#सोशल

अगर उस दिन नाव पार चली जाती… तो क्या देश को मिलते लाल बहादुर शास्त्री?

2 अक्टूबर का दिन भारत के इतिहास में खास है। इसी दिन राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के साथ देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का जन्म हुआ था। शास्त्री का जन्म 2 अक्टूबर 1904 को उत्तर प्रदेश के मुगलसराय में हुआ था। आगे चलकर उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लिया और देश के प्रधानमंत्री बने। लेकिन उनके बचपन से जुड़ा एक ऐसा किस्सा भी है, जिसे सुनकर आज भी हैरानी होती है। महज कुछ महीने की उम्र में शास्त्री अपनी मां की गोद से बिछड़ गए थे। प्रयागराज के माघ मेले में हुई इस घटना में उनकी जान और भविष्य दोनों जैसे एक पतली डोर से जुड़े थे।

माघ मेले की भीड़ में मां की गोद से छूट गए ‘नन्हे’

बात 1905 की है। प्रयाग के माघ मेले में हजारों श्रद्धालु गंगा स्नान के लिए पहुंचे थे। इसी भीड़ में शारदा प्रसाद और उनकी पत्नी रामदुलारी देवी भी अपने छोटे से बच्चे के साथ मौजूद थे। परिवार बच्चे को प्यार से ‘नन्हे’ कहकर बुलाता था।भीड़ बढ़ती गई और घाट पर धक्का-मुक्की शुरू हो गई। इसी दौरान रामदुलारी देवी की गोद से बच्चा छूट गया। कुछ ही पल में उन्हें अहसास हुआ कि नन्हे उनके पास नहीं है।मां घबरा गईं। पिता ने भी आसपास बच्चे की तलाश शुरू कर दी। लेकिन भीड़ इतनी ज्यादा थी कि बच्चे का कहीं पता नहीं चल रहा था।

एक दूधवाले की टोकरी में जा गिरा बच्चा

यहीं से इस कहानी का सबसे हैरान करने वाला हिस्सा शुरू होता है।मानेकर की जीवनी के अनुसार, मां की गोद से छूटने के बाद बच्चा एक दूधवाले की टोकरी में जा गिरा। दूधवाला निसंतान था। बच्चे को अपनी टोकरी में देखकर उसने इसे ईश्वर का आशीर्वाद मान लिया।बच्चा रो रहा था। दूधवाले ने उसे संभाला और दूध पिलाया। वह उसे अपने साथ ले जाने की सोच रहा था। दूसरी तरफ बच्चे के माता-पिता घाट और आसपास के इलाकों में उसे खोज रहे थे।उस समय किसी के पास मोबाइल फोन या किसी तरह की तत्काल सूचना व्यवस्था नहीं थी। एक तरफ मां-बाप की बेचैनी बढ़ रही थी और दूसरी तरफ बच्चा एक अनजान व्यक्ति के पास था।

करीब एक घंटे की तलाश के बाद मिली उम्मीद

बच्चे के गायब होने की सूचना पुलिस को भी दी गई। पिता लगातार घाटों और आसपास के इलाकों में तलाश करते रहे।इसी दौरान उन्हें एक नाव के पास बच्चे के रोने की आवाज सुनाई दी। जब उन्होंने ध्यान से देखा तो एक टोकरी में वही बच्चा दिखाई दिया।पिता नाव की ओर बढ़े। लेकिन दूधवाला बच्चे को आसानी से वापस करने के लिए तैयार नहीं था। उसे विश्वास था कि यह बच्चा उसके जीवन में किसी दैवीय संकेत की तरह आया है।मामला बढ़ा तो पुलिस भी वहां पहुंची। इसके बाद बच्चे की पहचान कराई गई। मां रामदुलारी देवी ने अपने बच्चे को पहचान लिया और आखिरकार नन्हे अपने माता-पिता के पास वापस लौट आए।

दूधवाले ने मांगा दूध का पैसा

कहानी का एक दिलचस्प हिस्सा दूधवाले और शारदा प्रसाद के बीच हुई बातचीत से जुड़ा है।विभिन्न विवरणों के अनुसार, दूधवाले ने बच्चे की देखभाल करने की बात कहते हुए अपने नुकसान का हवाला दिया। बच्चे को दूध पिलाने के बदले उसने पैसे की मांग भी की।शारदा प्रसाद ने बच्चे के सुरक्षित मिलने की खुशी में उसे पैसे दिए। इस तरह एक छोटे से बच्चे की तलाश का यह घटनाक्रम आखिरकार खत्म हुआ।मां के लिए यह सिर्फ बच्चे के वापस मिलने की खुशी नहीं थी। यह उस भयावह आशंका से बाहर निकलना भी था, जिसमें उन्हें पता नहीं था कि उनका बच्चा किसके पास है और किस हालत में है।

अगर नाव उस दिन दूसरी तरफ चली जाती तो?

