबे समय से पर्याप्त पेयजल सुविधा का इंतजार कर रही हैं।

कॉलोनाइजरों के वादों और सरकारी जलापूर्ति के बीच फंसे लोग

नई कॉलोनियां विकसित करते समय आंतरिक पाइपलाइन बिछा देना ही नियमित जलापूर्ति की गारंटी नहीं है। इन पाइपलाइनों में पानी पहुंचाने के लिए मुख्य जलस्रोत, पर्याप्त कोटा और सरकारी वितरण नेटवर्क का उपलब्ध होना भी जरूरी है।स्थानीय स्तर पर यह समस्या सामने आती है कि कुछ कॉलोनियों में आंतरिक पाइपलाइन होने के बावजूद नियमित पानी नहीं पहुंचता। ऐसे में मकान खरीदकर रहने आए परिवारों को निजी नलकूप या टैंकर का सहारा लेना पड़ता है। लोगों की परेशानी तब बढ़ती है, जब वे जलापूर्ति से जुड़ी शिकायतों के समाधान के लिए संबंधित विभागों के चक्कर लगाते रहते हैं।इस स्थिति में कॉलोनियों के विकास के दौरान जलापूर्ति की वास्तविक उपलब्धता और भविष्य की जरूरतों का आकलन महत्वपूर्ण हो जाता है। केवल आवासीय विकास होने से बुनियादी सुविधाएं अपने आप उपलब्ध नहीं हो जातीं।

नगर निगम में शामिल होने के बाद भी नहीं मिली राहत

पहले नगर निगम की सीमा से बाहर और तत्कालीन यूआईटी के दायरे में रही कई बस्तियां अब निगम के विस्तारित क्षेत्र में शामिल हो चुकी हैं। ये कॉलोनियां शहर के 80 वार्डों का हिस्सा हैं। सीमा विस्तार के बाद स्थानीय लोगों को उम्मीद थी कि सड़क, पानी और अन्य नागरिक सुविधाओं में सुधार होगा।हालांकि, नगर निगम में शामिल होने के बावजूद कई कॉलोनियों में पेयजल की समस्या बनी हुई है। जलापूर्ति के लिए पर्याप्त पानी और बुनियादी ढांचे की कमी के कारण इन क्षेत्रों में नियमित सप्लाई सुनिश्चित करना चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।यह स्थिति बताती है कि शहरी सीमा का विस्तार करने के साथ पेयजल जैसी जरूरी सेवाओं का विस्तार भी जरूरी है। अन्यथा नई आबादी को शहर का हिस्सा बनने के बाद भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष करना पड़ता है।

देवास परियोजना से राहत की उम्मीद, लेकिन इंतजार जारी

उदयपुर में भविष्य की पेयजल जरूरतों को पूरा करने के लिए देवास परियोजना के तीसरे और चौथे चरण को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इन परियोजनाओं के पूरा होने से शहर को अतिरिक्त पानी मिलने की उम्मीद है। हालांकि, फिलहाल इनके पूरा होने में समय लगने की बात सामने आई है।इस बीच एयरपोर्ट रोड और अन्य बाहरी इलाकों की कॉलोनियों में पेयजल संकट के समाधान के लिए मौजूदा नेटवर्क को मजबूत करना, जरूरत के अनुसार वितरण व्यवस्था बढ़ाना और पानी की उपलब्धता का आकलन करना जरूरी होगा।शहर की आबादी और कॉलोनियों का विस्तार लगातार जारी है। ऐसे में भविष्य की मांग को ध्यान में रखकर जलस्रोतों और वितरण तंत्र की योजना बनाना महत्वपूर्ण है। जब तक स्थायी समाधान नहीं निकलता, तब तक कई परिवारों को निजी नलकूपों और टैंकरों पर निर्भर रहना पड़ सकता है।

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Stv News Rajasthan

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