अलवर में VDO पर भ्रष्टाचार के आरोप, पत्नी-बेटों और रिश्तेदार के खातों में ट्रांसफर किए 95,202 रुपए
अलवर जिले की कठूमर पंचायत समिति की ग्राम पंचायत सोंखर में ग्राम विकास अधिकारी (VDO) हितेश शर्मा पर सरकारी राशि के कथित दुरुपयोग के आरोप लगे हैं। आरोप है कि उन्होंने अपनी पत्नी, तीन बेटों और एक रिश्तेदार को विकास कार्यों में मजदूर दर्शाकर कुल 95,202 रुपए का भुगतान कराया। रिकॉर्ड के अनुसार, वर्ष 2020-21 से 2025 के दौरान स्वीकृत नौ विकास कार्यों में से पांच में इन लोगों के खातों में राशि ट्रांसफर हुई। VDO का कहना है कि राशि सरकारी खाते में वापस जमा करा दी गई है। जिला परिषद के CEO ने मामले की जांच कर कार्रवाई करने की बात कही है।
अलवर की ग्राम पंचायत सोंखर में भुगतान को लेकर विवाद
अलवर। कठूमर पंचायत समिति की ग्राम पंचायत सोंखर में सरकारी विकास कार्यों के भुगतान को लेकर सवाल उठे हैं। ग्राम विकास अधिकारी हितेश शर्मा पर आरोप है कि उन्होंने अपने परिवार के सदस्यों और एक रिश्तेदार को मजदूर दर्शाकर सरकारी राशि उनके बैंक खातों में ट्रांसफर करवाई।उपलब्ध ऑनलाइन मस्टररोल के अनुसार, पांच व्यक्तियों के खातों में कुल 95,202 रुपए जमा किए गए। इनमें VDO की पत्नी, तीन बेटे और एक रिश्तेदार शामिल बताए गए हैं।मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि संबंधित व्यक्तियों की मजदूर के रूप में पात्रता और काम करने की स्थिति का सत्यापन कैसे किया गया। भुगतान स्वीकृत करने से पहले किन अधिकारियों ने रिकॉर्ड की जांच की, इसकी भी पड़ताल जरूरी है।
पांच लोगों के खातों में कितनी राशि पहुंची?
उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार, ग्राम पंचायत के विकास कार्यों से जुड़े भुगतान पांच व्यक्तियों के खातों में किए गए। राशि का विवरण इस प्रकार है।
| नाम | संबंध | दर्ज भुगतान |
|---|---|---|
| मोहित | VDO का बेटा | ₹20,018 |
| रोहित | VDO का बेटा | ₹20,819 |
| सोहित | VDO का बेटा | ₹9,724 |
| सुमन | VDO की पत्नी | ₹21,750 |
| यशवंत तिवारी | रिश्तेदार | ₹22,891 |
| कुल | ₹95,202 |
मस्टररोल में मोहित, रोहित और सोहित के पिता का नाम हितेश दर्ज बताया गया है। वहीं, सुमन के पति का नाम भी हितेश लिखा है। यशवंत तिवारी को रिश्तेदार बताया गया है।इन प्रविष्टियों और भुगतान की परिस्थितियों की आधिकारिक जांच से ही यह स्पष्ट होगा कि राशि किस आधार पर स्वीकृत की गई थी।
पांच विकास कार्यों में दर्ज हुआ भुगतान
जानकारी के अनुसार, वर्ष 2020-21 से 2025 के दौरान स्वीकृत नौ विकास कार्यों में से पांच में संबंधित व्यक्तियों के नाम भुगतान दर्ज है। इनमें नाली निर्माण से जुड़े काम और सार्वजनिक बोरिंग पर टंकी निर्माण सहित अन्य कार्य शामिल बताए गए हैं।नालियों पर जाली लगाने के लिए 14वें वित्त आयोग से 1.29 लाख रुपए स्वीकृत किए गए थे। इस कार्य में मोहित और रोहित को 7,200-7,200 रुपए तथा सुमन को 2,640 रुपए का भुगतान दर्ज बताया गया है।इसके अलावा, ग्रेवल सड़क पर मोरम डालने के कार्य में यशवंत तिवारी को 2,873 रुपए दिए जाने की जानकारी सामने आई है। अन्य कार्यों के भुगतान का सत्यापन भी जांच का हिस्सा हो सकता है।
