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अरावली की छोटी पहाड़ियों पर संकट: अजमेर में 50% तक चट्टानें खत्म, जैव विविधता और भूजल पर खतरा

राजस्थान में अरावली पर्वतमाला की छोटी चट्टानों पर निर्माण, ब्लास्टिंग और अवैध खनन का दबाव बढ़ रहा है। अजमेर और आसपास के क्षेत्रों में मैदानी इलाकों की करीब 50 प्रतिशत चट्टानें नष्ट होने का दावा किया गया है। इससे मिट्टी के कटाव, उर्वरता में कमी और प्राकृतिक जलस्रोतों पर असर पड़ने की आशंका है। एक रिपोर्ट के हवाले से अरावली के करीब 35 प्रतिशत हिस्से को अवैध खनन से नुकसान पहुंचने की बात भी कही गई है। विशेषज्ञों ने चेताया है कि प्राकृतिक संरचनाओं का संरक्षण नहीं हुआ, तो मरुस्थलीकरण का खतरा बढ़ सकता है।

30-35 वर्षों में अरावली की छोटी चट्टानों पर बढ़ा दबाव

अरावली पर्वतमाला राजस्थान और हरियाणा से होते हुए दिल्ली तक फैली है। इसकी लंबाई लगभग 700 किलोमीटर बताई जाती है। यह क्षेत्र की प्राकृतिक बनावट, मिट्टी और जल संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।अजमेर, ब्यावर, उदयपुर, देवगढ़ और पाली-सिरोही के मैदानी इलाकों में छोटी चट्टानें लंबे समय से पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में मदद करती रही हैं। लेकिन पिछले 30 से 35 वर्षों में शहरी विस्तार, आवासीय निर्माण, ब्लास्टिंग और खनन गतिविधियों से इनका प्राकृतिक स्वरूप प्रभावित हुआ है।इन चट्टानों के नष्ट होने से स्थानीय वनस्पति, जीव-जंतुओं के आवास और मिट्टी की गुणवत्ता पर असर पड़ने की आशंका है। पर्यावरण संरक्षण के लिहाज से इन क्षेत्रों की स्थिति का वैज्ञानिक आकलन जरूरी माना जा रहा है।

अजमेर के कई इलाकों में चट्टानें काटकर निर्माण

अजमेर शहर के वैशाली नगर, हरिभाऊ उपाध्याय नगर, शास्त्री नगर, एलआईसी कॉलोनी, आंतेड़, कृष्णगंज, पंचशील और लोहागल सहित कई इलाकों में पहले छोटी चट्टानों की मौजूदगी अधिक थी।उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इन क्षेत्रों में पहले करीब 70 प्रतिशत हिस्सा चट्टानी बताया गया था। आवासीय और व्यावसायिक निर्माण के लिए चट्टानें काटने तथा ब्लास्टिंग की गतिविधियों के बाद अब लगभग 30 प्रतिशत चट्टानें बचने का दावा किया गया है।हाथीखेड़ा, बोराज, ब्यावर और किशनगढ़ के आसपास भी चट्टानी संरचनाओं को नुकसान पहुंचने की बात सामने आई है। हालांकि, इन क्षेत्रों में चट्टानों के नुकसान का सटीक प्रतिशत निर्धारित करने के लिए विस्तृत सर्वेक्षण और आधिकारिक आंकड़ों की जरूरत है।

अवैध खनन से अरावली को नुकसान पहुंचने का दावा

अजमेर, ब्यावर, उदयपुर-राजसमंद, सावर, सिरोही, चित्तौड़गढ़, नागौर और पाली सहित कई क्षेत्रों में खनन गतिविधियों से अरावली को नुकसान पहुंचने की जानकारी सामने आई है।केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (CEC) की 2024-25 की रिपोर्ट के हवाले से दावा किया गया है कि अवैध खनन के कारण अरावली का करीब 35 प्रतिशत हिस्सा प्रभावित होकर बर्बाद हो चुका है। कुछ क्षेत्रों में पहाड़ियों की प्राकृतिक संरचना को गंभीर नुकसान पहुंचने की बात भी कही गई है।हालांकि, इस आंकड़े का भौगोलिक दायरा और आकलन का आधार आधिकारिक रिपोर्ट से मिलान करना जरूरी है। इसके बावजूद अवैध खनन पर निगरानी और संवेदनशील क्षेत्रों के संरक्षण का मुद्दा महत्वपूर्ण बना हुआ है।

छोटी चट्टानें मिट्टी और भूजल के लिए क्यों जरूरी हैं?

