जयपुर में रात को महिलाओं की आवाज गूंजी, ‘हम औरतें अपने आप की, ना किसी के बाप की’
जयपुर में पहली बार वुमन मिडनाइट वॉक का आयोजन किया गया। पत्रिका गेट से शुरू हुई इस वॉक में करीब 900 से 1000 महिलाएं और लड़कियां शामिल हुईं। जवाहर सर्किल तक निकली इस वॉक में महिलाओं की सुरक्षा, आजादी और सार्वजनिक स्थानों पर बराबरी का मुद्दा प्रमुख रहा।रात करीब साढ़े आठ बजे पत्रिका गेट पर महिलाओं का जुटना शुरू हुआ। हाथों में तख्तियां थीं। उन पर महिलाओं की स्वतंत्रता और सुरक्षा से जुड़े संदेश लिखे थे। कुछ ही देर में पूरा क्षेत्र नारों से गूंजने लगा।
‘रात किसकी, शहर किसका?’
वॉक की शुरुआत सवालों और नारों के साथ हुई। महिलाओं ने पूछा- ‘रात किसकी? शहर किसका? आजादी किसकी?’इसके बाद नारे और ज्यादा मुखर होते गए। महिलाओं ने कहा, ‘हम औरतें अपने आप की, ना किसी के बाप की।’ एक अन्य नारा था, ‘हमारी स्कर्ट नहीं है छोटी, पितृसत्ता की सोच है छोटी।’महिलाओं ने बेटियों की सुरक्षा को लेकर भी संदेश दिए। एक तख्ती पर लिखा था, ‘बेटी की लोकेशन नहीं, बेटे का इंटेंट चेक करो।’
महिलाओं की आजादी पर उठे सवाल
आयोजकों के अनुसार वॉक का उद्देश्य महिलाओं की सार्वजनिक जगहों पर मौजूदगी को सामान्य बनाना था। सवाल यह उठाया गया कि महिलाओं को रात में अपने ही शहर की सड़कों पर निकलने से क्यों रोका जाए।द सिविक वॉयस और जयपुर कॉमन मूवमेंट की ओर से आयोजित यह वॉक पत्रिका गेट से शुरू हुई। इसके बाद जवाहर सर्किल का चक्कर लगाकर कार्यक्रम पूरा हुआ।वॉक में कुछ पुरुष भी शामिल हुए। उन्होंने महिलाओं की सुरक्षा और सार्वजनिक स्थानों पर समान अधिकार के समर्थन में भाग लिया।
गीत, कविता और अनुभवों ने जोड़ा संदेश
वॉक के दौरान केवल नारे ही नहीं लगे। कहीं गीत सुनाई दिए तो कहीं कविताओं के जरिए अपनी बात रखी गई।महिलाओं ने सार्वजनिक स्थानों पर अपने अनुभव भी साझा किए। कार्यक्रम में हंसी-मजाक का माहौल भी रहा। लेकिन इसके पीछे सुरक्षा और बराबरी का गंभीर सवाल मौजूद रहा।कई महिलाएं अपने परिवार के सदस्यों और दोस्तों के साथ पहुंचीं। इससे कार्यक्रम में अलग-अलग उम्र और पृष्ठभूमि की महिलाओं की भागीदारी दिखाई दी।
क्या है वुमन मिडनाइट वॉक?
वुमन मिडनाइट वॉक की शुरुआत साल 2016 में दिल्ली में मल्लिका तनेजा ने की थी। निर्भया आंदोलन के बाद इस पहल ने महिलाओं की रात में सार्वजनिक जगहों पर मौजूदगी का मुद्दा उठाया।इस पहल का उद्देश्य महिलाओं को रात से डराने के बजाय सार्वजनिक स्थानों को सुरक्षित बनाने की जरूरत पर चर्चा करना रहा है।
बेटी के साथ पहुंचीं महिलाएं
200 फीट बाइपास से 13 वर्षीय बेटी परी के साथ पहुंचीं अनुजा ने कहा कि वह अपनी बेटी को डर के बजाय आजादी के साथ बड़ा होते देखना चाहती हैं।परी ने कहा कि महिलाओं के खिलाफ अपराधों की खबरें देखकर कई बार बाहर निकलने में डर लगता है।सांगानेर से आलमीन अपनी नौ वर्षीय बहन अफिसा के साथ कार्यक्रम में पहुंचीं। उनका कहना था कि रात में सुरक्षित होकर बाहर निकलना केवल पुरुषों का अधिकार नहीं होना चाहिए।
‘महिलाओं पर पाबंदी नहीं, सोच में बदलाव जरूरी’
वॉक में शामिल पहल वर्मा और अनुराधा तिवारी ने बच्चों को बचपन से बराबरी और सम्मान की शिक्षा देने की बात कही।उनका कहना था कि महिलाओं की सुरक्षा के नाम पर उनके कपड़ों और बाहर निकलने के समय पर नियम लगाने से समस्या का समाधान नहीं होगा। इसके बजाय लड़कों और पुरुषों को सम्मान, सहमति और बराबरी की समझ देना जरूरी है।वैशाली नगर से पहुंचे संजय ने भी पुरुषों की भागीदारी को जरूरी बताया। उनके अनुसार महिलाओं की सुरक्षा और आजादी केवल महिलाओं का मुद्दा नहीं है।