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राजस्थान में 63 साल पुराना जमीन विवाद, दादा ने शुरू किया केस तो अब पोते लड़ रहे लड़ाई; HC का बड़ा आदेश

राजस्थान हाईकोर्ट ने 63 साल पुराने जमीन विवाद को लेकर सख्त रुख अपनाया है। दौसा जिले के पाटरखेड़ा गांव से जुड़े इस मामले में अदालत ने उपखंड मजिस्ट्रेट, मंडावर को तीन महीने के भीतर फैसला सुनाने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि मुकदमे कई बार उन्हें शुरू करने वाले लोगों से भी ज्यादा लंबी उम्र जी लेते हैं। अदालत ने अनावश्यक स्थगन पर भारी कॉस्ट लगाने की चेतावनी दी है। साथ ही तय समय में बिना ठोस कारण मामला नहीं निपटाने पर संबंधित अधिकारी के खिलाफ उच्च स्तर पर कार्रवाई और ACR में प्रतिकूल टिप्पणी की संभावना जताई है।

1963 में शुरू हुई थी जमीन की कानूनी लड़ाई

यह मामला दौसा जिले के पाटरखेड़ा गांव की कृषि भूमि से जुड़ा है। विवाद को लेकर 1963 में आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 145 के तहत कार्यवाही शुरू हुई थी।इसके बाद जमीन के स्वामित्व और कब्जे को लेकर कानूनी प्रक्रिया दशकों तक चलती रही। अब 63 साल बाद भी मामले का अंतिम निस्तारण नहीं हो पाया है। मामले के मूल पक्षकार जयराम मीणा अब 86 वर्ष के बताए गए हैं।

दादा ने शुरू किया मुकदमा, अब परिवार की अगली पीढ़ी लड़ रही लड़ाई

मामले की लंबी अवधि के दौरान कई पक्षकारों की मृत्यु हो चुकी है। उनके स्थान पर कानूनी प्रतिनिधियों को रिकॉर्ड पर लिया गया।हाईकोर्ट ने इसी स्थिति को न्यायिक व्यवस्था में देरी का उदाहरण बताया। कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में मुकदमे दादा-दादी द्वारा शुरू किए जाते हैं और फैसला उनकी अगली पीढ़ी तक पहुंचते-पहुंचते आता है। अदालत ने लंबे समय से चल रहे मुकदमों को लेकर न्यायिक व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर चिंता जताई।

हाईकोर्ट ने तीन महीने में फैसला सुनाने का आदेश दिया

जस्टिस अनूप कुमार ढंढ ने मामले को ‘सबसे पुराने और प्राथमिकता के आधार पर निपटाए जाने वाले मामले’ की श्रेणी में रखने का निर्देश दिया।अदालत ने मंडावर के एसडीएम को मामले की सुनवाई दिन-प्रतिदिन के आधार पर करते हुए तीन महीने के भीतर अंतिम निर्णय देने को कहा है। कोर्ट ने अनावश्यक और अनुचित स्थगन से बचने के भी निर्देश दिए हैं।

अनावश्यक तारीख मांगने पर लगेगी भारी कॉस्ट

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि भविष्य में कोई पक्ष मामले को टालने के लिए अनावश्यक स्थगन मांगता है तो उस पर छह अंकों तक की भारी कॉस्ट लगाई जा सकती है।कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि स्थगन देना पूरी तरह अपरिहार्य हो तो उसके कारण पीठासीन अधिकारी को आदेश-पत्र में लिखित रूप से दर्ज करने होंगे। इस निर्देश का उद्देश्य मामले को फिर से लंबा खिंचने से रोकना है।

अधिकारी पर भी हो सकती है कार्रवाई

अदालत ने संबंधित एसडीएम को तय समय सीमा में मामला निपटाने का निर्देश दिया है। यदि बिना किसी उचित और ठोस कारण के आदेश का पालन नहीं किया गया तो उच्च अधिकारियों को कार्रवाई के लिए निर्देश देने की बात कही गई है।रिपोर्ट के मुताबिक इसमें संबंधित अधिकारी की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट यानी ACR में न्यायिक कर्तव्यों के निर्वहन में विफलता संबंधी प्रतिकूल टिप्पणी भी शामिल हो सकती है।

आदेश की कॉपी कई वरिष्ठ अधिकारियों को भेजी गई

हाईकोर्ट ने आदेश की प्रति अतिरिक्त मुख्य सचिव, कार्मिक विभाग, जयपुर संभागीय आयुक्त, दौसा जिला कलेक्टर और राजस्व मंडल के रजिस्ट्रार सहित संबंधित अधिकारियों को भेजने का निर्देश दिया है।राजस्व मंडल के रजिस्ट्रार और जिला कलेक्टर को मामले की प्रगति की निगरानी करने की जिम्मेदारी भी दी गई है। मामले की अनुपालन रिपोर्ट के लिए 18 दिसंबर 2026 को अगली सुनवाई निर्धारित की गई है।

राजस्थान की राजस्व अदालतों में लंबित मामलों पर भी चिंता

इसी सुनवाई से जुड़े व्यापक निर्देशों में हाईकोर्ट ने राजस्व अदालतों में लंबे समय से लंबित मामलों पर भी चिंता जताई है। राजस्व मंडल, अजमेर के रजिस्ट्रार ने अदालत को बताया कि उसके सामने 72,081 मामले लंबित हैं।हाईकोर्ट ने पुराने मामलों को अलग श्रेणी में चिन्हित कर उनकी व्यक्तिगत निगरानी और समयबद्ध निस्तारण की दिशा में निर्देश दिए हैं। पांच से दस साल से अधिक पुराने मामलों को ‘oldest cases’ के रूप में चिन्हित करने की व्यवस्था पर भी जोर दिया गया है।

कोर्ट ने देरी को न्याय व्यवस्था की गंभीर समस्या बताया

हाईकोर्ट ने इस मामले को केवल एक जमीन विवाद तक सीमित नहीं माना। अदालत ने लंबे समय तक मुकदमों के लंबित रहने को न्याय तक समय पर पहुंच से जुड़ा गंभीर मुद्दा बताया।कोर्ट की टिप्पणी का मूल संदेश यही है कि कानूनी प्रक्रिया इतनी लंबी नहीं होनी चाहिए कि मूल पक्षकारों की अगली पीढ़ी तक मामला चलता रहे। अब पाटरखेड़ा के इस 63 साल पुराने मामले में तीन महीने की समय सीमा के भीतर फैसला आने की प्रक्रिया पर नजर रहेगी।

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Stv News Rajasthan

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