मजदूरी की दरों में अंतर पर उठे सवाल
ऑनलाइन मस्टररोल के अनुसार, अन्य मजदूरों के लिए 200 रुपए प्रतिदिन की मजदूरी दर्ज थी। वहीं, VDO की पत्नी और तीन बेटों के लिए 600 रुपए प्रतिदिन के हिसाब से भुगतान दर्ज होने की बात सामने आई है।मजदूरी की दरों में यह अंतर जांच का महत्वपूर्ण बिंदु है। यह पता लगाना जरूरी है कि संबंधित कार्यों के लिए मजदूरी की निर्धारित दर क्या थी और अलग-अलग भुगतान किस आधार पर किए गए।इसके अलावा, यह भी जांचना होगा कि संबंधित लोगों ने वास्तव में विकास कार्यों में श्रम किया था या नहीं। भुगतान स्वीकृत करने वाले अधिकारियों और मस्टररोल सत्यापन की प्रक्रिया की भूमिका भी महत्वपूर्ण रहेगी।
VDO बोले- सरकारी खाते में वापस जमा कराई राशि
ग्राम विकास अधिकारी हितेश शर्मा ने आरोपों के जवाब में कहा कि सरकारी योजनाओं के तहत काम करवाना जरूरी होता है। उनके अनुसार, श्रमिक आसानी से उपलब्ध नहीं होते, इसलिए किसी को भी कार्य में लगाया जा सकता है।हितेश शर्मा का दावा है कि परिजनों के नाम पर बताई जा रही राशि सरकारी खाते में वापस जमा करा दी गई है। उन्होंने यह भी कहा कि ग्रामीणों ने अधिकारियों को लिखकर दिया है कि वे आगे जांच नहीं चाहते।हालांकि, राशि वापस जमा कराने का दावा अपने आप में भुगतान की प्रक्रिया को सही साबित नहीं करता। यह जांच का विषय रहेगा कि भुगतान किन परिस्थितियों में हुआ और संबंधित नियमों का पालन किया गया या नहीं।
ग्रामीणों के मेजरनामा के बाद भी जांच जरूरी
मामले में बताया गया है कि शिकायत के बाद VDO ने ग्रामीणों की ओर से मेजरनामा तैयार कराकर अधिकारियों को दिया। इसमें VDO और एलडीसी के खिलाफ आगे कार्रवाई नहीं चाहने का उल्लेख होने की बात कही गई है।इसके बावजूद सरकारी धन के भुगतान से जुड़े मामले में रिकॉर्ड और प्रक्रिया की जांच महत्वपूर्ण है। ग्रामीणों की सहमति या शिकायत आगे नहीं बढ़ाने की इच्छा से प्रशासनिक जांच की आवश्यकता अपने आप समाप्त नहीं होती।जांच में मस्टररोल, बैंक खातों में हुए भुगतान, काम की वास्तविक स्थिति और राशि की वापसी से संबंधित दस्तावेजों का मिलान किया जा सकता है।
जिला परिषद CEO ने जांच का दिया भरोसा
जिला परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी यक्ष चौधरी ने कहा कि कोई भी अधिकारी अपने परिजनों के खातों में सरकारी योजना की राशि नहीं डाल सकता। उन्होंने मामले की गंभीरता से जांच कराकर कार्रवाई करने की बात कही है।अब जांच में यह स्पष्ट होना बाकी है कि भुगतान किस स्तर पर स्वीकृत हुए, क्या संबंधित लोगों ने वास्तव में काम किया था और राशि लौटाने के दावे की पुष्टि होती है या नहीं।जांच रिपोर्ट के आधार पर ही जिम्मेदारी तय करने और आगे की कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।