डी.आर. मानेकर की जीवनी में इसी घटना को लेकर एक बेहद दिलचस्प सवाल उठाया गया है—अगर दूधवाले की नाव वापस घाट पर नहीं आती और गंगा के दूसरे किनारे चली जाती तो क्या होता?बेशक यह इतिहास का एक काल्पनिक सवाल है। लेकिन घटना की गंभीरता समझने के लिए यह सवाल आज भी लोगों को सोचने पर मजबूर करता है।क्योंकि उस टोकरी में पड़ा बच्चा आगे चलकर भारत का प्रधानमंत्री बना। वही बच्चा लाल बहादुर शास्त्री था।यानी इतिहास के सबसे बड़े नेताओं में शामिल होने वाले एक व्यक्ति का जीवन बचपन में ही एक बेहद असामान्य घटना से गुजर चुका था।

डेढ़ साल की उम्र में पिता का साया उठ गया

लाल बहादुर शास्त्री का बचपन वैसे भी आसान नहीं था। उनके पिता शारदा प्रसाद स्कूल शिक्षक थे। जब लाल बहादुर करीब डेढ़ साल के थे, तभी उनके पिता का निधन हो गया।मां रामदुलारी देवी के सामने तीन बच्चों की जिम्मेदारी आ गई। वह अपने बच्चों को लेकर मायके चली गईं। प्रधानमंत्री कार्यालय की आधिकारिक जीवनी के अनुसार, शास्त्री का बचपन गरीबी के बीच बीता, लेकिन परिवार के स्नेह ने उन्हें मजबूत आधार दिया।

‘नन्हे’ से लाल बहादुर शास्त्री बनने तक

परिवार में उन्हें प्यार से ‘नन्हे’ कहा जाता था। यही नन्हा बच्चा आगे चलकर शिक्षा के लिए वाराणसी पहुंचा। उन्होंने काशी विद्यापीठ से ‘शास्त्री’ की उपाधि प्राप्त की और बाद में अपने नाम के साथ इसे अपनाया।प्रधानमंत्री कार्यालय की आधिकारिक जीवनी के मुताबिक, छात्र जीवन में ही वह देश की स्वतंत्रता की लड़ाई से प्रभावित हुए। महात्मा गांधी के विचारों ने भी उनके जीवन पर गहरा प्रभाव डाला।

आज भी याद किया जाता है ‘जय जवान, जय किसान’

स्वतंत्रता आंदोलन के बाद लाल बहादुर शास्त्री ने सार्वजनिक जीवन में कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं। वह रेल मंत्री रहे, गृह मंत्री रहे और 1964 में देश के प्रधानमंत्री बने।प्रधानमंत्री के रूप में उनका कार्यकाल लंबा नहीं रहा, लेकिन उनका व्यक्तित्व भारतीय राजनीति में सादगी और दृढ़ता के लिए याद किया जाता है। 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान उनके नेतृत्व और ‘जय जवान, जय किसान’ के नारे ने उन्हें देश की स्मृति में विशेष स्थान दिया।11 जनवरी 1966 को ताशकंद में उनका निधन हुआ।

एक टोकरी में गिरा बच्चा और इतिहास का बड़ा मोड़

लाल बहादुर शास्त्री के बचपन का यह प्रसंग इसलिए भी खास है क्योंकि यह उनके जीवन की शुरुआत से जुड़ी एक असाधारण घटना है।एक तरफ माघ मेले की भीड़ थी। दूसरी तरफ मां की गोद से छूटा एक छोटा बच्चा। फिर एक दूधवाले की टोकरी और एक नाव।अगर उस दिन बच्चा समय पर नहीं मिलता, तो कहानी शायद कुछ और होती। इतिहास में ‘अगर’ का कोई निश्चित जवाब नहीं होता। लेकिन इतना जरूर है कि उस दिन एक मां को उसका बच्चा वापस मिला और वर्षों बाद वही बच्चा देश का प्रधानमंत्री बना।

2 अक्टूबर को याद आता है ‘नन्हे’ का सफर

आज जब देश लाल बहादुर शास्त्री की जयंती मनाता है, तो उनकी जिंदगी का यह बचपन वाला प्रसंग भी लोगों का ध्यान खींचता है।2 अक्टूबर 1904 को जन्मा वह बच्चा आगे चलकर देश के सर्वोच्च राजनीतिक पद तक पहुंचा। गरीबी, पिता की कम उम्र में मृत्यु और संघर्षों के बावजूद उसने अपने जीवन में अलग पहचान बनाई।माघ मेले में मां की गोद से छूटे ‘नन्हे’ की कहानी यहीं खत्म नहीं हुई थी। असल कहानी तो इसके बाद शुरू हुई थी।एक ऐसा सफर, जिसने उन्हें स्वतंत्रता सेनानी से लेकर भारत के प्रधानमंत्री तक पहुंचाया।

author avatar
Stv News Rajasthan

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *