जयपुर निकाय चुनाव: टिकट कटने पर रोए BJP नेता, फिर बने बागी
जयपुर में निकाय चुनाव से पहले टिकट वितरण ने बीजेपी और कांग्रेस दोनों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। टिकट की उम्मीद लगाए बैठे कई नेताओं को जब पार्टी ने प्रत्याशी नहीं बनाया तो उन्होंने बगावत का रास्ता अपना लिया। इनमें कई नेता निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव मैदान में उतर चुके हैं। कुछ नेताओं ने पार्टी पर अनदेखी और धोखे का आरोप लगाया है। टिकट नहीं मिलने का दर्द बयां करते हुए बीजेपी के कुछ नेता भावुक भी नजर आए। वहीं कांग्रेस के कुछ पुराने कार्यकर्ताओं ने भी पार्टी पर बाहरी उम्मीदवारों को प्राथमिकता देने का आरोप लगाया है। अब दोनों दलों के सामने बागियों को साधने की चुनौती है।
टिकट नहीं मिला तो निर्दलीय मैदान में उतरे नेता
जयपुर निकाय चुनाव में टिकट वितरण के बाद बीजेपी और कांग्रेस के भीतर असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। कई दावेदार लंबे समय से पार्टी के लिए काम करने और संगठन में जिम्मेदारियां निभाने का हवाला देते हुए टिकट की उम्मीद कर रहे थे। लेकिन जब पार्टी ने उनके बजाय दूसरे नेताओं को उम्मीदवार बना दिया तो नाराज दावेदारों ने निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला किया। बागी नेताओं का कहना है कि उन्होंने पार्टी के लिए वर्षों तक मेहनत की, लेकिन टिकट वितरण के समय उनकी निष्ठा और सक्रियता को नजरअंदाज कर दिया गया।
कैमरे के सामने भावुक हुए BJP नेता विश्वास सैनी
बीजेपी के युवा नेता विश्वास सैनी का मामला खास तौर पर चर्चा में है। किसान मोर्चा से जुड़े विश्वास सैनी ने करीब 12 साल पहले ABVP के जरिए राजनीतिक सफर शुरू किया था। संगठन में अलग-अलग जिम्मेदारियां निभाने के बाद वह जयपुर के वार्ड नंबर 49 से महिला आरक्षित सीट पर अपनी पत्नी के लिए बीजेपी टिकट मांग रहे थे। पार्टी ने किसी अन्य दावेदार को टिकट दिया तो उन्होंने पत्नी को निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव मैदान में उतार दिया। मीडिया से बातचीत के दौरान टिकट कटने की पूरी कहानी बताते हुए विश्वास सैनी भावुक हो गए और कैमरे के सामने रो पड़े।
‘पार्टी को परिवार से ज्यादा माना’, बोले विश्वास
विश्वास सैनी ने आरोप लगाया कि उन्होंने बीजेपी को अपने परिवार से भी अधिक महत्व दिया, लेकिन टिकट वितरण के समय उनके साथ भरोसे के विपरीत व्यवहार हुआ। उनका दावा है कि नामांकन प्रक्रिया के अंतिम समय तक उन्हें पार्टी सिंबल मिलने की उम्मीद दिलाई जाती रही, लेकिन ऐन वक्त पर टिकट किसी अन्य दावेदार को दे दिया गया। इस घटनाक्रम से नाराज होकर उन्होंने निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़ने का फैसला किया। अब वह अपने समर्थकों के साथ प्रचार में जुटे हैं और पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार के खिलाफ वोट मांग रहे हैं।
अविनाश सैनी ने भी पार्टी के खिलाफ खोला मोर्चा
बीजेपी किसान मोर्चा के जिला अध्यक्ष अविनाश सैनी भी टिकट नहीं मिलने से नाराज नेताओं में शामिल हैं। उनका कहना है कि उन्होंने लंबे समय तक संगठन के लिए काम किया और पार्षद के टिकट के लिए अपनी दावेदारी पेश की थी। अविनाश सैनी के मुताबिक नामांकन की अंतिम समय सीमा से कुछ घंटे पहले तक उन्हें टिकट और सिंबल मिलने का भरोसा दिया गया, लेकिन अंतिम समय में पार्टी ने किसी दूसरे व्यक्ति को प्रत्याशी बना दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि सक्रिय कार्यकर्ताओं की जगह ऐसे लोगों को प्राथमिकता दी गई जो केवल चुनाव के समय पार्टी के साथ दिखाई देते हैं।
कांग्रेस नेता वजीर हुसैन भी हुए नाराज
बीजेपी के साथ कांग्रेस में भी टिकट वितरण को लेकर नाराजगी सामने आई है। कांग्रेस नेता वजीर हुसैन ने दावा किया कि उन्होंने करीब 40 वर्षों तक पार्टी के लिए काम किया है। उनका कहना है कि वह लंबे समय से अपने वार्ड में सक्रिय रहे हैं और स्थानीय लोगों के काम कराने में भी भूमिका निभाते रहे हैं। वजीर हुसैन का आरोप है कि इसके बावजूद पार्टी ने उनकी जगह एक ऐसे उम्मीदवार को टिकट दिया, जिसे वह ‘पैराशूट प्रत्याशी’ बता रहे हैं। टिकट नहीं मिलने से नाराज वजीर हुसैन भी पार्टी के खिलाफ चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी में हैं।
बागियों से दोनों पार्टियों की बढ़ी चिंता
जयपुर निकाय चुनाव में टिकट वितरण के बाद जिस तरह बीजेपी और कांग्रेस के भीतर असंतोष सामने आया है, उससे दोनों प्रमुख दलों की चुनावी रणनीति प्रभावित हो सकती है। बागी उम्मीदवार सीधे तौर पर पार्टी के अधिकृत प्रत्याशियों के वोट बैंक में सेंध लगा सकते हैं। खासकर उन वार्डों में मुकाबला दिलचस्प हो सकता है, जहां बागी उम्मीदवार का स्थानीय प्रभाव मजबूत है। अब दोनों दलों के सामने नाराज नेताओं को मनाने और चुनाव से पहले डैमेज कंट्रोल करने की चुनौती है।
नाम वापसी के बाद साफ होगी तस्वीर
निकाय चुनाव में नामांकन और टिकट वितरण के बाद अब सभी की नजरें चुनावी प्रक्रिया के अगले चरण पर हैं। यदि बागी उम्मीदवार मैदान में बने रहते हैं तो कई वार्डों में मुकाबला त्रिकोणीय या बहुकोणीय हो सकता है। पार्टी नेतृत्व के सामने अब नाराज नेताओं से बातचीत कर उन्हें वापस मुख्यधारा में लाने की कोशिश करनी होगी। वहीं बागी नेता अपने राजनीतिक भविष्य और स्थानीय समर्थन के दम पर चुनाव लड़ने का दावा कर रहे हैं। अंतिम तस्वीर नाम वापसी की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही पूरी तरह स्पष्ट होगी।