अरावली की छोटी चट्टानें केवल प्राकृतिक दृश्य का हिस्सा नहीं हैं। वे मिट्टी, पानी और स्थानीय जैव विविधता के संरक्षण में भी योगदान देती हैं।

इनकी प्रमुख भूमिकाएं इस प्रकार हैं:

  • मिट्टी का कटाव रोकना: चट्टानी संरचनाएं मिट्टी के बहाव और कटाव को नियंत्रित करने में मदद करती हैं।
  • उर्वरता बनाए रखना: मिट्टी की प्राकृतिक बनावट और पोषक तत्वों के संतुलन को बनाए रखने में योगदान देती हैं।
  • नमी का संरक्षण: वर्षा के पानी के बहाव और जमीन में नमी बने रहने की प्रक्रिया को प्रभावित करती हैं।
  • भूजल पुनर्भरण: प्राकृतिक भू-आकृति और मिट्टी की स्थिति के जरिए पानी के जमीन में समाने की प्रक्रिया में भूमिका निभाती हैं।
  • जैव विविधता को सहारा: स्थानीय वनस्पतियों और छोटे जीवों के लिए अनुकूल आवास उपलब्ध कराने में मदद करती हैं।
  • कृषि उत्पादन में योगदान: उपजाऊ मिट्टी के संरक्षण से आसपास की कृषि भूमि को लाभ मिल सकता है।

इन संरचनाओं के नष्ट होने से प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ सकता है। इसलिए उनका संरक्षण स्थानीय पर्यावरण और ग्रामीण आजीविका, दोनों के लिए महत्वपूर्ण है।

रेतीले टीलों का दायरा बढ़ने की चिंता

अजमेर और आसपास के क्षेत्रों में रेतीले टीलों के विस्तार को लेकर भी चिंता जताई गई है। स्थानीय जानकारी के अनुसार, करीब 25 से 30 वर्ष पहले कई स्थानों पर छोटे-छोटे टीले दिखाई देते थे। अब माकड़वाली, होकरा, कायड़, जनाना रोड और सीकर रोड के आसपास इनके बढ़ने की बात कही गई है।इसके अलावा पुष्कर-नागौर सीमा, चाचियावास, नसीराबाद और ब्यावर-उदयपुर मार्ग के कुछ हिस्सों में भी रेतीले टीलों के विस्तार का दावा किया गया है। कुछ क्षेत्रों में इनका दायरा 20 किलोमीटर तक फैलने की बात कही गई है, लेकिन इसकी स्वतंत्र पुष्टि के लिए विस्तृत भौगोलिक आंकड़े जरूरी हैं।प्राकृतिक वनस्पति और चट्टानी संरचनाएं कमजोर होने पर मिट्टी का कटाव बढ़ सकता है। इससे भूमि की गुणवत्ता प्रभावित होने और मरुस्थलीकरण का खतरा बढ़ने की आशंका रहती है।

प्राकृतिक झरनों और स्थानीय वनस्पतियों पर असर

चट्टानी क्षेत्रों में बदलाव का असर प्राकृतिक जलस्रोतों और वनस्पतियों पर भी पड़ सकता है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, चट्टानी क्षेत्रों के करीब 40 प्रतिशत प्राकृतिक झरने बंद होने का दावा किया गया है।गोंदा, खेजड़ी, देसी बबूल, बेर और थोर जैसी स्थानीय वनस्पतियों के अस्तित्व पर भी दबाव बढ़ने की बात सामने आई है। कुछ स्थानों पर जमीन की प्राकृतिक संरचना को नुकसान पहुंचने की जानकारी दी गई है।हालांकि, झरनों के बंद होने का सटीक प्रतिशत और इसके पीछे चट्टानों के विनाश की भूमिका वैज्ञानिक सर्वेक्षण से ही स्पष्ट होगी। जलस्रोतों, मिट्टी और वनस्पतियों की स्थिति का संयुक्त अध्ययन इस समस्या को समझने में मदद कर सकता है।

विशेषज्ञ की चेतावनी: मरुस्थलीकरण बढ़ने का खतरा

एमडीएस विश्वविद्यालय के रिमोट सेंसिंग एवं पर्यावरण विभाग के प्रोफेसर सुब्रोतो दत्ता के अनुसार, छोटी चट्टानें प्राकृतिक रूप से बनी ठोस संरचनाएं हैं। इनमें मौजूद खनिज और इनकी भौतिक बनावट मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने तथा अपरदन रोकने में योगदान देती है।उनके अनुसार, चट्टानों की कमी से प्राकृतिक असंतुलन बढ़ सकता है। यदि समय रहते संरक्षण के उपाय नहीं किए गए, तो मिट्टी का कटाव और मरुस्थलीकरण बढ़ने का खतरा रहेगा।विशेषज्ञों के मुताबिक, प्रभावित क्षेत्रों का सर्वेक्षण कर चट्टानों के नुकसान, मिट्टी की गुणवत्ता और जलस्रोतों में बदलाव का आकलन किया जाना चाहिए। इससे संरक्षण के लिए जरूरी कदम तय करने में मदद मिल सकती है।

अरावली के संरक्षण के लिए निगरानी जरूरी

अरावली की छोटी चट्टानों को बचाने के लिए अवैध खनन पर प्रभावी निगरानी, निर्माण गतिविधियों की जांच और संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान जरूरी है। साथ ही, प्राकृतिक जलस्रोतों और स्थानीय वनस्पतियों के संरक्षण पर भी ध्यान देना होगा।निर्माण और खनन से प्रभावित क्षेत्रों का वैज्ञानिक सर्वेक्षण कराने से नुकसान की वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है। इसके आधार पर संबंधित विभाग संरक्षण और पुनर्स्थापन की योजनाएं तैयार कर सकते हैं।अरावली की प्राकृतिक संरचनाओं को नुकसान पहुंचने का असर लंबे समय तक बना रह सकता है। इसलिए विकास कार्यों के साथ पर्यावरणीय नियमों का पालन और पहाड़ियों का संरक्षण भी प्राथमिकता होनी चाहिए।


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